लोकवाद और कयास
2016 के साल से जबसे रिलायंस जियो ने थोक भाव में मोबाइल डाटा उपलब्ध कराया है तबसे एक तो Tik-Tok क्रांति देश में देखने को मिली और दूसरी डिजिटल स्ट्रीमिंग की, 2015 तक नेटफ्लिक्स और एमेज़ॉन प्राइम जैसी चीज़ों से देश कतई वाकिफ़ नहीं था, पर अब शायद ही देश के किसी कोने में कोई युवा तबका हो जिसने अभी भी डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स के बारे में ना सुन रखा हो, वरना तो आजकल मेट्रोज और सिटी बस से सफर कर रहे ऑफिस से घर का रास्ता तय करते लोग हों या किसी होस्टल के एक कमरे में ऐमेज़ॉन या नेटफ्लिक्स का सब्सक्रिप्शन लिए एकलौते दोस्त के कमरे में लगी भीड़, हर जगह स्ट्रीमिंग स्टफ़्स का बोलबाला है।
भारत में आज के इस दौर में इन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स की इतनी बड़ी पहुंच देख कर एक बात और चर्चा का विषय बन जाती है कि, क्या एंटरटेनमेंट का मुख्य धड़ा कही जाने वाली विधा यानी की सिनेमा का भविष्य खतरे में है? क्या वेब सीरीज़ का फ्यूचर ब्राइट और फिल्म्स का फ्यूचर डार्क है? या फिर जैसे टी.वी. ने रेडियो को रिप्लेस किया वैसे ही ये डिजिटल प्लेटफॉर्म सिनेमाघरों को रिप्लेस कर देंगे? अगर ऐसे प्रश्न आपके दिमाग में उठ रहे हैं तो रुकिए और इस लेख को पूरा पढ़िए क्योंकि आप सही जगह पर हैं, आज हम अपने कयासों और तथ्यों के आधार पर यहाँ इन्हीं विषयों पर चर्चा करने वाले हैं।

तो चलिए हमारी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कुछ अहम बिंदुओ से होकर गुज़रते हैं:

नाट्य बनाम फ़िल्म विधा:
फ़िल्म विधा भारत के लिए महज़ सौ साल पुरानी है, जबकि भारत में नाट्य कला यानी की थियेटर का इतिहास एक अनुमान के अनुसार दो हज़ार साल से भी पुराना है। फिर भी सिनेमा के भारत में आते ही थियेटर का अस्तित्व लगभग सिमट के ही रह गया तो ऐसे में सवाल उठता है कि थियेटर की पॉपुलैरिटी में सेंध लगा चुकी फ़िल्म की विधा आज डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के आने से खुद खतरे में है? तो हम आपको बता दें कि ऐसा कुछ नहीं है, क्यों?….तो आइए पहले थियेटर और फ़िल्म की बेसिक को समझते चलें और खुद ब खुद तुलना करें।
फ़िल्म और नाट्य कला में एक बात का अंतर अहम होता है कि नाटक लाइव आर्ट है जो दिए गए समय मे ऑडिएंस के सामने लाइव कलाकारों द्वारा प्रस्तुत की जाती है यानी ये कि लाइव प्रसारित होती है और फ़िल्म बनके तैयार होने और एडीटिंग, डबिंग, कलर करेक्शन जैसी पोस्ट और प्री प्रोडक्शन प्रक्रिया से गुज़र कर एक निश्चित स्वरूप में दिए गए समयानुसार प्रसारित की जाती है, और जिसका एप्रोच नाटक की तुलना में समय व स्थान के मद्देनजर ज्यादा नेचुरल होता है, जबकि नाटक में समय और स्थान एक ही होता है, यानी कि एक ही समय पर एक ही दिए गए स्थान या स्टेज पर नाटक चल रहा होता है उसमें दिए गए अलग अलग सीन के लिए एक्टर्स अपना स्थान नहीं बदलते बल्कि उसी स्थान के हिसाब से दर्शकों को विश्वास दिलाते हैं कि वे पिछले सीन की तुलना में अब किसी और स्थान पर हैं।
ये तो रहा बेसिक फर्क और कुछ टेक्निकल बाते हैं जिनपे सिनेमा और नाट्य कला की हम तुलना कर सकते हैं पर अभी सीधे मुद्दे पर आते हुए हम देखेंगे कि यहाँ दर्शकों के लिए फ़िल्म एक पॉपुलर माध्यम इसलिए भी बना क्योंकि फ़िल्म नाटक की तुलना में ज्यादा एक्यूरेट (सटीक) तरीके से मानव जीवन को

पर्दे पर प्रस्तुत करती है, जिससे जनता को दिए गए समय और स्थान और परिस्थितियों का सटीक अनुभव होता है।
पर यही एक कारण नहीं है कि दर्शकों ने नाटक को छोड़ कर फ़िल्मो का रुख किया बिल्कि इन तमाम अंतरों के अलावा एक अहम समानता भी है जो दोनों विधाओं को खास बनाती है और वो है “मास व्यूइंग” यानी कि एक साथ बैठकर सामूहिक तौर पर प्रस्तुति का मज़ा लेना, साथ हंसना, ताली बजाना, सीटी मरना और हूटिंग करना जो किरदार से दर्शकों को भावनात्मक तौर पर जोड़ती है और सामूहिक भावनात्मक जुड़ावों का कारण बनती है। जिसके लिए जिम्मेदार है नाटक और फ़िल्म दोनों में के दर्शकों के लिए तैयार किया गया माहौल, जैसे दोनों जगह दर्शकों में अंधेरा और स्क्रीन या स्टेज पर उजाला होना दर्शकों का ध्यान स्टेज या स्क्रीन के अलावा कहीं भटकने नहीं देता है, दूसरी अहम बात ये कि आप यहाँ दोनों ही जगह पैसे देकर और समय निकालर आये हैं तो इन दोनों ही फैक्टर्स की अहमियत आप खुद कम नहीं होने देंगे और ये जो मास व्यूइंग का जादुई अनुभव है यही मुख्य कारण जो दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाता है, इसीलिए सिनेमा का भारतीयों पर प्रभाव कम होने की बात ही नहीं उठती और वैसे भी आमतौर पर हम लोग तो और ज्यादा भावुक लोग ठहरे।

रेडियो बनाम टेलीविज़न बनाम वेब कांटेंट
रेडियो का भी क्या जमाना था ना? लोग घर के काम काज करते हुए गांव में हुक्का फूंकते हुए, खेत रूपी शुलभ शौचालय जाते हुए, और ये भी कहना हैरत की बात ना होगी कि आमतौर पर लगभग ज्यादातर वक्त लोग ट्रांजिस्टर को अपनी बगलों में टांग कर घूमा करते थे….माने की शहरों की तो और बात है

गांव गांव में रेडियो की अपनी ही धाक थी, फिर आया टेलिविज़न नाम का राक्षस जो ना जाने कब रेडियो का एक दौर खा गया, और जनता के बीच रेडियो से भी ज्यादा पॉपुलर मीडियम साबित हुआ, और ऐसा हुआ कैसे….तो आइए देखेंगे कि ऐसे कौन से कारण थे जिन्होंने रेडियो को टी.वी. से रिप्लेस कर दिया।
रेडियो की लिमिटेशन ये थी कि ये सिर्फ एक मनोरंजन और सूचना ऑडिओ माध्यम था, यानी आप यहाँ सुन सकते हैं ना कि चीजों को देख कर अनुभव कर सकते हैं। उस वक्त लोग रेडियो पर आ रहे समाचार, रेडियो प्ले, कविता, गीत, ग़ज़ल आदि का सुन कर अनुभव करते थे और ये साथ ही साथ ज़रूरी नहीं था कि आप हमेशा इसे अपने पास ही रखें रेडियो कमरे के किसी कोने में है और आप किसी कोने में कोई और काम कर रहे हों, किचन में हों या बालकनी में सिगरेट फूंक रहे हों यहाँ आपके लिए सिनेमा हॉल जैसा माहौल होना ज़रूरी नहीं है, जो आपको एकाग्रचित रखे और फिर उस वक़्त टी.वी. के चलन में ना आने तक देखने के लिए विज़ुअल भी नहीं थे जिसके कारण आपका ध्यान लगा रहे फिर भी लोग संतुष्ट थे क्योंकि टी.वी. की तब तक परिकल्पना भी नहीं थी, खैर बाद में टी.वी. के आते ही लोगों को घर में ही ऑडियो-विज़ुअल का माध्यम उपलब्ध हो गया, जहाँ तरह तरह के, लाइव समाचार, प्रोग्राम, सीरियल्स (धारावाहिक) लोगों को घर बैठे ही देखने को मिलने लगे, और फिर डेली सोप्स की घर-घर में पैठ होने के नाते टी.वी. का बीवी से गहरा नाता हो चला था, इसलिए इस अंतर को मिटा पाना भी मुश्किल था या यूं कहें कि है….
क्योंकि आज डिजिटल प्लेटफॉर्म कितना भी प्रभावी क्यों ना हो जाये फिर भी ये जो पारिवारिक कंटेंट्स के ज़रिए घर-घर में पैठ बनाने की बात है, इसमें अभी

इन नए चलनों को समय लगेगा, क्योंकि आमतौर पर आज देसी भाषा में जो भी कंटेंट्स इन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध हैं सेन्सरशिप की लगाम ना होने के चलते उनके पारिवारिक होने का स्कोप नहीं है, हाँ अगर भविष्य में कोई ऐसी स्कीम आये की सभी डेली सोप्स और नॉन एडल्ट ग्रेड की चीज़ों को अलग से इन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध कराया जाए तो ज़रुर टेलिविज़न या टेले प्रोग्राम्स की पॉपुलैरिटी में सेंध लग सकती है, पर फिलहाल तो ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा।

वेब कंटेंट बनाम फ़िल्म
जैसा कि हमने अभी “मास व्यूइंग इम्पैक्ट” और सिनेमाघरों में दर्शकों के लिए उपलब्ध विशेष माहौल की बात की थी तो ये फैक्टर तो सिनेमा के हमेशा जुड़ा रहेगा और सिनेमा को ज्यादा डोमिनेंट (प्रभावी) माध्यम का दर्जा दिलाता रहेगा, जबकि टीवी शोज़ की और वेब कंटेंट्स की ऑडियंस को शो एंजॉय करने के लिए सिनेमा की तरह किसी विशेष माहौल या समय की ज़रूरत नहीं होती, लोग जब चाहे अपना पसंदीदा शो घर बैठे देख सकते हैं, और साथ ही साथ बाकी के काम काज निपटा सकते हैं, अगर समय नहीं है तो ऑन एयर रिकॉर्ड करके या स्ट्रीमिंग कंटेंट को पॉज़ करके किसी और वक़्त देख सकते हैं, ये खूबी वेब कंटेंट्स की खूबी भी है और खामी भी, खूबी इसलिए क्योंकि ये दर्शकों के सुविधानुसार काम करता है, और खामी यूँ कि, यही सुविधा एक दुविधा खड़ी करती है जो स्ट्रीमिंग शोज़ से इतर सिनेमा को एक मजबूत माध्यम बनाती है, मानिए कि आप कुछ दिनों पहले किसी मल्टीप्लेक्स में अच्छे खासे पैसे देकर एक अच्छी फिल्म देख कर आये हैं और कल को वही फ़िल्म आपको टेलीविज़न

या किसी स्ट्रीमिंग साइट पर देखने को मिले तो खुद आकलन करिए कि सिनेमा हॉल में फ़िल्म को देखने का जो मज़ा था क्या वही घर बैठे देखने को मिल रहा है? उत्तर होगा नहीं….क्योंकि उस वक़्त समय निकाला गया था, पैसे खर्चे गए थे, कुछ दूरी तय करके सिनेमा हॉल में दाखिल होकर लाइन में लगकर टिकट लिए गए थे यदि हॉउसफुल होने का अंदेशा रहा होगा तो एडवांस बुकिंग की गई थी और ये जो रोमांच है ये आपको कहीं और देखने को नहीं मिल सकता, क्योंकि यहाँ एक बार सब्स्क्रिप्शन के बाद “फ्री ऑफ कॉस्ट” अनगिनत चीज़ें आसानी से उपलब्ध हैं यहाँ आपके पास एक वक्त में अनेकों चॉइस हैं, पर वहाँ नहीं।
फिर भी इन सभी कारणों के बाद भी मैं यही कहना चाहूंगा कि ऐसा नहीं है कि सिनेमा का भविष्य खतरे में है, पर ऐसा भी नहीं है कि डिजीटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स का क्रेज कम होने वाला, हाँ ये ज़रूर हो सकता है कि आने वाले समय में दोनों अपनी अपनी जगह समान्तर तौर पर बने रहेंगे।

Dharmesh Kumar Ranu

By Dharmesh Kumar Ranu

Hello people! this is Dharmesh, the Creative impish of Naarad TV Family! दुनियावालों! दरहसल हम हैं धर्मेश....नारद टीवी के एक नम्बर के रचनात्मक तिकड़म बाज़ 🙏 (इस बायो के लिए हाईकमान से माफ़ी😃)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!