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समय दिखाई नहीं देता परंतु बहुत कुछ दिखा जाता है, व्यक्ति की यथास्थिति कैसे भी हो परंतु समय की करवट के आगे कोई भी परिस्थिति टिक नहीं पाती! कहते हैं वक्त धीरे-धीरे ही सही परंतु बदलता जरूर है और बदले भी क्यों ना आखिर परिवर्तन ही तो प्रकृति का अनंत क्रम है

बस समय बदलने में और अपना समय लाने में महज़ इतना फर्क होता है कि समय बदलना तो प्रकृति का नियम है, परंतु अपना समय लाने के लिए अथक मेहनत और पसीने की जरूरत होती है! बस इस बहते  समय के भवर में कई बार कुछ ऐसे लोग पीछे छूट जाते हैं, जिनका व्यक्तित्व ही उनकी आभा को परिवर्तित करता है, आज हम आपसे खेल जगत के एक ऐसे ही ईमानदार व्यक्तित्व की बात करेंगे जिसने पहले तो अपनी मुकद्दर की फसल को पसीने से सींच कर, अपने दौर को अपने ही व्यक्तित्व से गुलजार कर दिया लेकिन बाद में सफलता के कई मुकाम पाने के बाद अपनी ही बनाई हुई राहों में लौट गया!

जी हां दोस्तों आज हम आपसे बात करने जा रहे हैं पूर्व ऑस्ट्रेलियाई कप्तान एडम गिलक्रिस्ट की

यूं तो एडम गिलक्रिस्ट ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जगत को साल 2008 में ही अलविदा कह दिया है, लेकिन किताबों पर धूल जम जाने से इतिहास नहीं मिटा करते । खेल के मैदान में उनके द्वारा किए गए कारनामों को क्रिकेट जगत में आज भी जोर शोर से सराहा जाता है।दोस्तों, एडम गिलक्रिस्ट का जन्म 14 नवंबर साल 1971 को  Bellingen, New South Wales

 Australia में हुआ, उनका पूरा नाम Adam Craig Gilchrist है। वे अपने चार भाइयों में सबसे छोटे हैं उनके पिता का नाम stanly Gilchrist और माता का नाम June Gilchrist है। लोगों ने प्यार से  wingnut और

churchy भी बुलाते हैं, इसके अलावा क्रिकेट जगत में भी उनका एक बहुचर्चित उपनाम है

जी हां दोस्तों क्रिकेट जगत में प्यार से उन्हें “गिली” नाम से भी संबोधित किया जाता है।

गिलक्रिस्ट ने अपनी शुरुआती दौर की पढ़ाई

Deniliquin पब्लिक स्कूल से की और यही उन्होंने अपने अंदर छिपे क्रिकेट के हुनर को पहली बार पहचाना जब उन्होंने अपने स्कूल की तरफ से खेलते हुए Brian Taber Shield

अपने नाम की जो कि New South Wales के क्रिकेटर Brian Taber की याद में दी जाती है।

Adam Gilchrist

इसी घटना के बाद “गिली” का क्रिकेट के प्रति समर्पण और भी गहराता चला गया, जब वह महज 13 साल के थे तो उनके माता-पिता

Deniliquin से Lismore शिफ्ट हो गए, और यहां आकर गिलक्रिस्ट का दाखिला आगे की पढ़ाई के लिए Kadina high school में करवा दिया गया। रहने की परिस्थितियां बदली समाज बदला मैदान बदले लेकिन एक चीज नहीं बदली गिलक्रिस्ट का क्रिकेट के प्रति लगाव । नए  शहर में आकर गिलक्रिस्ट फिर से अपनी प्रतिभा को पसीने से चमकाने में लग गए, और यहां गिलक्रिस्ट स्कूल के मैदान में रोज घंटों प्रैक्टिस किया करते थे क्रिकेट में उनकी लगन और जुनूनियत को देखते हुए बाद में उन्हें अपने स्कूल टीम का कप्तान भी बना दिया गया। स्कूल  टीम की तरफ से खेलते हुए गिलक्रिस्ट लगातार शानदार performance दे रहे थे। साथ ही अपनी कप्तानी की सूझबूझ का भी उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रहे थे। इसी के चलते उनका सिलेक्शन उनकी प्रतिभा की दम पर जल्द ही स्टेट अंडर-17 में हो गया, और साथ ही मैदान पर किए गए उनके अद्भुत प्रदर्शन के कारण साल 1989 में उन्हें लंदन के रिचमंड क्रिकेट क्लब द्वारा स्कॉलरशिप भी दी गई। स्कॉलरशिप मिलने के बाद गिलक्रिस्ट को यह समझ आ गया था कि वे अपने इस पसंदीदा खेल को खेलते हुए पैसा भी कमा सकते हैं और यहां से उन्होंने अपना पूरा ध्यान अपने खेल की प्रतिभा को निखारने में केंद्रित कर लिया, जिसका निष्कर्ष यह रहा कि गिलक्रिस्ट जूनियर क्रिकेट में एक के बाद एक कई झंडे गाड़ते चले गए और अपने इसी करिश्माई प्रदर्शन के चलते साल 1991 में इंग्लैंड के दौरे के लिए  “गिली” को ऑस्ट्रेलियाई नेशनल यूथ टीम में बाएं हाथ के बल्लेबाज के तौर पर चयनित कर लिया गया, जहां उनके द्वारा खेले गए तीन टेस्ट मैचों में उन्होंने एक सेंचुरी और एक हाफ सेंचुरी लगाई। इंग्लैंड में किए गए उनके इस प्रदर्शन के चलते गिलक्रिस्ट को घरेलू मैचों में खेलने के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा और साल 1992 में ही उनका डेब्यू New South Wales की तरफ से हो गया। अपने पहले घरेलू सीजन में गिलक्रिस्ट ने अपनी बल्लेबाजी का शानदार प्रदर्शन करते हुए 30 की औसत से 274 रन बना डाले और अपनी टीम को

Sheffield shield दिलाने में अहम भूमिका निभाई । गौरतलब है कि गिलक्रिस्ट को अपने पहले घरेलू क्रिकेट सीजन में एक भी बार विकेट कीपिंग का मौका नहीं दिया गया। इसके बाद साल 1994 – 95 में उन्होंने घरेलू सीजन वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया की तरफ से खेला जहां उन्हें बल्लेबाजी के साथ-साथ विकेटकीपिंग की भी अहम जिम्मेदारी सौंप दी गई। “लेकिन जो जिम्मेदारी में ना उभरे वह हुनर ही क्या?” विकेट कीपिंग की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए गिली ने उस सीजन में 55 शिकार विकेट के पीछे अपने नाम किए जो कि ऑस्ट्रेलियाई घरेलू क्रिकेट में आज भी एक रिकॉर्ड है। एडम गिलक्रिस्ट लगातार घरेलू क्रिकेट में एक के बाद एक कई कीर्तिमान स्थापित करते जा रहे थे इसके साथ ही  एडम “ गिलक्रिस्ट नाम ” अब धीरे-धीरेऑस्ट्रेलियाई मैदानों पर एक सुर में गूंजने लगा था, जिस की धमक ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड तक पहुंचने लगी थी। हम अगर बात करें घरेलू क्रिकेट में एडमगिलक्रिस्ट के आंकड़ों की उन्होंने कुल 190 मैच खेले हैं जहां उन्होंने रनों का अंबार लगाते हुए 10334 रन ठोक डाले जिसमें 30 शतक और 43 अर्धशतक भी सम्मिलित हैं। वहीं इस दौरान उनका बैटिंग एवरेज 44 से ऊपर का रहा। वहीं उन्होंने 356 लिस्ट ए  मैच खेलें और यहां भी गिलक्रिस्ट ने अपनी आतिशी पारियों की बदौलत रनों का पहाड़ खड़ा करते हुए 11326 रन बना डाले जहां उनका बैटिंग एवरेज 34. 95 का रहा।

Adam Gilchrist

वहीं घरेलू क्रिकेट मैचों में एडम गिलक्रिस्ट ने कैच  और स्टंपिंग मिलाकर कुल विकेट के पीछे 1402 डिस्मिसल्स अपने नाम किए। घरेलू मैचों में एडम गिलक्रिस्ट का बल्ला आग उगल रहा था । एक के बाद  एक कई नई आतिशी पारियां गिली अपनी रिकॉर्ड बुक में जोड़ते चले जा रहे थे। जिस कारण उनका नाम ऑस्ट्रेलियन अखबारों की हैडलाइन बनने लगा था। घरेलू क्रिकेट में अपने निरंतर शानदार प्रदर्शन के चलते एडम गिलक्रिस्ट के वर्षों पहले के सपनों ने भौतिक स्वरूप ले लिया आखिरकार उनका अंतरराष्ट्रीय एक दिवसीय क्रिकेट जगत में  डेब्यू साल 1996 में हो ही गया

हालांकि अपने डेब्यू मैच में एडम गिलक्रिस्ट ने महज 18 रन ही बनाए और एलन डोनाल्ड की बॉल पर वह बोल्ड हो कर पवेलियन की तरफ लौट गए। और इस मैच के बाद एडम गिलक्रिस्ट को टीम से भी ड्रॉप कर दिया ‌‌गया‌।‌‌‍‌ लेकिन साल 1997 में Ian Healy की गैरमौजूदगी में एक बार फिर टीम में एडम गिलक्रिस्ट को मौका दिया गयाऔर यहां उन्हें बल्लेबाजी के साथ-साथ विकेटकीपिंग की अहम भूमिका भी सौंप दी गई

और इस दोबारा मिले मौके को एडम गिलक्रिस्ट ने अपने दोनों हाथों से बटोरा जहां उन्होंने 77 रन की आतिशी पारी खेलते हुए विपक्षी खेमे साउथ अफ्रीका को पूरी तरह से चौंका दिया अपने इसी प्रदर्शन के बूते पर वह इंग्लैंड के खिलाफ टैक्सिको ट्रॉफी में, टीम में जगह बनाने में कामयाब रहे, गिलक्रिस्ट करियर के शुरुआती मैचों में सातवें नंबर पर बल्लेबाजी किया करते थे

जहां बाॅले कम मिलने की वजह से वह अपनी बैटिंग में काफी स्ट्रगल महसूस कर रहे थे उन्होंने अपनी इस परेशानी को अपने कप्तान स्टीव वॉ से बयां किया जिसके बाद स्टीव वॉ  ने उन्हें मार्क  वॉ  के साथ ओपनिंग करने का मौका दिया जिस मौके का फायदा उठाते हुए एडम गिलक्रिस्ट ने साउथ अफ्रीका के खिलाफ ओपन करते हुए वनडे अंतरराष्ट्रीय मैचों में अपना पहला शतक जड़ दिया और इसी के साथ ऑस्ट्रेलिया ने वह मैच 7 विकेट से अपने नाम कर लिया और इस मैच के बाद गिली ने ओपनिंग स्लॉट में अपनी जगह सीमेंट कर ली। जिसके बाद एडम गिलक्रिस्ट ने अपनी बल्लेबाजी के प्रदर्शन में पीछे मुड़कर नहीं देखा लेकिन उनके विकेट कीपिंग करियर में मील का पत्थर साबित हुआ साल 1998 का कोका कोला कप जहां पर गिली ने अपनी आक्रामक विकेटकीपिंग का प्रदर्शन करते हुए,   टूर्नामेंट में  नौ खिलाड़ियों को विकेट के पीछे अपना शिकार बनाया जिसके बाद तत्कालीन विकेट कीपरों की  फेहरिस्त में उनका नाम छलांग मारकर सबसे ऊपर पहुंच गया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जगत में एडम गिलक्रिस्ट का जलवा बढ़ता और बढ़ता ही चला गया।लेकिन साल 1999 में गिलक्रिस्ट के अब तक के क्रिकेट सफर का सबसे बड़ा अवसर आया। वक्त था 1999 क्रिकेट वर्ल्ड कप का। 1999 के वर्ल्ड कप टूर्नामेंट के शुरुआती मैचों में गिली का बल्ला उस तरह नहीं बोला जिस तरह कि उसने ख्याति अर्जित कर रखी थी लेकिन टूर्नामेंट में गिलक्रिस्ट ने बांग्लादेश के खिलाफ 39 गेंदों पर 63 रन  तूफानी अंदाज़ में जड़कर एक बार फिर मोमेंटम अपनी तरफ खींच लिया और 1999वर्ल्ड कप फाइनल में गिलक्रिस्ट ने 36 गेंदों में 54 रन बनाए और ऑस्ट्रेलिया ने वह मैच 8 विकेट से जीता और साल 1999 में ऑस्ट्रेलिया की टीम विश्व विजेता बनी। साल 1999 के क्रिकेट वर्ल्ड कप में एडम गिलक्रिस्ट को मिली अपार सफलता के बाद उसी साल 5 नवंबर को उनका डेब्यू अंतर्राष्ट्रीय टेस्ट क्रिकेट में पाकिस्तान के खिलाफ हो गया जहां उन्होंने अपनी बल्लेबाजी तकनीक का उत्कृष्ट नमूना पेश करते हुए 88 गेंदों पर महत्वपूर्ण 81 रनों का योगदान दिया और पाकिस्तान के खिलाफ अगले ही टेस्ट मैच में जब पूरी ऑस्ट्रेलिया बैटिंग लाइनअप लड़खड़ा गई तब एडम गिलक्रिस्ट ने 149 रनों की बेहद ही मूल्यवान पारी खेलकर ऑस्ट्रेलिया को वह मैच जिताया और उस मैच के बाद से ही एडम गिलक्रिस्ट ऑस्ट्रेलियन टेस्ट स्क्वाड का परमानेंट मेंबर बन गए इसके बाद साल 2000 में एडम गिलक्रिस्ट ने न्यूजीलैंड के खिलाफ तीसरे टेस्ट मैच में अपनी विकेटकीपिंग की क्षमता के नए आयामों की व्याख्या की, जहां उन्होंने दोनों इनिंग्स में कुल मिलाकर 10 कैच पकड़े जो कि आज तक किसी भी ऑस्ट्रेलियाई विकेटकीपर द्वारा की गई बेस्ट विकेट कीपिंग परफॉर्मेंस है और निरंतर ऐसे ही कुछ करिश्माई प्रदर्शन के कारण गिली को साल 2000 के आखिर तक  ऑस्ट्रेलिया का उप कप्तान भी बना दिया गया।गिलक्रिस्ट ने अपने करिश्माई प्रदर्शन को क्रिकेट के दोनों ही प्रारूपों में बरकरार रखा और एक के बाद एक कई बुलंदियों को अपनी प्रतिभा के फीते  से  नापते चले गए ।

Adam Gilchrist Wicket Keeping\

एडम गिलक्रिस्ट के क्रिकेटिंग करियर का सबसे यादगार और भारतीय क्रिकेट का सबसे खराब पल साल 2003 का क्रिकेट वर्ल्ड कप रहा इस टूर्नामेंट में एडम गिलक्रिस्ट के बल्ले से रन किसी तूफानी बादलों की तरह बरस रहे थे । गिली ने 2003 वर्ल्ड कप में 40 की औसत और 105 की स्ट्राइक रेट से 408 रन बनाए और फाइनल में गिलक्रिस्ट ने इंडिया के खिलाफ 48 गेंदों पर 57 रनों की एक संतुलित व तेज शुरुआत दी जिसके बाद भारतीय टीम इस मैच में वापसी नहीं कर पाई और ऑस्ट्रेलिया-भारत को हराते हुए फिर 2003 में एक बार फिर क्रिकेट विश्व विजेता बन गया 2003 वर्ल्ड कप टूर्नामेंट वही टूर्नामेंट था जहां विश्व ने गिलक्रिस्ट को खेल के प्रति सम्मान और अपने व्यक्तित्व के प्रति निष्ठावान होते हुए देखा दरअसल सेमीफाइनल श्रीलंका के खिलाफ खेलते हुए अरविंद डिसिल्वा की गेंद पर गिलक्रिस्ट sweep शॉट मारने  गए और बाॅल बल्ले को बीट करते हुए सीधी गिली के दस्तानों पर  जा लगी और संगकारा ने  तुरंत कैच लपक लिया जिसके अंपायर ने उन्हें आउट  नहीं दिया लेकिन एडम गिलक्रिस्ट अंपायर को बिना देखे ही पवेलियन की तरफ लौट गए। वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल जैसे महा मंच पर होते हुए भी गिलक्रिस्ट का खेल भावना के प्रति सम्मान दिखा जिस कारण पूरे विश्व क्रिकेट से उन्होंने सराहना बटोरी । गिलक्रिस्ट एक एग्रेसिव खिलाड़ी होने के साथ-साथ अग्रेसिव कप्तान भी थे वे मैदान पर स्लेजिंग भी किया करते थे, लेकिन खेल भावना के दायरे में रहते हुए ।उन्होंने अपने पूरे क्रिकेट करियर में ना तो कभी चीटिंग की और ना ही ऐसा करने का प्रयास किया और यही बात उन्हें आस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की भीड़ से अलग करती है2003 वर्ल्ड कप जीत के बाद एडम गिलक्रिस्ट ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट के साथ-साथ विश्व क्रिकेट के भी महान खिलाड़ियों में से एक बन चुके थे साल 2003 वर्ल्ड कप के बाद गिलक्रिस्ट ने साल 2007 का क्रिकेट वर्ल्ड कप भी खेला जो उनके अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जगत का आखरी वर्ल्ड कप टूर्नामेंट साबित हुआ और इस टूर्नामेंट में भी गिलक्रिस्ट ने अपनी अद्भुत फॉर्म जारी रखी और इस वर्ल्ड कप के खेले गए अपने 11 मैचों मे 45 की बैटिंग एवरेज से 453 रन बनाए और इसी वर्ल्ड कप टूर्नामेंट के फाइनल में  श्रीलंका के खिलाफ गिली बल्ले से उनके क्रिकेट करियर की सबसे यादगार पारी निकली, गिलक्रिस्ट ने लंका के खिलाफ फाइनल में  104 गेंदों पर 149 रनों की आतिशी पारी खेली जिसमें उन्होंने 13 चौके और 8 छक्के जड़े। और अपनी इसी शानदार पारी के बाद गिलक्रिस्ट दर्शकों की नजर में हीरो से विलन भी बन गए, दरअसल हुआ यूं कि शतक पूरा करने के बाद सेलिब्रेशन में गिलक्रिस्ट ने दर्शकों के सामने अपने बल्ले के साथ अपना ग्लव्स भी दिखाया जो कि किसी गोल संरचना के कारण उभरा हुआ लग रहा था इस घटना को सभी क्रिकेट दरशक ग्राउंड और विश्व क्रिकेट जगत के दर्शक टेलीविजन पर देख रहे थे साथ ही मैदान पर खड़े श्रीलंकाई प्लेयर्स भी देख रहे थे मैच के बाद गिलक्रिस्ट ने खुद बताया कि मैच के दौरान उन्होंने अपने  ग्लव्स के अंदर Squash  की बाॅल  रखी थी, जिससे कि शॉट खेलने में उन्हें ज्यादा स्टेबिलिटी मिल सके हालांकि इसके बाद श्रीलंकाई क्रिकेट बोर्ड ने आईसीसी से इस मामले में गिलक्रिस्ट की शिकायत भी की जिसके बाद गिलक्रिस्ट ने अपना पक्ष आईसीसी के सामने बड़ी मजबूती से रखा और आईसीसी की मोटी सी रूल बुक में ऐसा कोई भी रूल नहीं था जो कि इस घटना को चीटिंग करार दे सके, जिसके बाद आईसीसी ने पूर्ण जांच परख करने  के बाद यह साफ कर दिया कि गिलक्रिस्ट ने किसी भी प्रकार से खेल भावना को ठेस नहीं पहुंचाई है।

Adam Gilchrist Cheating

और यदि 2007 क्रिकेट वर्ल्ड कप में मचे इस बवंडर को अलग करके देखा जाए तो गिलक्रिस्ट ने अपनी टीम को लगातार तीसरी बार विश्व कप का खिताब जितवा दिया था और यहीं से ऑस्ट्रेलियाई टीम में “अजेयी” विशेषण  जुड़ना शुरू हो गया था। हालांकि 2008 की बॉर्डर गावस्कर ट्रॉफी के बाद गिलक्रिस्ट ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कह दिया। जिस पर तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री केविन रूड ने प्रतिक्रिया देते हुए ऑस्ट्रेलियाई कप्तान एडम गिलक्रिस्ट से रिटायरमेंट वापस लेने की अपील भी की थी।

लेकिन इस अपील के बाद भी ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट का “ये” सूरज दोबारा अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट जगत में उदय नहीं हुआ।

और अगर हम बात करें एडम गिलक्रिस्ट के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर के आंकड़ों की तो उन्होंने कुल 96 टेस्ट , 287 O.D.I और 13 T20 मैच खेले हैं जिनमें उन्होंने क्रमशाह 5570 , 9619 , वो 272 रन बनाए हैं, इसके साथ ही गिली  अपना जलवा इंडियन प्रीमियर लीग में भी बिखेर चुके हैं जहां वे 2008 से 2010 तक डेकन चारजर का हिस्सा रहे वही 2011 से 2013 तक किंग्स इलेवन पंजाब के स्क्वाड में शामिल रहे गिलक्रिस्ट ने अपने द्वारा खेले गए कुल 80 आईपीएल मैचों में 2069 रन 27.2 की बैटिंग औसत से बनाएं है। वहीं अगर हम बात करें एडम गिलक्रिस्ट के निजी जीवन की तो गिली ने अपनी शादी अपनी बचपन की दोस्त मेलिंडा गिलक्रिस्ट से रचाई है जिससे उनके तीन बेटे और एक बेटी भी है, और आजकल एडम गिलक्रिस्ट ऑस्ट्रेलिया में बतौर कमेंटेटर और क्रिकेट एक्सपर्ट की भूमिका में नजर आते रहते हैं

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