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शंकराचार्य के सन्यास लेने की कहानी- जब उन्हें एक मगरमच्छ ने दबोच लिया था

हमारी संस्कृति में कथाओं, महाकाव्यों का बड़ा महत्व रहा है, महाकाव्यों को तो हमने स्वयं भगवान का ही दर्जा दे दिया है। यकीन ना हो तो अपने आस पास ही देखिए, अपने पूजा घरों को, अनेकों बंडल भर पुस्तिका दिखेंगी जिन्हें अनजाने ही आपने एक एक कर जमा कर रखा है, क्या उनको जमा करने भर से ईश्वर की प्राप्ति हो जाएगी? क्या जो कुछ भी उनमें लिखा या कहा गया है जब तक उन्हें ना जानेंगे और ना ही समझेंगे तो आप ये मान लेंगे कि आप जिस पुण्य की कामना करते आ रहे हैं वो आपको प्राप्त हो जाएगा, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वो पुण्य जिसकी आप कामना करते हैं उसका अंतिम लक्ष्य तो मोक्ष ही होता है ना?


कभी समझा है कि वास्तव में मोक्ष है क्या? और हमारे शास्त्रों में निहित अनेकोंनेक कथाएं किस प्रकार प्रतीकात्मक ढंग से आपको उस अंतिम लक्ष्य की अनुभूति करा सकती हैं, उनमें निहित संदेश, संकेत,ज्ञान व उसके पात्र उनके कल्पित हाव-भाव यहाँ तक कि रंगभूषा और वेशभूषा तक आपसे संवाद करने को तैयार हैं,पर आप हैं कि बेकार ही उनसे परे हो कर ना जाने किस मिथ्याभिमान की चपेट में पड़े हैं।


कुछ वक्त पहले शंकराचार्य के सन्यास लेने की कहानी पढ़ी, बड़ी सीधी सरल दिखने वाली ये कहानी आप दोनों हाथ जोड़ कर, हाथों में अक्षत दबाए,उबासी खाते हुए भी सुन सकते हैं जैसे कि आप तौर पर आप सत्यनारायण की कथा सुनते वक्त करते होंगे ,पर यहाँ मैं उस अंदाज़ में इस कथा को कतई नहीं बतलाने जा रहा हूँ, इसलिए गौर करें और मेरे इस कथासंवाद को सुनें:

कहते हैं कि “जब शंकर छोटे थे”तो एक बार ने अपनी “माँ” से उन्होंने सन्यास ग्रहण करने के लिए अनुमति मांगी, पर माँ तो माँ होती है, जिसे इतने दिन इतने मोह से पाल कर रखा आज कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहा है, अतः माँ ने उनके की आज्ञा बिल्कुल भी नहीं मानी और एक दिन जब शंकर नदी में नहा रहे थे तभी एक मगरमच्छ ने उन्हें दबोच लिया,

माँ नदी के पास खड़ी थी और मौत शंकर के पास, तब शंकर ने माँ से सन्यास की अनुमति का पुनः आग्रह किया, माँ की भी कैसी स्थिति रही होगी कि एक तरफ बच्चा जो मौत को मानों आलिंगन ही कर रहा हो और दूजी तरफ वो सन्यास का तो ये कैसा आग्रह? कुदरत की कैसी ये माया? माँ ने क्षण भर भी विचार किये बिना बच्चे के प्राण के मोह में ही सही, सन्यास की अनुमति दे दी होगी, कहते हैं तुरंत ही मगरमच्छ ने शंकर को छोड़ दिया और उसके बाद से वे आदिगुरु शंकराचार्य के नाम से जाने गए।

अब इस सीधी सपाट और सरल दिखने वाली कथा के दूसरे नज़रिए से, चेतना के द्वारों को खोल कर पढ़ा व समझा जाये तो इस कथा को लेकर व आपके निजी जीवन के कई स्वाभाविक सवालों के हर जवाब इस कथा में मौजूद हैं।


हम यहाँ कथा के प्रामाणिक होने की बात बिल्कुल भी नहीं कर रहे हैं, और हमारा ये आश्य भी नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कथा समय के किसी पहलू में घटित भी हुई थी या नहीं बल्कि ये जान लेना उससे भी ज़रूरी है कि ये कथा हमें क्या बतलाना चाह रही है जो हमारे जीवन दर्शन से जुड़कर खुद हमें उस नन्हे शंकर की अनुभूति करा देता है, जो हमें सन्यास के उस मार्ग तक ले जाता हैं जिसकी मंज़िल पर अपेक्षित मोक्ष वास करता है।


ऊपर दी गई कथा अगर गौर से पढ़ी होगी तो “जब शंकर छोटे थे” के वाक्य में जानबूझकर डबल उध्दरण चिन्ह लगाए गए हैं, ऐसा ही “माँ” शब्द के साथ भी किया गया है ये जान बूझकर सांकेतिक तौर पर आपको कुछ इंगित करने का प्रयास है।


और वो ये कि बालक कितना भी बड़ा क्यों ना हो जाये अपनी माँ, माँ यानि कि “मोह” के आगे छोटा ही प्रतीत होता है, मोह के आगे हम सभी विवश हैं जो इनसे पार पा लेता है वो स्वयं तत्क्षण सन्यास को प्राप्त होता है, पर शंकर की माँ की तरह ही मोह हमें कभी भी सन्यास की अनुमति नहीं देता है, गौर करने वाली बात है कि कथा में शंकर नदी में नहा रहा होता है, वो नदी जो चलयमान है, जो अंततः जाके असीम सागर में मिलती है, कोई ऐसी नदी बता दीजिये जो सागर में जाके ना मिले और क्या हो अगर सागर मोक्ष की अवस्था का प्रतीक हो तो? तो क्या हम उस नदी को जीवन (भौतिकी से परे) का प्रतीक नहीं मान सकते? और जब उसी जीवन में कभी कोई पीड़ा हमें मगरमच्छ की भाँति दबोच ले तो क्या होता है? अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों से जोड़कर देखिए…..

जब मृत्यु नज़दीक खड़ी हो, अतः जिसे इस बात का पूरा पूरा भान हो कि मृत्य अकाट्य है, एकलौता सत्य है और हर दिशा से बाहें फैला कर हमारा इंतज़ार कर रही है, भले ही आज नहीं तो कल कभी ना कभी तो वो हमें मगरमच्छ की भांति धर दबोचेगी ही हम कितना ही उससे भाग लें, भाग कर परदेस चले जाएं, छिप लें पर हम उससे बच ना सकेंगे क्योंकि वो कहीं बाहर नहीं है वो तो हमारे अंदर ही है, मौत कोई वस्तु नहीं है बल्कि हर वस्तु की मौत निश्चित है और ये शरीर तो एक वस्तु मात्र है जो माँ या जननी से प्राप्त है और इस वस्तु की भी एक निर्धारित समय सीमा है, अगर कोई दुर्घटना को ना भी प्राप्त हो तो भी इसे एक दिन खत्म हो जाना है या खप जाना है।


शायद इसी बात का ज्ञान शंकर को उस क्षण हुआ होगा जब मगरमच्छ स्वरूप किसी पीड़ा या किसी चेतना के बाण ने उसे भीतर से झगझोर दिया होगा, जिस क्षण उसने ये जाना होगा उसी क्षण उसने मोह (माँ) से सन्यास की अनुमति पा ली होगी।

हम सभी इसी भ्रम में सारा जीवन निकाल देते हैं कि सामने से गुज़रने वाली अर्थी तो किसी और की है जमघट तो वो और ही जा रहा है, पर हम ये भूल जाते हैं कि एक ना एक दिन ऐसे ही हम भी जा रहे होंगे और सामने से हमको देखता हर इंसान यही सोंच रहा होगा जो आज हम सोंच रहे हैं किसी और की अर्थी देख, परंतु मौत के बाद हम कहाँ होंगे ये कौन जानता है, कौन जानता है कि शास्त्रों में मात्र मृत्यु के भय को भुला देने तथा जिज्ञासु मन को शांत करने हेतु रचे गए गए स्वर्ग-नर्क कहीं अस्तित्व में होंगे भी या नहीं, क्या जाने उस पार क्या होगा? ऐसे कई सवाल ही वास्तव में सन्यास और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं तब मगरमच्छ समान सामने खड़ी मृत्य का भी कोई वजूद नहीं रह जाता और हम सत्य की अवस्था यानी सन्यास को प्राप्त होते हैं और इतने से भान के लिए कही जंगलों में भटकने की भी भला क्योंकर ज़रूरत?

इसीलिए महाकाव्यों को पढ़ते रहिये, लोक कथाओं को समझते रहिये और खास तौर पर आज के इस भयावह और अर्थहीन दौड़ धूप से भरी जिंदगी में तो ये और भी ज़रूरी है।

आज के लिये इतना ही, उम्मीद है आगे भी ऐसे कई लेखों के माध्यम से आपसे मुख़ातिब होता रहूँगा।

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