swaroop sampat naarad tv

मिस इंडिया, मिस एशिया ,मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स  ये सारे नाम सुनते ही हमारे जेहन में बेहद  ख़ूबसूरत, ग्लैमरस और स्मार्ट चेहरों की छवि अपने आप ही  बन जाती है, जो न सिर्फ आकर्षक ही होती हैं बल्कि सुन्दरता और बुद्धिमत्ता का एक बेजोड़ संगम भी होती हैं। भारत में नियमित आयोजित होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिताओं में जहाँ एक ओर मिस इंडिया का चुनाव तो होता ही है साथ ही साथ मिस एशिया, मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिये भारत की तरफ से प्रतिनिधित्व करने वाली प्रतिभागियों का भी चुनाव हो जाता है। हम सभी उन नामों से तो भली-भांति परिचित हैं जिन्होंने विगत वर्षों इन प्रतियोगिताओं में विजयी होकर देश का नाम रोशन किया, जो विजेता तो बनीं ही साथ ही साथ एक सफल अभिनेत्री बन दर्शकों के दिलों में भी अपनी जगह बना चुकी हैं लेकिन कई मिस इंडिया ऐसी भी हुईं जो आगे की अन्य प्रतियोगिताओं में अपनी जगह नहीं बना सकीं फिर भी बतौर अभिनेत्री अपनी पहचान बनाने में उतनी ही कामयाब रहीं जितनी की कोई मिस वर्ल्ड या मिस यूनिवर्स। ऐसा ही एक बड़ा उदाहरण है वर्ष 1979 में मिस इंडिया का ताज पहनने वाली और दमदार अभिनेता परेश रावल की पत्नी डॉ॰ स्वरूप संपत जी का जिनके बारे में जानकर यकीनन आप भी उनके कार्यों की सराहना किये बिना ख़ुद को नहीं रोक पायेंगे। 

स्वरूप संपत का जन्म 3 नवंबर 1958 को गुजरात में एक गुजराती हिंदू परिवार में हुआ था। उनके पिताजी का नाम बच्चू संपत है जो एक लोकप्रिय गुजराती थियेटर कलाकार थे और  उनकी माँ एक डॉक्टर थीं। स्वरूप जी ने स्नातक की पढ़ाई मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज से पूरी की। दोस्तों स्वरुप  न सिर्फ सुन्दरता और बुद्धिमत्ता का एक उदाहरण हैं बल्कि वो एक मिसाल हैं इस बात की, कि किसी भी क्षेत्र में ज्ञान अर्जित करने की या कुछ भी सीखने की कोई उम्र नहीं होती बस उसकी वज़ह सही होनी चाहिये और जुनून पक्का होना चाहिए। स्वरूप के जीवन के इस पहलू के बारे में चर्चा करने से पहले आइये एक नज़र डाल लेते हैं उनके मिस इंडिया और अभिनेत्री बनने से लेकर अभिनेता परेश रावल की जीवन संगिनी बनने तक के सफ़र पर।

स्वरूप और परेश रावल की पहली मुलाक़ात उनके कॉलेज के दौरान वर्ष 1970 में हुई थी। कॉलेज में ब्रोशर बांटते हुए गुलाबी साड़ी पहने ख़ूबसूरत स्वरूप के रूप ने परेश रावल को पहली नज़र में ही अपना दीवाना बना दिया था उन्होंने तो उसी समय अपने दोस्त से कह दिया था कि मैं से शादी करूंगा तो इसी लड़की से। एक इंटरव्यू में स्वरूप संपत ने इस बात का ज़िक्र भी किया था कि, उस दिन जब परेश ने पहली बार मुझे देखा और अपने दोस्त से ऐसा कहा, तो मैंने उनकी बात सुनकर भी अनसुनी की। वो ब्रोशर लेने के बहाने काउंटर पर आए और फिर थोड़ी देर में चले भी गए। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि करीब सालभर तक उन्होंने मुझसे दोस्ती करने की कोई कोशिश तक नहीं की। ब्रोशर काउंटर पर तो स्वरूप ने परेश पर ध्यान नहीं दिया पर जब उन्होंने एक इंटर कॉलेज ड्रामा कॉम्प्टीशन के दौरान परेश को स्टेज पर अभिनय करते देखा, तो देखती ही रह गयीं। उनकी बेहतरीन अदाकारी ने सभी दर्शकों के साथ स्वरूप का भी दिल जीत लिया था। स्वरूप संपत के अनुसार सिर्फ़ मैं ही नहीं हॉल में बैठे लगभग सभी लोगों का यही हाल था। परेश की अदाकारी ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था और जब ड्रामा ख़त्म हुआ तो पूरे हॉल में सन्नाटा सा पसर गया था। वो ख़ुद को बैकस्टेज जाने  और परेश रावल को उनके बेहतरीन अभिनय के लिए बधाई देने से रोक ना सकीं। उसके बाद तो दोनों की दोस्ती भी पक्की हो गयी।

दोस्तों आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि स्वरूप जी को न तो अभिनेत्री बनने का कोई शौक था न ही किसी ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने की ही इच्छा थी।

एक नाटक में सबके कहने पर स्वरूप ने अभिनय करने के लिये हामी भर दी और कॉलेज के साथ थियेटर भी करने लगींं, उसी दौरान उनके पिता ने उन्हें मिस इंडिया ब्यूटी कॉन्टेस्ट में भाग लेने के लिए भी प्रोत्साहित किया जबकि स्वरूप ने इस बारे में कभी सोचा तक नहीं था .उन्होंने इस बात का ज़िक्र अपने भाई और परेश से किया तो उन्होंने भी ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने की बात पे हौसला बढ़ाया। परेश ने  कॉन्टेस्ट में स्वरूप का भरपूर सहयोग किया और स्वरूप ने भी अपने पूरे लगन और आत्म विश्वास से प्रतियोगिता को जीतकर वर्ष 1979 की मिस इंडिया का ताज अपने नाम कर लिया। स्वरूप के कॉन्टेस्ट जीतने की तो एक ओर सभी को ख़ुशी हुई लेकिन जाने क्यों परेश के मन में एक डर सा बैठ गया कि अब पहले जैसा कुछ नहीं रहेगा, सब बदल जायेगा। एक इंटरव्यू में स्वरूप ने बताया था कि परेश के मन में न जाने कहां से यह बात आ गई कि कॉन्टेस्ट जीतने के बाद मैं बदल जाऊंगी पर ऐसा कुछ नहीं हुआ मैंने उनका डर दूर किया और उन्हें पापा से अपना हाथ मांगने के लिए कहा। परेश ने स्वरूप के पिताजी से शादी की बात की जिसके लिये उन्होंने अपनी मंजूरी भी दे दी और 17 साल के इस प्यार को आख़िरकार वर्ष 1987 में अपनी मंज़िल मिल ही गयी।

स्वरूप और परेश दोनों ही नहीं चाहते थे कि उनकी शादी की ज़्यादा चर्चा हो इसलिए बहुत धूमधाम से करने की बजाय मुंबई के लक्ष्मी नारायण मंदिर में शादी का कार्यक्रम रखा गया। स्वरूप ने बताया कि उनके खानदान में कई सालों बाद बेटी की शादी हो रही थी, इसलिए उन्होंने सबसे पहले ही कह दिया था कि कोई बहुत ज़्यादा इमोशनल नहीं होगा। उनकी शादी की विधि के लिए 9 पंडित बुलाए थे, जो मंत्र जाप कर रहे थे और इस शादी में बहुत ज़्यादा तामझाम भी नहीं था बल्कि एक बहुत बड़ा पेड़ था, जिसके नीचे उन्होंने परेश के साथ सात फेरे लिए थे।

1979 में मिस इंडिया का खिताब जीतने के बाद वह मीडिया की नजरों में आईं और उन्हें बॉलीवुड फिल्में, टीवी सीरियल्स और विज्ञापनों के ढेरों ऑफर मिलना शुरू हो गये। वर्ष 1981 में  उन्होंने फिल्म ‘नरम-गरम’ और ‘नाख़ुदा’ से बॉलीवुड में अपनी शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने  हिम्मतवाला, सवाल, लोरी, करिश्मा, बहू की आवाज़ और कर्मदाता आदि कई फ़िल्मों में अभिनय किया। फिल्मों के अलावा स्वरूप ‘ये जो है ज़िन्दगी’,  ‘ये दुनीयाँ ग़ज़ब की,’ ‘ऑल द बेस्ट,’ और ‘शांति’, आदि कई टीवी धारावाहिकों में अपने अभिनय से दर्शकों के दिल में जगह बनाने में सफल रहीं। स्वरूप को आज भी टीवी धारावाहिक “ये जो है जिंदगी” में “रेणु” की भूमिका के लिए सबसे ज्यादा याद किया जाता है। 

अपने पारिवारिक जीवन और सामाजिक उत्तरदायित्व को भलीभांति निभाने हेतु स्वरूप जी ने कुछ सालों के लिये अभिनय से ब्रेक ले लिया।  अभिनय के क्षेत्र में उनकी दूसरी पारी की शुरुआत भी बहुत अच्छी रही। इस पारी में वो कई हिंदी फ़िल्मों जैसे 2002 में आयी फिल्म ‘साथिया’, 2016 में आयी ‘की एंड का’ तथा 2018 में प्रदर्शित ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ आदि के साथ-साथ वेब श्रृंखला– “द ग्रेट इंडियन डिसफंक्शनल फैमिली।” में भी अभिनय करती नज़र आयीं। हिंदी के अलावा स्वरूप वर्ष 2013 में अमिताभ बच्चन द्वारा निर्मित गुजराती फिल्म ‘सप्तपदी’ में भी सशक्त भूमिका में नज़र आयीं थी।

दोस्तों एक अभिनेत्री और एक मॉडल होने के अलावा, स्वरूप एक लेखिका और एक शिक्षाविद् भी हैं। उन्हें हमेशा से विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों की मदद करने में गहरी रुचि रही है शायद इसीलिये उन्होंने इस नेक काम को पूरा करने के मकसद से पी एच डी करने का संकल्प लिया ताकि बतौर शिक्षिका वो ऐसे ज़रूरतमंद बच्चों को सही ढंग से शिक्षित कर सकें।

उन्होंने अन्नामलाई यूनिवर्सिटी से इंग्लिश में पोस्ट ग्रेजुएशन पूरी करने के बाद 48 वर्ष की आयु में भी वर्ष 2006 में स्वरूप अपने इस संकल्प को पूरा करने के लिए इंग्लैंड चली गयीं जहाँ वे ‘वर्सेस्टर विश्वविद्यालय’ से ‘शिक्षा और नाटक’ विषय से पी॰एच॰डी॰ कर डॉक्टरेट की उपाधि ली और स्वरूप संपत से डॉ॰ स्वरूप संपत बन गयीं जिसके बाद स्वरूप दिव्यांग बच्चों को अभिनय के के ज़रिये प्रशिक्षित करने के  कार्य में जुट गयीं। एक प्रशिक्षक होने के नाते, वह भारत में जगह जगह भ्रमण कर बच्चों के लाभ के लिए नाटक की कार्यशाला की मदद से शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करती हैं। 

उन्होंने एक किताब भी लिखी है जिसका शीर्षक है “संक्षेप में सीखने की अक्षमता: सभी सीखने वाले विकलांग बच्चों, उनके शिक्षकों और माता-पिता के लिए” आमिर खान के निर्देशन में बनी पहली फिल्म “तारे ज़मीन पर”  की कहानी काफी हद तक इससे मिलती जुलती है।

स्वरूप NGO- “सेव द चिल्ड्रेन इंडिया,” के  बोर्ड की  सदस्य भी हैं। यह एन जी ओ भारत में बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम करता है। स्वरूप ‘गुजरात काउंसिल फॉर एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग’ के लिए भी काम करती हैं जिसके अंतर्गत गुजरात में बच्चों के लिए वर्कशॉप करते हैं। अपनी कड़ी मेहनत से उन्होंने तकरीबन 700 से अधिक बच्चों को स्कूलों में दाखिला दिलाने में सफलता हासिल की। नरेन्द्र मोदी जी के मुख्यमंत्री कार्यकाल केे दौरान गुजरात में उन्हें बच्चों के लिए एक शैक्षिक कार्यक्रम के प्रमुख के रूप में भी नियुक्त किया गया था।  दोस्तों आपको यह जानकर बहुत गर्व महसूस होगा कि कुछ वर्षों पहले विश्व प्रसिद्ध Varkey Foundation के ग्लोबल टीचर प्राइज़ के चुनाव में कुल 179 देशों के 10,000 नामिनेेेशन में भारत की डॉ॰ स्वरूप संपत जी का नाम टाॅप 10 में रहा। यह पुरस्कार उन्हें उनकेे ‘यूनिक टीचिंग मैथेड’ के लिये मिला था।

आइये अब एक नज़र डाल लेते हैं उनकी संतानो के बारे में।

स्वरूप संपत और परेश रावल के दो बेटे हैं अनिरुद्ध रावल और आदित्य रावल। अनिरुद्ध रावल फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में कार्य करने के साथ नाटकों से भी जुड़े हुए हैं। अनिरुद्ध ने फ़िल्म सुल्तान में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया था , साथ ही वो अभिनेता नसरुद्दीन के साथ थियेटर में भी सक्रिय हैं।

 आदित्य रावल  एक पटकथा लेखक हैं और उन्होंने  लंदन के ‘लंदन इंटरनेशनल स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स’ से थिएटर में अपनी पढ़ाई पूरी की है। वो गुजराती नाटक के अलावा बॉलीवुड फिल्म ‘फेरारी की सावरी’ में भी नज़र आ चुके हैं साथ ही उन्होंने ड्रामा-इन-एजुकेशन: टेकिंग गांधी आउट द टेक्सटबुक ’शीर्षक से एक वृत्तचित्र का निर्माण और निर्देशन किया है।

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