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हनुमान जी द्वारा दो बार संजीवनी लाने का रहस्य

जैसा कि आप जानते हैं कि श्रीराम के भक्त तो बहुत है लेकिन सबसे परम् भक्तो में जो नाम सबसे पहले आता है वो है महाबली हनुमान का, जिन्होंने श्रीराम के बहुत से मुश्किल कार्यो को आसानी से किया है,

ऐसा ही एक प्रसंग आता है जिसमें हनुमान जी घायल लक्ष्मण के लिए संजीवनी लाने हिमालय गए थे, लेकिन क्या आप एक ऐसा रहस्य भी जानते हैं कि हनुमान जी को दो बार संजीवनी लाने हिमालय जाना पड़ा था।

वाल्मीकि रामायण के युद्धकाण्ड के अनुसार जब रावण का पुत्र मेघनाद नेयुद्ध में श्रीराम और लक्ष्मण को नागपाश में बाँध कर मूर्छित कर दिया था, तब भगवन विष्णु के वाहन गरुण ने उन्हें नागपाश से छुड़ाया|

ऐसा होने के बाद मेघनाद को बहुत ठेस पहुची और उसने सोचा की जिस नागपाश से बड़े से बड़े देवता भी नही बच सकते थे उससे ये दोनों भाई कैसे बच गए, उसने मन ही मन ये सोच लिया की मै किसी भी तरह इन दोनों भाइयो का वध करके रहूँगा और यही सोचकर वह दूसरी बार फिर से युद्धभूमि में आया| युध्भूमि में आते ही मेघनाद ने भगदड़ मचा दी, उसने अपने पैने बाणों से सुग्रीव, हनुमान, अंगद , जाम्बवंत,नल-नील जैसे बलवान वानरों को घायल कर दिया|

इसके बावजूद उसने ब्रम्हास्त्र का प्रयोग करना शुरू किया, जिसकी वजह सेलगभग साठ करोड़ वानर सेना घायल हो गयी|

श्रीराम और लक्ष्मण उस समय युध्भूमि के दुसरे छोर पर थे, जब श्रीराम को ये पता चला की मेघनाद ने सेना पर ब्रम्हास्त्र छोड़ दिया है तो उन्होंने लक्ष्मण से कहा-

“हे लक्ष्मण! मेघनाद ने ब्रम्हास्त्र का प्रयोग किया है जिसका मान रखते हुए इसके जवाब में अस्त्र नही चला सकते , इसलिए मै सोच रहा हूँ की हम दोनों को बिना किसी घबराहट के ब्रम्हास्त्र के सामने आ जाना चाहिए जिससे हम लोग मूर्छित हो जायेंगे और इस तरह हमें देखकर मेघनादख़ुद को जीता हुआ समझ कर लंका वापस चला जायेगा और विनाश लीला रुक जाएगी|”

इसके बाद दोनों भाई ब्रम्हास्त्र के सामने आ गय और मूर्छित हो गए और उन्हें ऐसी दशा में देख मेघनाद वह से लंका वापस चला गया और अपनी जीत की खबर अपने पिता रावण को दी|

महबली हनुमान को ब्रम्हास्त्र से अभय का वरदान मिला हुआ थाऔर विभीषण भी युद्ध के समय शिविर में थे इसलिए वो दोनों स्वस्थ थे|

जब शाम हुई और युद्ध ख़त्म हो गया तो महाबली हनुमान और विभीषण दोनों हाथ में मशाल लिए अलग-अलग जगहों पर सुग्रीव, अंगद, जाम्बवंत आदि वानरों और श्रीराम-लक्ष्मण को खोज रहे थे, तभी विभीषण को जाम्बवंत घायल अवस्था में पड़े हुए मिले उनके शरीर पर बहुत से तीखे बाण धंसे हुए थे|

उन्हें देख विभीषण ने उनसे घबराते हुए पूछा

-“जाम्बवंत जी!  आप जीवित तो है ?” इस पर जाम्बवंत ने उत्तर दिया-“हां विभीषण जी मै बहुत घायल हो चुका हूँ लेकिन जीवित हूँ , मुझे ये बताइए की पवनपुत्र हनुमान कहा हैं?  क्युकी अब एक वो ही है जो हम सबको इस समस्या से उबार सकते है, इसलिए उन्हें मेरे पास बुलाइए, मै उनसे कुछ कहना चाहता हूँ”

ये सुनते ही विभीषण ने तुरंत हनुमान जी को जाम्बवंत के पास बुलाया, महाबली हनुमान को अपने पास देख जाम्बवंत बोले-

“हे महावीर! तुम्हारे जैसा बलशाली और पराक्रमी इस संसार में दूसरा कोई नही है, हमारी सेना और श्रीराम-लक्ष्मण दोनों घायल और मूर्छित पड़े है जिसका उपचार अब तुम्हारे जरिये ही हो सकता है , इसलिए मै जैसा कह रहा हूँ वैसा करो| तुम यहाँ से हिमालय जाओ वहा तुम्हे ऋषभ और कैलाश नाम के पर्वत दिखेंगे और इन दोनों पर्वतों के बीच में औषधियों का पर्वत दिखेगा जिसकी एक अलग ही चमक दिखाई देगी, मै कुछ खास औषधियों के नाम बताता हूँ जैसे- मृतसंजीवनी, विशाल्य्करिणी, सुवार्न्करिणी और संधानी| तुम इन औषधियों को लेके जल्दी से वापस आओ जिससे पूरी वानर सेना और श्रीराम-लक्ष्मण जल्द ही ठीक हो सके|”

जाम्बवंत के ऐसा कहने पर हनुमान जी ने तुरंत ही अपना विशाल रूप बनाया जो किसी पर्वत से भी बड़ा था , और हिमालय जाने के लिए उड़ान भरीऔर पल भर में ही हिमालय जा पहुचे| 

Lord Hanuman With Sanjeevani

पर्वत पर पहुचने पर उन्होंने जाम्बवंत की बताई हुई औषधियों को ढूँढने की बहुत कोशिश की लेकिन ढूंढ न सके, फिर उन्होंने मन ही मन सोचा की सारा समय इन औषधियों को ढूँढने में ही निकल जायेगा इससे अच्छा मै इस पर्वत शिखर को ही उखाड़ ले चलू| और ऐसा सोचकर हनुमान जी ने पूरा पर्वत उखाड़ लिया और अपने वेग से कुछ ही पलों में लंका की युध्भूमि में आ पहुचे|

वापस आने के बाद उन औषधियों की सुगंध से सारी वानर सेना को होश आ गया , श्रीराम और लक्ष्मण भी इन औषधियों की गंध से उठ खड़े हुए और उनके सारे घाव भर गए |जब सारी सेना स्वस्थ हो गयी तो हनुमान जी ने उस पर्वत को हिमालय पंहुचा दिया और वापस आ गए|

अगले दिन फिर से युद्ध शुरू होता है ,लेकिन विभीषण की सूझ बूझ की वजह से मेघनाद युध्भूमि में आने से पहले ही लक्ष्मण के हाथो मारा जाता है|

मेघनाद के मारे जाने के बाद रावण पागल सा हो गया था , वो दुसरे दिन पूरी ताकत के साथ युध्भूमि में उतरा| पूरी वानर सेना में तहलका मचाते हुए वो श्रीराम की तरफ बढ़ता चला आ रहा था लेकिन लक्ष्मण ने उसे बीच में ही रोक लिया और उन दोनों के बीच भयंकर युद्ध होना शुरू हो गया|इसी बीच विभीषण भी रावन से युद्ध करने लगे और उन्होंने रावन के रथ में लगे घोड़ो को मार गिराया|

इस पर रावण को अपने भाई विभीषण पर बहुत गुस्सा आया और उसने विभीषण को मारने के लिए एक ऐसे वज्र जैसे शक्ति का प्रयोग किया जिसका वार कभी भी खाली नही जाता है |

रावन को ऐसा करते देख लक्ष्मण तुरंत ही विभीषण के सामने आ गए और वो शक्ति लक्ष्मण की छाती पर जा लगी, शक्ति लगते ही लक्ष्मण मूर्छित हो कर गिर पड़े और चारो तरफ कोलाहल होने लगा|

श्रीराम ने जब ये सब देखा वो बहुत क्रोधित हुए और रावन के ऊपर बाणों की वर्षा करके घायल ,और निहाथ्था कर दिया| श्रीराम के बाणों के वेग को रावण सह नही पाया और वहा से भाग खड़ा हुआ|

युद्ध ख़त्म होने के बाद श्रीराम बहुत दुखी हो गए और विलाप करने लगे | उन्होंने कहा की-

“ अब मेरे लक्षमण को कैसे होश आएगा? इसका क्या उपाय हो सकता है?”सारी वानर सेना शोक में डूब गयी थी की तभी सुषेण ने कहा-“श्रीराम ! आप चिंता न करें , आपके भाई के शरीर में प्राण है , साँसे चल रही है और ह्रदय की धड़कन भी बंद नही हुई है|” ऐसा कहने के बाद सुषेण ने वीर हनुमान से कहा की-“हे हनुमान! जैसा की पहले भी एक बार आपको जाम्बवंत जी ने उन चार विशेष औषधियों के बारे में बताया था जो की हिमालय के पास महोदय पर्वत पर ही मिलेंगी, इसलिए आप बिना समय गवाए उस पर्वत पर जाइये और जल्द से जल्द उन औषधियों को यहाँ लेकर आइये ताकि लक्ष्मण के प्राण बच सकें|”

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ऐसा सुनते ही महाबली हनुमान ने बिना समय गवाए फिर से हिमालय के लिए उड़ान भरे और उसी पर्वत शिखर पर पहुच गए, समय की कमी और लक्ष्मण के प्राणों की चिंता होने की वजह से उन्होंने मन में सोचा की

-“मै इस पर्वत शिखर को फिर से उठा ले चलता हु , सुषेण अपने हिसाब से औषधि का उपयोग कर लेंगे”, हनुमान जी पर्वत शिखर को लेकर वापस आ गए|

हनुमान जी को देखकर सभी बहुत खुश हुए , सुषेण ने औषधि को पीस कर लक्ष्मण की नाक में डाल दिया और थोड़े ही देर में लक्ष्मण को होश आ गया और उनके शरीर के सारे घाव सूख गए|

ये सब देखकर श्रीराम बहुत प्रसन्न हुए और लक्षमण को गले से लगा लिया |

तोइस तरह महाबली हनुमान को दो बार हिमालय से संजीवनी लानी पड़ी जिसका प्रमाण वाल्मीकि रामायण के युध्कांड में मिलता है|

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