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बच्चन और गांधी नेहरू परिवार में क्यों आयी दूरी

Bachchan And Nehru Family

सिनेमा और राजनीति, वैसे कहने को तो दोनों अलग -अलग क्षेत्र हैं लेकिन  इसे अगर हिंदुस्तान के नज़रिये से देखा जाये तो दोनों में चोली दामन का साथ मिलेगा। कभी राजनीती में हुई घटनाओं को सिनेमा के परदे पर उकेरा जाता है, तो कभी सिनेमा की आवाज़ राजनीती को प्रभावित करती है। कभी सिनेमा की शोहरत से एक अभिनेता नेता बन जाता है तो कभी सिनेमा को उन्ही राजनेताओं के सामने झुकना भी पड़ता है। कभी राजनीती की कलई खोलती है सिनेमा, तो कभी राजनीती में फंसती है सिनेमा। समय-समय पर सिनेमा जगत से कई अभिनेता राजनीति की चासनी चखने आते ही रहते हैं. कुल मिलाकर देखें तो दोनों एक दूसरे के बिना अधूरे से लगते हैं।

इन सबमें नेहरू यानि गाँधी परिवार और बच्चन परिवार के संबंधों के चर्चे अक्सर सुर्ख़ियों में रहा करते हैं । आज भी अमिताभ बच्चन और नेहरू को लेकर तमाम तरह की किवदंतियां प्रचलित हैं. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि एक वक्त जिन दो परिवारों के बीच दांत कटी रोटी थी बाद में उन संबंधों में ऐसी खटास आयी की आज दोनों परिवार एकदूसरे को फूटी आखों नहीं सुहाते। वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई की किताब नेता अभिनेता में बड़े ही सिलसिलेवार तरीके से बच्चन और नेहरू परिवार के संबंधों पर चर्चा की गयी है जो की हमारी आज की इस वीडियो का आधार भी है।

नेहरू गांधी  और बच्चन परिवार के संबंधों की नींव

सबसे पहले तो प्रश्न यही उठता है की नेहरू और बच्चन परिवार के संबंधों की शुरुआत हुई कैसे ? शुरुआत होती है जवाहर लाल नेहरू और हरिवंश राय बच्चन के संबंधों से। हरिवंश राय बच्चन भारतीय विदेश मंत्रालय में हिंदी अधिकारी थे और बच्चन की  हिंदी की समझ और कविताओं से नेहरू काफी प्रभावित थे और यहीं से दोनों परिवारों के बीच नज़दीकियां आयीं।दूसरी तरफ इंदिरा गांधी और तेजी कौर काफी अच्छी दोस्त थीं।

कहते हैं जब हरिवंश राय बच्चन और तेजी कौर की शादी हुई तो  हरिवंश राय बच्चन के पिता प्रताप नारायण श्रीवास्तव इस शादी के खिलाफ थे क्यूंकि तेजी बच्चन पंजाबी थी और ये कायस्थ। उस वक्त इंदिरा गाँधी ने इन दोनों को मिलाने के लिए भरपूर प्रयास किया। बस यहीं से दोनों परिवार के सम्बन्ध और प्रघाड़ होते गए।बाद में जब इंदिरा ने फ़िरोज़ गाँधी से शादी की तो तेजी और हरिवंश बच्चन ने भी उनके रिश्ते को पूर्ण समर्थन दिया।वक्त बीतता गया और दोनों परिवारों के बीच घनिष्ठता बढ़ती गयी। दोनों परिवारों को अक्सर छोटे-बड़े पारिवारिक समारोह में एक साथ देखा जाता था।

दूसरी तरफ ये तथ्य भी है जो की हरिवंश राय बच्चन की ऑटोबायोग्राफी “दस द्वार से सोपान तक” से है कि सरोजिनी नायडू ने साल 1942 में हरिवंश राय बच्चन और तेजी को पहली बार नेहरू परिवार में आमंत्रित किया था। वहीं से तेजी और इंदिरा की दोस्ती शुरू हुई। नेहरू परिवार के आनंद भवन में पहुंचे हरिवंश राय बच्चन और तेजी बच्चन को सरोजनी नायडू ने नेहरू परिवार से यह कहकर मिलवाया कि यह हरिवंश राय बच्चन है और यह उनकी कविता…इंदिरा गांधी को सरोजनी नायडू का यह वक्तव्य इतना भाया, कि इंदिरा गाँधी ने इसके बाद जब भी तेजी बच्चन की मुलाकात अपने किसी विदेशी दोस्त से कराई तो उन्होंने तेजी का यही परिचय दिया।

 

संबंधों की दूसरी पीढ़ी

ये पारिवारिक रिश्ते दूसरी पीढ़ी में पहुँचने पर और भी प्रघाड़ होते गए। 1942 में अमिताभ बच्चन का जन्म हुआ और 1944 में राजीव गाँधी का . अमिताभ और राजीव की मुलाकात अमिताभ के चौथे जन्मदिवस पर हुई जब अमिताभ चार और राजीव दो वर्ष के थे। इंदिरा गांधी, राजीव को अपनी गोद में लिए अमिताभ के  घर पहुंची थीं। बस यहीं से अमिताभ और राजीव के बीच दोस्ती के अंकुर फूटे जो समय के साथ साथ एक वृक्ष का आकार लेने लगे। अमिताभ इंदिरा को आंटी कहा करते थे और इंदिरा भी अमिताभ को अपना तीसरा बेटा मानती थीं।

किशोरावस्था में इधर अमिताभ और अजिताभ पढाई के लिए नैनिताल के शेरवुड स्कूल चलए गए तो राजीव और संजय देहरादून के दून स्कूल।जब गर्मी की छुट्टियाँ होती तो चारों दोस्त दिल्ली में एक साथ छुट्टियां मनाते। छुट्टियों के वक्त  अमिताभ और अजिताभ तो पूरे दिन ही पंडित नेहरू के निवास स्थल ‘तीन मूर्ति भवन’ में रहा करते थे और जमकर मस्ती किया करते।

 

हाईस्कूल तक की पढ़ाई के बाद राजीव गांधी आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। इधर अमिताभ ने दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में दाखिला  लिया। लेकिन इनके रिश्तों में कोई दूरी न आयी दोनों चिट्ठी के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े रहे। राजीव नियमित रूप से अमिताभ को पत्र लिखा करते थे। यहाँ तक की इंदिरा गाँधी को राजीव का हाल चाल जानने के लिए अमिताभ से पूछना पड़ता था कि राजीव कैसा है।

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एक बार जब राजीव इंग्लैंड से हिंदुस्तान  वापस आए तो अमिताभ के लिए उपहार लेकर आए.. ‘अमिताभ के हाथों में पैकेट सौंपते हुए बोले, यह तुम्हारे लिए लाया हूं।’ इस पैकेट में एक जींस की पेंट थी। अमिताभ की जिंदगी की यह सबसे पहली जींस थी, जिसे उन्होंने वर्षो तक पहना। अफवाह ये भी उड़ती है कि इंदिरा जी ने ही अमिताभ को फिल्मों में आने के लिए प्रेरित किया था और उनके लिए कई सिफारिशी चिट्ठियां भी लिखीं।

 

इधर अमिताभ अभिनेता बने और राजीव पायलट लेकिन  दोस्ती जस की तस बनी रही ,कई बार तो अमिताभ ने उस फ्लाइट से सफर किया, जिसे राजीव गांधी उड़ा रहे होते  थे।अमिताभ को हमेशा इस बात का आश्चर्य होता कि जब भी फ्लाइट में राजीव गांधी कोई अनाउंसमेंट करते थे तो कभी भी अपना सरनेम नहीं बोला करते थे.. सिर्फ इतना ही कहते ‘आई कैप्टन राजीव।

 

राजीव और अमिताभ अपने मन की बात एक दूसरे से साझा करते । एक बार राजीव विदेश से वापस आये तो उन्होंने अमिताभ को एक तस्वीर दिखाकर पूछा – ” अमित ये लड़की कैसी है ?”

वो लड़की कोई और नहीं बल्कि सोनिया माइनो थीं। सोनिया जब पहली बार इंडिया आयीं तो एयरपोर्ट पर उन्हें रिसीव करने अमिताभ ही पहुंचे। इंदिरा को राजीव और सोनिया के संबंधों की जानकारी देने की ज़िम्मेदारी तेजी बच्चन को सौपीं गयी तब तक सोनिया करीब दो महीने अमिताभ के घर पर ही ठहरी। सोनिआ बच्चन के सानिध्य में भारतीय तौर तरीके सीखे.

 

सोनिया का कन्यादान हरिवंशराय बच्चन और तेजी बच्चन ने ही किया था और भाई के कर्तव्य अमिताभ ने पूरे किए थे। लेकिन अमिताभ तो दूल्हे  के दोस्त थे इसलिए अमिताभ ने राजीव-सोनिया के विवाह के एक दिन पहले सोनिया से राखी बंधवा ली और अब वे हिंदू शास्त्रानुसार सोनिया के भाई बन गए। सोनिया ने न सिर्फ अमिताभ को अपना भाई माना बल्कि हरिवंश बच्चन और तेजी को अपना माता पिता। सोनिया यहाँ तक कहतीं की तेजी उनकी तीसरी माँ हैं।

Amitabh And Sonia

जब पहली बार संबंधों में पड़ी गांठ

भारत में जब आपातकाल लागू हुआ तो उस समय अमिताभ की छवि यंग्री यंग मैन की हो चुकी थी लेकिन उस समय भी अपने दोस्त राजीव और गाँधी परिवार के साथ खड़े रहने पर अमिताभ को मीडिया की आलोचना झेलनी पड़ी जिसे देखते हुए अमिताभ ने राजीव से थोड़ी दूरी बना ली। अब अमिताभ अपने दोस्त राजीव को रिसीव करने एयरपोर्ट भी नहीं जाते। इस बात से राजीव को काफी धक्का पहुंचा. आपातकाल के बाद एक जनसभा के दौरान जब इंदिरा गाँधी ने अमिताभ को उस जनसभा में बुलाया तो उनकी माँ तेजी ने अमिताभ को जाने से मना कर दिया क्यूंकि उन्हें लगता था इस बात से अमिताभ के फ़िल्मी करियर पर बुरा असर पड़ेगा। बस फिर क्या था यहीं से इंदिरा और तेजी के वर्षों पुरानी  दोस्ती में  दरार आ गयी।1980 में एक मौका ऐसा भी आया जब इंदिरा गांधी  ने तेजी बच्चन की जगह के राज्यसभा सीट के लिए नरगिस को चुना .

 

अमिताभ की चोट और सम्बन्धों में मधुरता

‘कुली’ की शूटिंग के दौरान पुनीत इस्सर के घूंसे से अमिताभ बच्चन गंभीर रूप से घायल हो गए थे। अमिताभ बच्चन हॉस्पिटल में  जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे तो उन्हें देखने के लिए  इंदिरा गांधी  हॉस्पिटल पहुंची । पत्रकार राशिद किदवई ने अपनी किताब में ‘ बताया है कि इंदिरा को देखकर अमिताभ ने कहा था, ‘आंटी मैं सो नहीं पा रहा हूं।’ अमिताभ के इतना कहने पर इंदिरा गांधी रो पड़ी थीं।

अमिताभ की राजनीति में प्रवेश

इतना सब होने के बावजूद भी इंदिरा ने राजीव को बहुत पहले ये चेताया था की तेजी के बेटे अमिताभ को राजनीती में कभी मत लाना। लेकिन इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव अमिताभ को राजनीति में लेकर आये और उन्हें कांग्रेस की टिकट पर अलाहाबाद से चुनाव लड़ाया जिसमें अमिताभ रिकॉर्ड 62 प्रतिशत वोटों के साथ उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमत्री एच एन बहुगुड़ा को मात दी। ये दोनों ही परिवारों के लिए एक हर्ष का विषय था। अमिताभ बच्चन कांग्रेस की यूथ ब्रिगेड का हिस्सा बन गए। सतीश शर्मा, अरूण नेहरू, अरूण सिंह और कमलनाथ के साथ उनकी तुलना होने लगी।

 

अमिताभ और राजीव के संबंधों में खटास

राशिद किदवई ने अपनी किताब में यह दावा किया है कि अमिताभ बच्चन ने राजनीति में आने के बाद राजीव गांधी की सरकार में अधिकारियों की नियुक्ति  और ट्रांसफर में दखल देने लगे । इस बात से राजीव गांधी अमिताभ से  काफी नाराज रहते रहा करते थे। बाद में जब बोफोर्स घोटाले में अमिताभ के भी शामिल होने की खबर मीडिया में उठी तो अमिताभ ने राजनीती से सन्यास लेना ही उचित समझा। लोकसभा सांसद के पद से इस्तीफा देने के बाद राजीव से अपना सम्बन्ध लगभग खत्म कर दिया।

 

वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय ने अपनी किताब ‘वी पी सिंह, चंद्रशेखर, सोनिया गांधी और मैं’ में लिखा है कि  जब वीपी सिंह सरकार के समय राजीव गांधी विपक्ष के नेता थे. और अमिताभ बच्चन उनसे मिलने आए थे. उस वक्त कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला भी वहां मौजूद थे. जब अमिताभ चले गए, तो राजीव गांधी ने कहा – He is a snake पुस्तक में यह भी बताया गया है कि जब भी कोई विदेशी मेहमान भारत आता था तो वह अमिताभ  को ज़रूर  बुलाते .  राजीव विदेशी मेहमानों के सामने अमिताभ का परिचय सांसद के नाते कम और अभिनेता के नाते ज़्यादा कराते .  राजीव अमिताभ बच्चन से कहते कि मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है गाने पर नाच करके दिखाओ.  अमिताभ  को जैसा भी लगता रहा हो, पर उन्हें यह करना पड़ता था.

 

राजीव गांधी की हत्या और अमिताभ का गांधी परिवार से मुहं मोड़ना

1991  में राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया अकेली पड़ गयीं ऐसे में भी उनके हाथ अमिताभ की बेरुखी ही लगी। राहुल गांधी की पढ़ाई के लिए  सोनिया गांधी ने अमिताभ बच्चन से फीस  का इंतजाम करने को कहा था, लेकिन उन्होंने इसमें टालमटोल की.राहुल उन दिनों लंदन में पढ़ाई कर रहे थे।  अमिताभ बच्चन ने कहा, पैसे तो ललित सूरी और सतीश शर्मा ने गड़बड़ कर दिए. कुछ है ही नहीं लेकिन मैं कुछ करूंगा. सूरी और शर्मा कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और उन्हें राजीव गांधी का बेहद करीबी माना जाता था.पुस्तक में बताया  गया है कि जब राजीव गांधी जीवित थे तब सूरी, शर्मा और बच्चन ने मिलकर चावल का व्यापार आरंभ किया था.इसके दो दिन बाद अमिताभ बच्चन ने सोनिया गांधी के पास एक हजार डॉलर का चेक भिजवाया था, लेकिन सोनिया ने उसे गुस्से में   वापस लौटा दिया .रिश्तों में खटास का आलम देखिये की  18 February 1997 को प्रियंका गांधी की शादी की डेट सुनिश्चित हुई लेकिन उसके दो दिन पहले यानि 16 February 1997 को अमिताभ ने अपनी बेटी श्वेता की शादी का डेट रखा जिससे एक दूसरे के यहाँ उनको जाना भी न पड़े और प्रियंका की शादी को मीडिया में कम तव्वजो मिले।

अमिताभ के जीवन में अमर सिंह का आगमन

एक वक्त ऐसा आया जब अमिताभ  न सिर्फ फ़िल्मी करियर डूबा बल्कि उनकी कंपनी भारी घाटे में चली गयी जिससे अमिताभ दिवालिया हो गए।  तब अमिताभ के डूबते करियर को उबारने में अमर सिंह ने काफी मदद की । अमर सिंह काफी समय नेता मुलायम सिंह यादव के करीबी रहे थे। इसके बाद अमिताभ बच्चन मुलायम सिंह, उनके परिवार और पार्टी के काफी करीबी हो गए। वह कई मौकों पर मुलायम सिंह के साथ दिखाई देने लगे।  अमिताभ खुद फिर कभी राजनीति में ऐक्टिव नहीं हुए। बाद में जया बच्चन समाजवादी पार्टी में शामिल हो गईं।

2004 में एक सभा के दौरान जाया बच्चन ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा –

जो लोग हमें राजनीति में लाए वह हमें बीच मझधार में छोड़ कर चले गए। जब हम मुसीबत में थे तो उन लोगों ने हम से किनारा कर लिया। वह लोग आज देश में धोखा देने के लिए जाने जाते हैं।

इससे पहले भी अमिताभ बच्चन ने गाँधी और बच्चन परिवार के समबन्धों पर चर्चा करते हुए कहा था  कि वह लोग राजा है और हम लोग रंक…और राजा और रंक का कोई मेल नहीं होता।

जया बच्चन के बयान के बाद कांग्रेस सरकार  अमिताभ बच्चन पर राजनैतिक हत्कंडे फेकने लगी । अमिताभ बच्चन को इनकम टैक्स अधिकारी परेशान करने लगे। अमिताभ बच्चन इन मामलों की वजह से इनकम टैक्स विभाग की परेशानियों का शिकार होने लगे। बात-बात पर इनकम टैक्स विभाग के द्वारा उनका नाम खबरों में उछाला जाने लगा। इसके बाद तो सम्बन्ध ऐसे बिगड़े की एक समय पर कट्टर कोंग्रेसी कहलाने वाले अमिताभ फिर कभी कांग्रेस के पाले में नहीं गए और आज भी इन दो परवारों के बच्च अम्बुजा सीमेंट से बनी एक मोटी दीवार कड़ी है जो टूटती ही नहीं।

 

तो दर्शकों कुछ तरह रही गाँधी और बच्चन परिवार के मिलने और बिछड़ने की कहानी.

 

 

 

 

 

 

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Anurag Suryavanshi

Anurag Suryavanshi is a famous and social personality. The founder of the popular YouTube channel Naarad TV, he is a famous YouTube influencer and has millions of fan followers.
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