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फिल्मी दुनियाँ हो या खेल का मैदान या कोई भी ऐसा फील्ड जहाँ एक शख़्स अपना रास्ता ख़ुद तय करता है और बिना किसी के सहारे, अपने दम पर अपनी मंज़िलों को हासिल कर लेता है। यक़ीनन ऐसी शख्सियत के बारे में जानने का मन किसे नहीं होता होगा। आप सभी की फरमाइश पर आज हम एक ऐसी ही शख्सियत से जुड़े कुछ रोचक और अनसुने किस्सों को आपसे साझा करने वाले हैं, और वो शख़्सियत हैं जाने माने अभिनेता कँवलजीत सिंह।

नमस्कार दोस्तों…

अभिनेता कंवलजीत जी का जन्म 19 सितम्बर 1951 को उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में एक सिख परिवार में हुआ था। सहारनपुर में ही पले बढ़े कंवलजीत ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद पुणे के फ़िल्म्स एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया यानि FTII से ऐक्टिंग का कोर्स किया।

दोस्तों कंवलजीत जी के FTII में दाखिला लेने का भी एक बड़ा ही रोचक किस्सा है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि कँवलजीत जी का अभिनय के क्षेत्र में आने का कोई इरादा नहीं था 17 वर्ष की उम्र में उनका सपना एयरफोर्स में पायलट बनने का था। यहाँ तक कि उन्होंने बाकायदा उसके लिये तैयारी कर एन डी ए की परीक्षायें भी दीं, उन्होंने एक बार एयरफोर्स की परीक्षा पास भी कर ली थी लेकिन उसके बाद भी उनका सेलेक्शन नहीं हो सका क्योंकि उन्हें दाहिने कान से काफी कम सुनाई देता है। हालांकि अपने एक कान से कम सुनाई देने का वो अक्सर फायदा भी उठा लिया करते हैं ऐसा उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें जब किसी की बात को नज़रअंदाज़ करना होता है तो वे अपनी इसी कमज़ोरी का बहाना बना लेते हैं ये कहकर कि “साॅरी यार सुन नहीं सका था ठीक से।”

ख़ैर हम बात कर रहे थे कंवलजीत के FTII जाने और अभिनेता बनने के सफर के बारे में। दरअसल कंवलजीत को ऐसा लगता था कि जीवन में कुछ करना है तो छोटे शहर से निकल किसी बड़ी जगह जाना होगा लेकिन इसके लिये उन्हें कोई नौकरी करनी होगी या किसी ट्रेनिंग के बहाने ही बाहर निकलने का मौक़ा मिल सकता है। कई सारी परीक्षायें देने के बाद भी उन्हें कोई सफलता तो नहीं मिल सकी लेकिन उसी दौरान उनके एक दोस्त के घर पर एक पत्रिका में छपे FTII के एक इश्तेहार पर उनकी नज़र पड़ गयी जिसमें वहाँ एडमिशन लेने से संबंधित जानकारी दी गयी थी। कंवलजीत को लगा कि ये एक अच्छा मौक़ा है सहारनपुर से बाहर निकलने का। बस फिर क्या था वो पहुँच गये अपने एक फोटोग्राफर मित्र के पास अपनी फोटो निकलवाने, साथ ही उन्होंने उसे यह भी हिदायत दी कि जब तक मेरा सेलेक्शन न हो जाये तब तक यह बात लीक नहीं होनी चाहिए। दरअसल कंवलजीत नहीं चाहते थे कि अगर किसी वज़ह से उनका सेलेक्शन न हो सका और उन्हें वापस आना पड़ा तो कोई उनका मज़ाक उड़ाये और कहे कि ‘हीरो बनने गया था और लौट आया।’

Kanwaljit Singh

बहरहाल उन्होंने अपनी तस्वीरें और फाॅर्म वगैरह FTII को भेज दिया और जल्दी ही उन्हें  ऑडिशन के लिये बुला लिया गया, जिसका सेंटर दिल्ली के एन एस डी यानि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में था। ऑडिशन से ठीक एक दिन पहले दिल्ली में ही अपने चाचाजी के ज़रिये उनकी मुलाक़ात जाने माने रंगकर्मी हबीब तनवीर जी से हुई। उन्होंने कंवलजीत से पूछा “ऑडिशन के लिये क्या तैयारी है? कुछ करके दिखाओ ज़रा।” कंवलजीत जो कि देव आनंद जी के ज़बरदस्त फैन थे उन्होंने अपना तैयार किया हुये सारे संवाद को देव आनंद जी के अंदाज़ में अभिनय करते हुये सुना दिया। हबीब तनवीर जी ने हँसते हुये कहा कि “अगर तुम देव साहब की एक्टिंग करोगे तो देव साहब क्या करेंगे?” दरअसल कंवलजीत को अभी तक यही पता था कि  देव साहब, राज कपूर जी या दिलीप कुमार जी जैसे करते हैं वैसे ही करने को ऐक्टिंग कहते हैं। हबीब तनवीर ने समझाया कि किसी की नकल नहीं करना है आपको नॉर्मल तरीक़े से ही बोलना है जैसे आम ज़िन्दगी में आप बोलते हैं।  कंवलजीत को बात समझ में आ गयी, उन्होंने अभ्यास करके सफलता पूर्वक ऑडिशन दिया और उन्हें पुणे से बुलावा भी आ गया। कंवलजीत जी को अब अपना सपना साकार लगने लगा क्योंकि अब उन्हें इस बात पर विश्वास हो गया था कि अब वो आराम से लम्बे वक़्त तक बाहर पुणे जैसे शहर में रह सकेंगे।

दोस्तों कंवलजीत जी का पूणे जाने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है जिसका ज़िक्र उन्होंने अपने कई इंटरव्यूज़ में किया है। हुआ ये कि जब वो पुणे के लिये निकले तो उनकी ट्रेन पहले मुंबई के एक स्टेशन ‘मुंबई सेंट्रल’ पहुँचनी थी फिर उसके बाद उन्हें अगली ट्रेन मुंबई के ही दूसरे स्टेशन ‘सी एस टी’ जो कि उस वक़्त ‘वी टी’ स्टेशन के नाम से जाना जाता था, वहाँ से पकड़नी थी। मुंबई सेंट्रल पहुँच कर उन्होंने वहाँ से वी टी के लिये एक टैक्सी ली, टैक्सी वाला भी मीटर डाउन कर चल पड़ा लेकिन पता नहीं टैक्सी वाले ने जान बूझकर या फिर शार्टकट के चक्कर में टैक्सी को किसी ऐसे रास्ते से ले गया जहाँ औरते लड़कियाँ ऐसे खड़ी थीं जैसे भेड़ बकरियां बेची जा रही हों वे इशारे कर-कर के सबको बुला रही थीं। कंवलजीत को वो सब बहुत अजीब सा लगा, उन्होंने ड्राईवर से पुछा कि क्या है ये सब? तो ड्राइवर ने बताया कि ये रेड लाइट एरिया है कंवलजीत जी को यह सब देखकर बहुत तक़लीफ़ हुई उन्हें लगने लगा कि वे ग़लत जगह आ गये हैं, उस माहौल को देख उनका मन पूरी तरह से ख़राब हो गया और वे सोचने लगे कि उन्हें सहारनपुर वापस लौट जाना चाहिए।

इसी उधेड़बुन में उनकी टैक्सी वी टी स्टेशन पहुँच गयी और उनकी निगेटिविटी फिर से पॉजिटिवटी में बदल गयी। कंवलजीत वहाँ से पूणे रवाना हुए और वहाँ पहुँचकर उन्होंने FTII की ट्रेनिंग पूरी की और इसके बाद मुंबई आकर फ़िल्मों में प्रयास करना शुरू कर दिया।

वर्ष 1977 में उन्हें उनकी पहली फिल्म मिली ‘शंकर हुसैन’ जिसे बना रहे थे उस दौर के जाने माने निर्माता निर्देशक व गीतकार कमाल अमरोही जी। हालांकि वह फिल्म बनने में 3 वर्ष लग गये इस बीच उनकी दूसरी साइन की हुई फिल्म पहले रिलीज़ हो गयी उस फिल्म का नाम था ‘दास्ताँने लैला मजनूँ’ जो कि उनकी डेब्यू फिल्म बन गयी। इस फिल्म का एक गाना बहुत हिट हुआ था ‘कहीं एक मासूम सी एक लड़की’ जिसे कि रफ़ी साहब ने बहुत ही अलग अंदाज़ में गाया था। इसके बाद उन्होंने हम रहे न हम, शक़, सत्ता पे सत्ता और अशांति जैसी कई फिल्मों में काम किया।

Kanwaljit Singh

फिल्मों में काम करने के बाद उन्होंने टेलीविज़न का रुख़ कर लिया क्योंकि उनकी फिल्में सफल नहीं हो रही थी और जो हो रही थीं उससे उन्हें कुछ ख़ास फायदा भी नहीं मिल रहा था।

दोस्तों बहुत से लोग यह समझते हैं कि उनका पहला धारावाहिक बुनियाद था जिससे उन्होंने टेलीविज़न पर अपने अभिनय की शुरूआत की लेकिन ऐसा नहीं है। जाने माने निर्माता निर्देशक रमेश सिप्पी जी के बुनियाद से पहले उन्हीं के बैनर तले एक धारावाहिक बना था जिसका नाम था ‘छपते-छपते’, इस धारावाहिक से ही कंवलजीत ने टेलीविज़न पर शुरुआत की थी,  इस धारावाहिक के ज़्यादातर कलाकारों को बुनियाद में मौक़ा दिया गया था। धारावाहिक बुनियाद से उनकी एक पहचान तो बन गयी लेकिन सोने पे सुहागा तब हुआ जब कंवलजीत ने धारावाहिक फरमान में काम किया। जाने माने निर्देशक लेख टंडन जी के इस बेहद ही सफल धारावाहिक में कंवलजीत द्वारा निभायी एक नवाब की भूमिका से उनकी पहचान घर घर में हो गयी। हालांकि यह किरदार शुरू में कुछ नकारात्मक सा था लेकिन धीरे-धीरे उस किरदार के बदलते रूप ने अपने साथ-साथ कंवलजीत को भी सभी का चहेता बना दिया। इसके बाद तो उन्होंने ढेरों धारावाहिकों में सशक्त भूमिकाओं को निभाई जिनमें सांस, फैमिली नंबर 1, अभिमान, सिसकी, सारा आकाश और सबकी लाडली बेबो  आदि प्रमुख हैं।

बतौर चरित्र अभिनेता दिल मांगे मोर, कुछ मीठा हो जाये, हमको तुमसे प्यार है, मन्नत, बैंग बैंग, फिर से, कप्तान, वन नाईट स्टैंड और तुम बिन-2 आदि ढेरों फिल्मों में कंवलजीत ने हर तरह के किरदारों को अपने मौलिक अभिनय से जीवंत किया। कंवलजीत जी ने निर्देशक लेख टंडन जी की आख़िरी अधूरी फिल्म ‘फिर उसी मोड़ पर’ को भी पूरा करवाया इस फिल्म को बनाने के दौरान लेख टंडन जी के देहांत हो जाने की वज़ह से यह फिल्म अधूरी रह गयी थी। इस फिल्म को विभिन्न फिल्म फेस्टिवल में कई अवाॅर्ड्स भी मिले।

दोस्तों कंवलजीत  हिंदी के साथ साथ पंजाबी फिल्मों के भी एक सफल अभिनेता के रूप में जाने जाते हैं, साथ ही उन्होंने टाइपराइटर और होस्टेसेज़ जैसे कुछ वेब शोज़ में भी काम किये हैं और वो आज भी उसी उत्साह के साथ सक्रिय हैं। 

टीवी और फिल्मों में काम करने के अलावा उन्होंने रंगमंच पर ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ नाम के मशहूर नाटक में भी काम किया है। हालांकि उन्हें शुरूआत से ही रंगमंच से एक डर सा लगता था और उस पर से उनसे पहले भरत कपूर और लेजेंडरी ऐक्टर बलराज साहनी जैसे दमदार अभिनेताओं ने इस किरदार को अपने दमदार अभिनय से एक अलग ऊँचाई दे दी थी। उन्होंने बताया कि फिल्मों और टीवी शो में तो ऐक्टर को अपनी गलती सुधारने के लिए कई टेक मिलते है, लेकिन थिएटर में दूसरा मौका नहीं मिलता, और नाटक के दौरान अगर ऐक्टर अपने डायलॉक्स भूल गया तो दर्शकों के सामने उसका मज़ाक बन जायेगा। इसलिए वो थिएटर से हमेशा दूर ही रहते थे लेकिन इस डर के बावज़ूद उन्होंने रंगमंच पर शानदार अभिनय किया और वहाँ भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया। इस नाटक को करने में उन्हें जितना डर लगा उससे कहीं ज़्यादा उन्हें एक सुकून मिला क्योंकि वे मिर्ज़ा ग़ालिब को पहले से ही बहुत दिल से मानते थे। न सिर्फ मिर्ज़ा ग़ालिब बल्कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ सहित जितने भी बड़े शायर रह चुके हैं सबको उन्होंने ख़ूब पढ़ा है। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि जब फ़ैज़ साहब की डेथ हुई थी तो कँवलजीत ने पूरे 3 दिन अपने बंद कमरे में उनकी किताबों को पढ़ते रहे। आइये अब एक नज़र डाल लेते हैं उनकी निजी ज़िंदगी पर। कंवलजीत जी की पत्नी का नाम है अनुराधा पटेल जो कि 80 के दशक की एक जानी मानी अभिनेत्री रह चुकी हैं। 30 अगस्त 1961 को मुंबई में पैदा हुईं अनुराधा पटेल का संबंध काफी बड़े फिल्मी परिवार से है, लेजेंडरी ऐक्टर अशोक कुमार जी रिश्ते में अनुराधा के नाना लगते हैं। अनुराधा ढेरों टीवी शोज और फिल्मों में नजर आ चुकी हैं उनके अभिनय जीवन की शुरुआत वर्ष 1983 में रिलीज हुई फिल्म ‘लव इन गोवा’ से हुई। उसके बाद वे वर्ष 1984 में रिलीज हुई फिल्म ‘उत्सव’ में रेखा की सहेली के किरदार में नजर आईं। इस फिल्म के एक सदाबहार गीत ‘बन मन क्यों बहका रे बहका’ को आज भी लोग उसी शिद्दत से देखते और सुनते हैं। वर्ष 1987 में प्रदर्शित फिल्म ‘इजाजत’में अपने शानदार अभिनय से अनुराधा ने सबका दिल जीत लिया फिल्म के गीत ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है’ में उनकी ख़ूबसूरती और शानदार अदायगी के दर्शक आज भी कायल हैं । दूरदर्शन पर प्रसारित अपने पहले धारावाहिक छपते छपते में कँवलजीत और अनुराधा पटेल ने साथ काम किया था हालांकि इसके अलावा भी इन्हें दो फिल्मों में एक साथ काम करने का मौक़ा मिला था लेकिन उनमें से एक फिल्म पूरी न हो सकी जिसका नाम था ‘खिलाड़ी’ और दूसरी फिल्म थी ‘झूठी शान’ जिसमें बाद में उनकी जगह अभिनेत्री पल्लवी जोशी को रिप्लेस कर दिया गया।

Kanwaljit Singh

गई जो बाद में मोहब्बत में बदल गयी। 13 अप्रैल 1988 को कंवलजीत सिंह और अनुराधा पटेल वैवाहिक बंधन में बंध गये। सदा सुहागन, धर्म अधिकारी, रुखसत, दयावान, दीवाने, तुझे मेरी कसम,  ‘जाने तू या जाने ना’  रेडी और रब्बा मैं क्या करूं जैसी ढेरों फिल्मों में काम करने के अलावा अनुराधा कुछ धारावाहिकों जैसे ‘देखो मगर प्यार से’ और ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में कैमियो रोल्स करती भी नज़र आयीं, साथ ही उन्होंने कई बड़े विज्ञापनों में भी काम किया। दोस्तों अनुराधा पटेल जी का मुंबई में ‘पर्सनालिटी डवलपमेंट’ का अपना एक इंस्टिट्यूट भी है। 

 अनुराधा और कंवलजीत की संतानों की बात करें तो उनके दो बेटे और एक बेटी हैं सिद्धार्थ, आदित्य और मरियम। बड़े बेटे सिद्धार्थ सिंगर राइटर और म्यूज़िक कॅम्पोज़र हैं तो छोटे बेटे आदित्य एक जाने माने आर्टिस्ट हैं, मुंबई में अक्सर उनके पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगती रहती है। एक ख़ास बात जो कि कम लोग जानते होंगे कि यू॰एस॰ए॰ में रह रही उनकी बेटी मरियम को उन्होंने गोद लिया था। 

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