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फिल्मी दुनियाँ का स्वर्णिम युग यानि 50 से 70 के दशक का वो दौर जिसमें एक से बढ़कर एक फिल्में बनीं और मधुर, कर्णप्रिय संगीत का सृजन हुआ। उस दौर की फिल्में आज भी एक मिसाल की तरह जानी जाती हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उसके बाद के दशकों में अच्छी फिल्में बनी ही नहीं। बात जब-जब ब्लॉकबस्टर फिल्मों की होगी तो 80 के दशक को भी हमेशा याद किया जायेगा। यही वो दशक है जिसने हमें कर्ज़, उमराव जान, एक दूजे के लिये, सत्ते पे सत्ता, प्रेमरोग  और नदिया के पार जैसी कभी न भूल पाने वाली फिल्में दीं। ऐसी फिल्में देखने में जितनी मनोरंजक होती हैं उससे कहीं ज़्यादा मेहनत लगती है इनको बनाने में। बाक़ी फिल्में जहाँ बड़े बजट और बड़े नामों से भरी पड़ी थी, नदिया के पार ठीक उसके उलट नये कलाकारों को लेके कम बजट में बनायी गयी ज़बरदस्त कामयाब फिल्म थी। कम बजट में बनी इस कालजयी फिल्म की इतनी बड़ी सफलता के बारे में जानकर हर किसी के जेहन में अक्सर ये सवाल उठ आता है कि आख़िर इस फिल्म का निर्देशन किसने किया? और उन्होंने और कितनी फिल्में बनायी? ऐसे ही कुछ सवालों का जवाब है हमारा आज का यह वीडियो जिसके अंतर्गत हम चर्चा करेंगे फिल्म नदिया के पार से चर्चित हुए लेखक और निर्देशक गोविन्द मुनीस जी के बारे में।

 गोविन्द मूनीस जी का जन्म 2 जनवरी 1929 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िला के एक छोटे से गांव पासाखेड़ा में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित श्रीराम द्विवेदी था। गोविंद जी की पढ़ाई लिखाई उन्नाव और कानपुर में पूरी हुई। वर्ष 1947 में कानपुर के एक समाचार पत्र दैनिक वीरभारत में अपनी पहली कहानी छपने पर उन्होंने अपने लेखन के शौक़ को ही अपना कैरियर बनाने का पूरा मन बना लिया।  इसके बाद उन्होंने औरों के लिखे ढेरों लेख के अनुवाद भी किए और ख़ुद के लेख व कहानियां भी लिखीं। कहानियाँ लिखने के उनके जुनून ने ही उन्हें फिल्मों की ओर आकर्षित किया, फिर क्या था निकल पड़े गोविन्द फिल्मी दुनियाँ में अपनी किस्मत आजमाने।

वर्ष 1952 के अप्रैल माह में वो कलकत्ता पहुँचे और वहाँ उन्होंने 50 के दशक में मशहूर फिल्म निर्माता रित्विक घटक के साथ बंगाली फिल्म ‘बेदिनी’ में सहायक के रूप में काम करना शुरू किया,  किसी वज़ह से वो फिल्म तो पूरी नहीं हो सकी लेकिन बाद में बतौर सहायक और गीतकार उन्होंने रित्विक घटक के साथ फिल्म ‘नागरिक’ में काम किया जो वर्ष 1977 में प्रदर्शित हुई, हालांकि तब तक गोविन्द हिंदी फिल्मों में बतौर लेखक अपनी जगह बना चुके थे। बहरहाल हम बात कर रहे थे 50 के दशक के उनके शुरुआती सफर की, दोस्तों ये वही दौर था जब हिंदी फिल्मों का निर्माण पूरी तरह से कलकत्ता के बजाय बंबई यानि आज की मुंबई में होने लगा था और ज़्यादातर निर्माता निर्देशक मुंबई की ओर जा चुके थे।

Govind Moonis

गोविन्द जी को समझ में आ गया था कि उनकी मंज़िल भी कलकत्ता नहीं मुंबई ही है, नतीज़तन एक साल के बाद ही वर्ष 1953 में वे भी बंबई की ओर चल पड़े। वहाँ पहुँचकर जल्द ही उन्हें महान लेखक- निर्देशक सत्येन बोस के साथ बतौर पटकथा और संवाद लेखक के रूप में काम मिल गया। वर्ष 1949 से फिल्मों में सक्रिय सत्येन बोस को 1958 की फिल्म ‘चलती का नाम गाडी से अप्रतिम सफलता मिली थी जिसके संवाद को गोविन्द जी ने ही लिखा था।

दोस्तों पहली ही फिल्म से उनके हुनर को निर्देशक सत्येन बोस ने अच्छी तरह पहचान लिया फिर तो उसके बाद से सत्येन बोस की लगभग सभी फिल्मों में गोविन्द ने किसी न किसी रूप में काम किया, कभी सहायक निर्देशक के तौर पर तो कभी पटकथा और संवाद लेखक के तौर पर। 

कम लोगों को ही पता होगा कि फिल्मों में उन्होंने पटकथा व संवाद लेखन के साथ-साथ कई फिल्मों के गीत भी लिखे हैं। वर्ष 1969 में प्रदर्शित फिल्म ‘आंसू बन गये फूल’ के अलावा फुलवारी, ज्योत जले, और तुम्हारे बिना जैसी कुछ फिल्मों में गोविन्द जी ने संवाद के साथ साथ गीतों के लेखन में भी अपना हुनर दिखाया। गोविन्द जी ने आसरा, मेरे लाल, रात और दिन, जीवन मृत्यु और उपहार जैसी ढेरों क्लासिक फिल्मों के अलावा राजश्री प्रोडक्शंस की कई फिल्मों में लेखन कार्य किया, साथ ही साथ वर्ष 1954 में प्रदर्शित फिल्म ‘जागृति’ से उन्होंने सत्येन बोस के सहायक निर्देशक बनकर निर्देशन सीखना भी शुरू कर दिया। राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म ‘दोस्ती’ के निर्देशन का भार जब सत्येन बोस को सौंपा गया तो पटकथा और संवाद के लिये उन्होंने गोविंद मूूनिस को ही चुना। हालांकि फिल्म की कहानी तो लेखिका बीना भट्ट ने लिखा था लेकिन उस कहानी को फिल्म के हिसाब से रूप गोविंद मूनिस ने ही दिया। ‘दोस्ती’ फिल्म को एक क्लासिक फिल्म के रूप में आज भी याद किया जाता है। वर्ष 1964 में फिल्म ‘दोस्ती’ के अलावा संगम, आई मिलन की बेला, कश्मीर की कली, हकीकत और वो कौन थी जैसी बड़े बजट की सुपरहिट फिल्में भी प्रदर्शित हुई थीं। दोस्तों आपको यह जान के ताज्जुब होगा कि उस वर्ष के फिल्म फेयर  अवाॅर्ड के लिये इतनी बड़ी-बड़ी फिल्मों के बीच फिल्म “दोस्ती” के लिये सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक के रूप में गोविंद मूनिस का ही नाम चयनित किया गया। पुरस्कारों की बात करें तो गोविन्द जी को फिल्म ‘जागृति”, ‘बंदिश”, ‘मौसम”, ‘चलती का नाम गाड़ी” के लिए भी ‘फिल्म फेयर” के सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखक का पुरस्कार मिला था। इसके अलावा भी कई संस्थाओं द्वारा वे पुरस्कृत किये गये।

दोस्तों आज गोविन्द मुनीस जी की जो सबसे बड़ी पहचान है  वो है राजश्री प्रोडक्शन्स की वर्ष 1982 में प्रदर्शित फिल्म “नदिया के पार” के निर्देशक के रूप में। हालांकि इसके पहले भी वह एक भोजपुरी फिल्म “मितवा” का निर्देशन कर चुके थे लेकिन नदिया के पार फिल्म की बम्पर कामयाबी के आगे उनकी अन्य निर्देशित फिल्मों पर कभी किसी ने कोई चर्चा नहीं की।  राजश्री प्रोडक्शन्स के बैनर तले बनी इस फ़िल्म की कहानी, लेखक केशव प्रसाद मिश्र के हिन्दी उपन्यास कोहबर की शर्त के पहले आधे भाग पर आधारित है। इस कहानी की पृष्ठभूमि पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रमीण इलाक़े से जुड़ी होने के कारण गोविन्द जी ने भी पटकथा और संवाद को लिखने में मिट्टी की उस ख़ुश्बू को कहीं से फीका नहीं पड़ने दिया। उन्होंने इस फिल्म का निर्देशन भी उत्तर प्रदेश के गाँव में जा के ही किया ताकि कहानी के साथ पूरा न्याय हो सके। यह उनकी निष्ठा और लगन का ही परिणाम है जो आज भी लोग इस फिल्म को बार बार देखना पसंद करते हैं। दोस्तों इस फिल्म की शूटिंग से जुड़े किस्से और लोकेशन्स पे हमने कुछ वीडियो बनाये हुआ हैं जो भी दर्शक देखना चाहते हैं डिस्क्रिप्सन में दिये गये लिंक से देख सकते हैं। इस फिल्म की कामयाबी का अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि इस फिल्म को तेलुगु भाषा में भी डब किया गया और फिल्म का नाम रखा गया ‘प्रेमालयम’ और वर्ष 1994 में राजश्री प्रोडक्शन्स ने ख़ुद अपनी इसी कहानी पर हम आपके हैं कौन के नाम से  दोबारा एक फिल्म बनायी। दोस्तों कम लोगों  को ही पता होगा कि ‘हम आपके हैं कौन’ टाइटल का जन्म भी फिल्म ‘नदिया के पार’ में बोले गये एक संवाद से ही हुआ है जिसे गोविन्द मुनीस जी ने ही लिखा था। फिल्म के एक दृश्य में चंदन द्वारा गुंजा से पुछा गया सवाल ‘हम तुम्हारे हैं कौन?’ हर किसी को इतना पसंद आया था कि जब राजश्री वालों ने इस कहानी पे दोबारा काम किया तो इस संवाद को न सिर्फ टाइटल के लिये इस्तेमाल किया बल्कि इसी पे आधारित एक टाइटल सांग भी बनाया जो कि सुपरहिट भी हुआ। दर्शकों ने फिल्म के इस नवीन संस्करण को भी हाथों हाथ लिया यह फिल्म भी सुपरहिट रही।

Govind Moonis Young

दोस्तों गोविन्द मुनीस को “नदिया के पार” से जो सफलता मिली वो बहुत कम निर्देशक ही आज तक हासिल कर सके हैं। कम बजट में बनी इस फिल्म ने कई सिनेमाघरों में लगातार 100 हफ्ते चलकर कामयाबी के कई रिकॉर्ड बना दिए। इस फिल्म के बाद उन्होंने ससुराल, बन्धन बाँहों का, बाबूल, रिमझिम गीतों की जैसी कुछ और रोमांटिक और पारिवारिक फिल्में निर्देशित की। उन्होंने एक और हिंदी फिल्म ‘राग-अनुराग’ का निर्देशन किया था जो बाद में ‘साजन का दर्द’ नाम से प्रदर्शित हुई।

गोविन्द मूनीस जी ने हिंदी और भोजपुरी फिल्मों के अलावा बाल फिल्मों के लिए भी लगातार काम किया। बाल चित्र समिति के लिये उन्होंने ‘अनमोल तस्वीर” नामक फिल्म भी लिखी थी।

 उन्होंने कई टीवी धारावाहिकों के लिये भी स्क्रीनप्ले और संवाद लिखे जिनमें मुंबई दूरदर्शन पर प्रसारित टेलीफिल्म ‘डॉन’, ज़ी टी वी पे प्रसारित ‘रिश्ते’ सिरीज़ की ‘दो अकेले’ और स्टार टी वी पर प्रसारित “गुब्बारे’ सिरीज़ की ‘चंदन की चिता’ और ‘स्टार बेस्ट सेलर’ सिरीज़ की ‘रामलीला’ आदि एपीसोड प्रमुख हैं। बतौर संवाद लेखक गोविन्द मूनीस की आख़िरी फिल्म है ‘दिल चुराया आपने’ जो कि वर्ष 2002 में बनी लेकिन रिलीज़ नहीं हो सकी। उनके द्वारा अंतिम निर्देशित फिल्म है ‘गंगा जइसन पावन पिरितिया हमार’। भोजपुरी भाषा में बनी यह फिल्म वर्ष 2004 में प्रदर्शित हुई थी।

बांग्ला भाषा, फिल्मों और बांग्ला संगीत के प्रचार प्रसार के लिए गोविंद मूनिस ने मुंबई में अलग अलग सस्थाएं बनाकर काफी काम किया जिसके अंतर्गत उनकी संस्थाओं ने बंगाली भाषा और संगीत की कक्षाओं, नाटक कार्यशाला और विभिन्न बंगाली उत्सवों का आयोजन किया जैसे  दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा, सरस्वती पूजा काली पूजा और बांग्ला नव वर्ष आदि। सामाजिक कार्यों में भी उन्होंने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया उन्होंने एक चैरिटेबल होम्योपैथी दवाखाना भी चलवाया।

5 मई 2010 को 81 वर्ष की आयु में गोविंद मूनीस जी का निधन हो गया। नारद टी वी इस महान शख्सियत को नमन करता है। दोस्तों इसी के साथ हम आज का यह वीडियो यहीं समाप्त करते हैं गोविन्द मुनीस जी पर आधारित यह वीडियो आपको कैसा लगा कमेंट्स में जरूर बताएं। तो मिलते हैं अगले वीडियो में किसी और रोचक किस्से के साथ तब तक के लिये नमस्कार।

Govind Moonis

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