भारत में क्रिकेट का दर्जा खेल से आगे का है।करोड़ो उम्मीदें, भरोसा, ख़्वाब, एहसास ये सब कुछ  जिस
एक नाम के चारों ओर घूमते हैं,वो है क्रिकेट।तो, चलिए  घड़ी की सुईयों का हाथ थामकर
ढाई दशक पहले के क्रिकेट गलियारे में चलते हैं।

राजकोट की पाटा पिच पर रणजी ट्रॉफी लीग मैच में मुंबई टीम के गेंदबाजों पर सौराष्ट्र बल्लेबाज़ी क्रम भारी पद रहा था .मैच के दौरान मुंबई के सीनियर खिलाड़ी ने अपना दूसरा मैच खेल रहे एक लड़के को गेंदबाज़ों की हौसला अफ़ज़ाई और बल्लेबाज़ों पर दबाव बनाने के लिए कहा। उस लड़के ने अपने सीनियर से पूछा – ” वो सब ठीक है।लेकिन, अपना बैटिंग आयेगा क्या?  सौराष्ट्र की पारी 595 रन और  4  विकेट  समाप्त हुई।वो लड़का जिसे अपनी बल्लेबाजी  का इंतज़ार था।पारी की शुरआत करने आया और 314 रनों की नाबाद पारी खेल डाली ।वो 6 फ़ुट लम्बा, साँवले रंग का लड़का और कोई नहीं  बल्कि  वसीम जाफ़र थे।

घरेलु क्रिकेट के सचिन कहे जाने वालेवसीम जाफ़र का जन्म 16 फ़रवरी 1978 को मुंबई, में एक मध्य वर्गीय मुस्लिमपरिवार में हुआ।उनके पिता अब्दुल कादर एक बस ड्राइवर थे।क्रिकेट पर जान छिड़कने वालेउनके पिता ने एक ख़्वाब देखा।कि,चारों बेटों में से कोई एक भारतीय क्रिकेट टीम के लिए खेलेगा।पिता के ख़्वाब को अपना बनाकर चारों भाई मेहनत में लग गए ।मुंबई जैसे शहर में एक बस ड्राइवर की आमदनी से सारी ज़रूरते पूरी होना बड़ा मुश्किल था । ग़रीबी ने बड़े भाई कलीम कोक्रिकेट छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया।उनकी अम्मी 5-6 तरह के आचार बनाती और उनके दूसरे भाई नईम रिक्शा चलाकर उसे गलियों में बेचते।उधर वसीम जाफ़र को क्रिकेटर बनाने का निर्णय लिया गया।वसीम जाफ़र ने अंजुमन-ए-इस्लाम स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा ली।स्कूल के लिए खेलतेहुए उनकी 400 रनों की पारी कई सालों तक रिकॉर्ड बनी  रही। लेकिन, अंडर-15 में चयन ना होने पर वो बहुत रोये।चयन ना होने की निराशा भूलकर वसीम ने खेलना जारी रखा।

उसके बाद जाफ़र ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।निरंतर अच्छे प्रदर्शन ने उन्हें मात्र 18 साल कीउम्र में ही मुंबई रणजी टीम के दरवाज़े पर ला-खड़ा किया।उसके बाद जो हुआ वो अपने आप में इतिहास है। 314 रनों की उस पारी में सुलक्षण कुलकर्णी के साथ निभाई 460 रनों की साझेदारीमुंबई से बाहर सबसे बड़ी साझेदारी थी।वसीम की उस इनिंग को याद करते हुए इंडियन एक्सप्रेसने लिखा था ;वो उसके टेंपरामेंट का कमाल था।675 मिनट क्रीज़ पर जिस तरह से हावी होकर वो खेला,यकीन कर पाना मुश्किल था कि वो उसका महज़ दूसरा मैच था।

उस पारी ने वसीम को एक परिपक्व खिलाड़ी के रूप में पहचान दिलाई।अच्छे प्रदर्शन के बल-बूते पर वसीम को 24 फ़रवरी 2000 को मुंबई के उसी शहर में दक्षिण अफ़्रीका के विरुद्ध पहला अंतरराष्ट्रीय मैच खेलने का मौका मिला , जिस शहर में ये सफ़र शुरू हुआ था।लेकिन, डोनाल्ड और पोलाक से लैस दक्षिण अफ़्रीकी गेंदबाज़ी लाइनअप के सामने वसीम 4पारियों में 11.25 की औसत से 46 रन ही
बना पाये।वसीम की ज़िंदगी की तरह अंतर्राष्ट्रीय कैरियर को परवाज़ चढ़ते-चढ़ते 6 साल का लम्बा वक़्त लग गया।2006 में वसीम इंग्लैंड के विरुद्ध विदर्भ क्रिकेट ग्राउंड में अपनी 15वीं टेस्ट पारी में शतक लगाने से पहले 4 अर्धशतक लगा चुके थे।जाफ़र भारतीय उपमहाद्वीप में निःसंदेह लाजवाब खिलाड़ी थे।लेकिन, विदेशी सरज़मीं पर ख़ुद को साबित करना बाक़ी था।

फिर, आया वो वेस्टइंडीज दौरा जहाँ भारत ने वेस्टइंडीज में 35 सालों बाद कोई टेस्ट श्रृंखला जीती।वसीम ने 53.14 की शानदार औसत से 372 रन बनाये।जिसमें एंटीगुआ के मैदान पर क़रीब 400 गेंदों में खेली गई वो 212 रनों की पारी भी शामिल थी।अब उनके टेंपरामेंट का लोहा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर माना जाने लगा।2006 वेस्टइंडीज दौरे से लेकर 2008 दक्षिण अफ़्रीका के भारतीय दौरे तक उन्होंने 21 टेस्ट खेले।जिस में दक्षिण अफ़्रीका के खिलाफ़ न्यूलैंड्स में 116 रन और पाकिस्तान के खिलाफ़ ईडन गार्डन में खेली गई 202 रन की पारी मुख्य आकर्षण रहीं। वसीम का छरेरा बदन, बेफ़िक्र अंदाज़ , ऑफ़ स्टंप की गेंद पर कट,पैड की तरफ़ आती गेंद पर फ़्लिक, बाउंसर पर पुल शॉट पूर्व भारतीय कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन की याद दिलाते थे।वसीम का अंतर्रराष्ट्रीय कैरियर उड़ान पर था।फिर, आया 2007-08 का वो ऑस्ट्रेलिया दौरा जिसने भारतीय टीम की विदेशी सरज़मीं पर जीतने की भूख को साबित किया।लेकिन, वसीम जाफ़र का लगातार 6 पारियों में 5 बार ब्रेट ली के सामने असहाय रूप से आउट होना परेशानी का सबब बन गया।ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार जेरोड किम्बर ने लिखा उसे याद रखना चाहिए किन परिस्थितियों में वो खड़ा रहा।ना कि कैसे वो गिरा। वसीम जाफ़र ने डटकर सामना किया।लेकिन, हालात और आंकड़े उनके साथ नहीं थे।11-अप्रैल-2008 से ग्रीन पार्क में दक्षिण अफ़्रीका के विरुद्ध प्रारम्भ हुआ.

टेस्ट उनका अन्तिम अंतरराष्ट्रीय मैच सिद्ध हुआ। 2000 से लेकर 2008 तक उन्होंने 31 टेस्ट की 58
परियों में 34.10 की औसत से 1944 रन बनाये।जिनमें 11 अर्धशतक , 5 शतक शामिल थे । दो
अंतर्राष्ट्रीय दोहरे शतक लगा चुके वसीम का सर्वाधिक स्कोर एंटीगुआ में बनाये 212 रन रहे।इसी
दौरान उन्होंने 2 एकदिवासीय अंतर्रराष्ट्रीय भी खेले।

वसीम ने भारतीय टीम से बाहर किये जाने एवं दोबारा मौका न दिये जाने पर कभी सवाल नहीं
किये।बल्कि, साइलेंट हीरो की तरह घरेलू क्रिकेट में रनों के पहाड़ और रिकॉर्ड्स का नया कैनवस
तैयार करते रहे। सबसे ज़्यादा रणजी ट्रॉफी मैच 156, रणजी ट्रॉफी में सबसे ज़्यादा रन 12038,
सबसे अधिक रणजी ट्रॉफी शतक 40, रणजी ट्रॉफी में सबसे ज़्यादा कैच 200, रणजी ट्रॉफी में
सबसे ज़्यादा अर्द्धशतक 89, दिलीप ट्रॉफी में सबसे ज़्यादा रन 2545,ईरानी ट्रॉफी में सबसे ज़्यादा
रन 1294।अव्वल शब्द जैसे वसीम जाफ़र के लिए ही बना हो।वो रणजी के दो सीज़न में 1,000 से
अधिक रन बनाने वाले पहले खिलाड़ी हैं, साथ ही 10 बार रणजी ट्रॉफी जीतने वाली टीम के
सदस्य भी रहे।8 बार मुंबई की तरफ़ से और दो बार विदर्भ की तरफ़ से रणजी ट्रॉफी हाथ में
उठाई।

वसीम जाफ़र का घरेलू रिकॉर्ड , एक कभी न ख़त्म होने वाले मीठे सपने जैसा है।लेकिन, ये सफ़र
इतना आसान नहीं था। भारतीय टीम से बाहर होने के बाद 2014 तक मुंबई टीम के साथ खेलना
जारी रखा।2014-15 सत्र में उन्हें चयनकर्ताओं से मालूम हुआ, वो मुंबई वनडे टीम से ड्रॉप हो
सकते हैं।उन्होंने विजय हज़ारे वन डे ट्रॉफी खेलने और मुंबई के युवाओं को मौका देने के लिए
विदर्भ टीम से खेलना प्रारम्भ किया।विदर्भ टीम की ओर से खेलते हुए वो नाकाम रहे और उसी
दौरान चोटिल हो गए। 2016-17 रणजी सत्र बिना मैच खेले बीत गया।एक साल से अधिक हो गए
थे घरेलू क्रिकेट खेले हुए।जिस के कारण स्पोर्ट्स कोटे में बने रहने के लिये इंडियन ऑयल के जनरल
मैनेजर ने उन्हें 9-5 की नौकरी जॉइन करने के लिये बुलाया। वसीम जाफ़र की मानें तो ये उनका
सबसे मुश्किल दौर था।उन्हें वजन  कम करना था, मैदान पर वक़्त गुज़ारना था, फिटनैस सिद्ध
करनी थी और सबसे बड़ी चुनौती, रणजी टीम तलाशनी थी। फिटनेस ट्रेनर के कहने पर शाम 6
बजे बाद खाना छोड़ दिया। वो मैदान पर वापसी के लिए तैयार थे। उन्होंने सभी दोस्तों को
संपर्क किया, बिना मैच फ़ीस लिये खेलने तक की बात कही लेकिन, कहीं से अच्छी ख़बर नहीं
आयी।दुनिया संन्यास लेने के लिए कहने लगी।

2017-18 सत्र के लिए चन्द्रकान्त पण्डित को विदर्भ का कोच नियुक्त किया गया।जाफ़र
ने उनसे मदद के लिए सम्पर्क साधा।जाफ़र विदर्भ की रणजी टीम में लौट आए।जाफ़र ने कोच
पण्डित और खिलाड़ियों के बीच में पुल का काम किया।उसके बाद जो हुआ वो इतिहास है।विदर्भ
ने 2 साल में चार टाइटल जीते।2 बार रणजी ट्रॉफी और इतनी ही बार ईरानी ट्रॉफी भी।साल
2018 रणजी ट्रॉफी फ़ाइनल में जाफ़र ने जीतने वाला जो चौका मारा वो महज़ चौका नहीं प्रमाण
था।इंसान अगर संकल्प कर ले तो कुछ भी ना-मुमकिन नहीं।

वसीम जाफ़र ने 7 मार्च 2020 को क्रिकेट के सभी प्रारूपों से संन्यास का ऐलान किया। संन्यास लेते वक़्त जाफ़र ने 256 फर्स्ट क्लास मैचों में 19,211 रन बनाये।इस रनों के समुन्दर ने अहम योगदान
57 शतक और 89 अर्धशतकों का है।उनकी सर्वाधिक स्कोर वाली पारी दूसरे प्रथम श्रेणी मैच में
खेली गयी नाबाद 314 रनों की पारी है। साथ ही उन्होंने 297 कैच भी पकड़े।रनों के मामले में
भारतीय फर्स्ट क्लास क्रिकेट में सिर्फ़ सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, वी वी एस लक्ष्मण,
राहुल द्रविड़ का उनसे आगे होना ये बताता है।कि, वो किस श्रेणी के खिलाड़ी थे ।

जाफ़र इस कामयाबी के लिये अपनी पत्नी आयेशा,भाई कलीम और उन से जुड़े सभी साथियों को
श्रेय देते हैं। वसीम के भतीजे अरमान जाफ़र भी उनकी ही निगरानी में क्रिकेट खेल रहे हैं ।अरमान
जाफ़र अंडर-19 वर्ल्ड कप 2016 तक पहुंचने वाली भरतीय टीम का हिस्सा थे। उन्होंने स्कूल
क्रिकेट में अपने चाचा वसीम जाफ़र का रिकॉर्ड तोड़ 498 रन बनाए और शुरुआती कैरियर में
ही वसीम को गौरवान्वित होने का मौका दिया ।अंडर-19 विश्व कप से वसीम जाफ़र का ये
रिश्ता इस साल 2020 में भी जारी रहा।बांग्लादेश के सपोर्टिंग स्टाफ़ ने वर्ल्ड कप फाइनल में टीम
के धैर्य और दृढ़ता से खेलने का का श्रेय वसीम जाफ़र को दिया।अक्टूबर 2019 में वसीम बांग्लादेश
के साथ बैटिंग कोच के रूप में जुड़े थे। आने वाले दिनों में वसीम जाफ़र उत्तराखंड रणजी टीम के
हैड कोच की भूमिका में रहेंगे।इसी दुआ के साथ कि वसीम जाफ़र की ये दूसरी पारी उनकी पहली
पारी की तरह एतिहासिक और यादगार रहे नारद टीवी की टीम इनके उज्जवल भविष्य की कामना करती है .

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