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दोस्तों कुछ दिनों पहले आपने कुछ वाययल वीडियोज़ पे गौर किया होगा जिसमें लेजेंड्री एक्टर धर्मेन्द्र जी अपने फार्म हाउस पर खेतों में काम करते और मस्ती करते दिखायी दे रहे हैं .जैसे कोई साधारण  किसान, जिसका फिल्मी दुनियाँ और ग्लैमर से दूर दूर तक कभी कोई नाता ही ना रहा हो। हाँ ये अलग बात है कि बच्चे से लेकर बूढ़े तक हर कोई उन्हें पहचानता है. न सिर्फ पहचानता है बल्कि दिलो जान से चाहता भी है। धर्मेन्द्र को यूँ खेतों में काम करते हुये दिखना कोई दिखावे की बात नहीं.. ना ही ताज्जुब करने की बात है . ताज्जुब की बात इसलिये नहीं है क्योंकि धर्मेन्द्र जी की जड़ें इन्हीं खेतों से जुड़ी हैं इनके  बचपन और जवानी के शुरुआती दिनों का खेतों से बड़ा गहरा संबंध रहा है।

Dharmendra on his Farm house

इन बातों को और गहराई से समझने के लिये आइये एक नज़र उनकी ज़िन्दगी से जुड़े ख़ास पहलुओं पर डालते हैं जो कि बहुत ही दिलचस्प और प्रेरणा दायक भी है।

दोस्तों धरम सिंह देओल यानि सुपर स्टार धर्मेन्द्र जी का जन्म 8 दिसम्बर, 1935 को पंजाब के नर्साली गाँव में हुआ था जो कि लुधियाना ज़िले में स्थित है। वो 6 भाई बहनों में से एक हैं। उनके पिताजी श्री केवल किशन सिंह देओल एक अध्यापक थे और अक्सर उनका तबादला होता रहता था लेकिन लुधियाना के ही सहेनवाल गाँव जो कि अब काफी विकसित और चर्चित कस्बा है यहाँ  आने के बाद उनका मन वहीं लग गया और फिर वो  वहीं के होके रह गये। लोग धर्मेन्द्र जी की पहचान भी उसी गाँव से करते हैं। क्योंकि धर्मेन्द्र जी ने  बचपन से लेकर जवानी तक का समय यहीं गुज़ारा ।  दोस्तों धर्मेन्द्र जी के बचपन की सबसे बड़ी परेशानी थी उनकी पढ़ाई ,क्योंकि एक तो उनका पढ़ाई में मन  नहीं लगता था ऊपर  से पिताजी का उसी स्कूल में पढ़ाना जिस स्कूल में वो पढ़ा करते थे और ऐसे में उनके पिताजी का ज़्यादा ध्यान उन्हीं पर रहता । धर्मेन्द्र जी की माँ का नाम है श्रीमती सतवंत कौर वो अपनी माँ से हमेशा ये कहते कि या तो मेरी पढ़ाई बन्द करवा दो या मेरा स्कूल बदलवा दो।

Dharmendra with his mother

धर्मेन्द्र जी ने उसी दौरान बँटवारे का दर्द भी महसूस किया जब उनके चहेते अध्यापक और कुछ दोस्त पाकिस्तान चले गये.

 धर्मेन्द्र जी ने साहेनवाल गाँव के सरकारी उच्च माध्यमिक विद्यालय जिसमें  उनके पिताजी भी अध्यापक थे वहीं से आठवीं और अपनी बूआ के गाँव में रहकर जो कि फगवाड़ा में स्थित है वहीं के रामगढ़िया काॅलेज से मैट्रिक यानि हाई स्कूल पास कर के रेलवे स्टेशन पे क्लर्क की जाॅब करने लगे। धर्मेन्द्र  को फिल्मों के प्रति गजब की दीवानगी थी। किशोरावस्था में  वो फिल्में देखने के लिये बहुत दूर तक निकल जाया करते थे । फिल्मों के प्रति अपनी इस दीवानगी को लेकर उन्होंने एक बड़ी मज़ेदार घटना बताई- हुआ यूँ कि एक बार धर्मेन्द्र कोई फिल्म देखने अपनी बूआ के घर फगवाड़ा से दूर जालंधर में एक सिनेमा हाॅल  में गये जहाँ वो हमेशा जाया करते थे ,क्योंकि वही सिनेमा हाॅल सबसे नजदीक  था .और समय पर पहुँचने के लिये बस की सुविधा भी थी । बस निकलने का समय ऐसा था कि फिल्म ख़त्म होने से पहले ही उन्हें निकलना पड़ता था . उस रोज़ भी वो फिल्म को छोड़ जल्दी जल्दी पहुँचे लेकिन बस कंडक्टर उनके गाँव की सवारी फुल करके आगे की सवारियाँ बिठा रहा था .और धर्मेन्द्र के कहने पे भी ध्यान नहीं दे रहा था। धर्मेन्द्र ने दिमाग लगाया और कंडक्टर की नज़र बचा के धीरे से जा कर  बस की छत पर  बैठ गये और जब फगवाड़ा आया तो उतरने लगे . तभी कंडक्टर की निगाह उन पर पड़ गयी और उसने गालियाँ देनी शुरू कर दीं धरम जी ने जब गालियाँ सुनीं तो दूसरी तरफ से उन्होंने भी जम के गालियाँ दे डालीं। कंडक्टर उनको पकड़ने के लिये दौड़ा लेकिन पहले से तैयार धर्मेन्द्र इतनी तेज़ी से भागे कि सीधा घर ही जा के रुके.  ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने सुरैया और श्याम अभिनीत 1949 की फिल्म दिल्लगी को  40 बार देखा .और ऐसे ही फिल्में देखते मस्ती करते न जाने कब हीरो बनने का ख़्याल उनके दिलो दिमाग पर छा गया .उन्होंने अपने हीरो बनने की चाहत को माँ से भी कहना शुरू कर दिया लेकिन माँ उन्हें समझाती कि उनके पिताजी को पता चला तो बहुत नाराज़ हो जायेंगे और तू इतना सुन्दर भी नहीं कि हीरो बन सके । 

बहरहाल वक़्त गुज़रता रहा और  धर्मेन्द्र की रेलवे में नौकरी के बाद सन् 1954 में 19 वर्ष की उम्र में प्रकाश कौर जी से उनकी शादी हो गयी। अपने ख़्वाब को अपने सीने में दबा कर  धर्मेन्द्र नौकरी के साथ साथ खेतों में अपना वक़्त देने लगे । धर्मेन्द्र जी अक्सर सहेनवाल रेलवे स्टेशन के पूल पे जाया करते और बंबई जाने वाली ट्रेन फ्रंटियर मेल को देखा करते। धर्मेन्द्र जब घर पर होते और रात 11 बजे ट्रेन की आवाज़ सुनाई देती तो वो यही मनाते “हे फ्रंटियर ट्रेन माता किसी तरह मुझे मुंबई पहुँचा दो” .इस दौरान उन्होंने दिलीप कुमार की ख़ूब फिल्में देखी और घर पर अक्सर आइने के सामने अपने बालों को आगे गिराकर दिलीप कुमार जी की स्टाइल मारते। 1958 की बात है एक बार फिर उन्होंने अपनी माँ से कहा कि मुझे हीरो बनना है ,बंबई जाना है तो इस बार उनकी माँ ने उनको एक सुझाव दिया कि “तू फिल्म वालों को एक अर्जी क्यों नहीं लिख देता वो तुझे ख़ुद ही बुला लेंगे फिर तेरे पिताजी भी मना नहीं कर पायेंगे” धर्मेन्द्र को माँ की इस मासूम सलाह से एक हौसला और ढांढस तो मिला लेकिन वो लिखें किसे ?इसी उधेड़बुन में कुछ दिन निकल गये। लेकिन इसे संयोग कहिये या माँ के दिल की सच्ची दुवायें , एक दिन फिल्म फेयर पत्रिका के टैलेन्ट हंट का एक विज्ञापन अख़बार में आया जिसमें उस दौर की दो बड़ी हस्तियों के नाम भी थे एक तो बिमल राॅय और दूसरा गुरुदत्त। बस क्या था धर्मेन्द्र को अपनी राह मिल गयी और उन्होंने उस विज्ञापन के आधार पर तस्वीरें खिंचाईं और अपनी सारी जानकारियाँ अपना रंग, ऊँचाई और वज़न वगैरह के बारे में लिखकर अर्ज़ी भेज दी । वो विज्ञापन  जैसे उनके लिये ही उनकी किस्मत ने छपवाया था . फिर क्या था बंबई से बुलावा आ ही गया और पिताजी से इजाज़त भी मिल गयी.

धर्मेन्द्र जी की ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं था साथ ही साथ उनकी माँ और पत्नी भी उनके लिये ख़ुश थे।

माता-पिता का आशीर्वाद ले कर पत्नी और बच्चों को उन्हीं के पास छोड़ धर्मेन्द्र फ्रंटियर मेल से अपनी मंज़िल की ओर चल पड़े .

बंबई पहुँच कर वो सबसे मिले और उन्हें सबने पसंद भी किया। बंदिनी फिल्म के लिये वो सेलेक्ट भी कर लिये गये लेकिन उस फिल्म को बनने में अभी काफी वक़्त था। तब तक उन्हें काम तलाशना ही था ,वो भी हीरो का क्योंकि बनने तो वही आये थे। फिर क्या था संघर्ष शुरू हुआ . धर्मेन्द्र ख़ुद कहते हैं कि उनका वो एक साल  बहुत कठिन गुज़रा। उन्होंने जुहू के पास किराये का एक कमरा लिया और लोगों से मिलना शुरू किया .इस संघर्ष में उनके साथी थे हरिकिशन गिरी गोस्वामी जी जिन्हें हम महान एक्टर और फिल्म मेकर मनोज कुमार  के नाम से जानते हैं। लेकिन संघर्ष की ये राह इतनी भी आसान नहीं थी . कभी-कभी तो भूखे रहने की भी नौबत आ जाती उनका वज़न भी गिरने लगा। एक क़िस्सा यह भी सुनने को मिलता है कि एक बार वो भूख से इतने बेहाल थे कि पाचन के लिये इस्तेमाल की जानेवाली ईसबगोल की भूसी को ही पूरा खा लिया जिससे उनकी तबीयत भी  बिगड़ गयी। उन्हें तुरंत डाॅक्टर के पास ले जाया गया, जहाँ डॉक्टर ने यही सलाह दी कि इन्हें दवा की नहीं भरपेट खाने की ज़रूरत है। धर्मेन्द्र धीरे-धीरे हिम्मत हारने लगे और गाँव लौटने का मन बना लिया लेकिन उनके दोस्तों ने उन्हें समझाया कि कुछ दिन और देख लो .अर्जुन हिंगोरानी जी एक फिल्म बनाने वाले हैं शायद उसमें तुम्हें काम मिल जाए। धर्मेन्द्र को भी अर्जुन हिंगोरानी का नाम सुन के थोड़ा सा यक़ीन हुआ क्योंकि वो उन्हें उसी वक़्त से पसंद करते थे जब पंजाब से बंबई आये थे। 1-2 दिन में ही अर्जुन जी ने  ने उन्हें अपनी पहली फिल्म के लिये साइन कर लिया और उस फिल्म का नाम था *दिल भी तेरा हम भी तेरे*  इस फिल्म में उनकी हिरोइन थीं उस ज़माने की मशहूर ऐक्ट्रेस कुमकुम , और यह फिल्म 1960 में रिलीज़ हुई। फिल्म के कुछ ख़ास न चल पाने की वज़ह से धर्मेन्द्र को विशेष फायदा तो नहीं हुआ लेकिन एक काम कर लेने से थोड़ा हौसला ज़रूर बढ़ गया और लोगों को बताने के लिये एक फिल्म भी हो गयी। धर्मेन्द्र का संघर्ष तो ख़त्म नहीं हुआ लेकिन उसका रूप ज़रूर बदल गया । पहले सिर्फ काम को पाने के लिये संघर्ष करना था और अब अच्छा काम पाने और अपनी पहचान बनाने का संघर्ष भी उसमें जुड़ गया था। कुछ एक और फिल्में भी आयीं जिसमें बिमल रॉय की बँदिनी फिल्म भी थी। कुछ फिल्में थोड़ी बहुत चलीं और कुछ असफल रहीं।  हालांकि इस दौर की कुछ फिल्में बहुत ही खूबसूरत और क्लासिक भी हैं जिनमें धर्मेन्द्र जी को कुछ अलग और उम्दा कैरेक्टर्स में अभिनय करते देख कर  उनके अभिनय के विभिन्न पहलुओं को महसूस किया जा सकता है जैसे अनपढ़, बंदिनी, पूजा के फूल, अनुपमा और बहारें फिर भी आयेंगी वगैरह। धर्मेन्द्र जी को जिस फिल्म ने  ज़बरदस्त शोहरत दिलायी वो थी *फूल और पत्थर* इस फिल्म ने ही उन्हें रोमांटिक हीरो से निकाल कर एक ऐक्शन हीरो की ईमेज भी दिला दी। जिसका उन्हें फायदा भी हुआ और नुकसान भी। फायदा ये कि ऐक्शन से भरी फिल्में इन्हें ख़ूब मिलने लगीं और नुकसान ये कि रोमांटिक, काॅमेडी और संजीदा रोल को भी ख़ूबसूरती से निभाने वाले महान अभिनेता को धीरे-धीरे हर फिल्म मे ऐक्शन वाले रोल मिलने लगे। हालांकि दर्शकों ने उन्हें हर रोल में पसंद किया। इसी फिल्म से जुड़ा एक क़िस्सा यह भी है कि एक दिन शूटिंग के बीच ख़ाली वक़्त में धर्मेन्द्र को थोड़ी झपकी आ गयी यह देख फिल्म के निर्देशक  ने गुस्से से यह बात बोल दी कि “पता नहीं कहाँ कहाँ से पियक्कड़ आ जाते हैं हीरो बनने के लिये” यह बात धर्मेन्द्र को बहुत नागवार गुज़री और उन्होंने उस रोज़ गुस्से में जम कर शराब पी और बाद में एक आदत सी बन गई। लेकिन स्वास्थ्य के प्रति जागरूक धर्मेन्द्र जी अपने दृढ़ निश्चय और परिवार की मदद से धीरे-धीरे इस लत से मुक्ति भी पा गये।

Dharmendra With Prithvi Raj Kapoor

बहरहाल धर्मेन्द्र जी की फिल्में सफल होने लगीं .उनपर फिल्माये गीत जिसमें उनकी आवाज़ बनें महान गायक मोहम्मद रफ़ी साहब जिन्हें लोग आज भी बड़े चाव से सुनते और गुनगुनाते हैं। बाद में महेंद्र कपूर जी और किशोर दा ने भी उनके लिये ढेरों गीत गाये। धर्मेन्द्र जी का फिल्मी सफर इतना लम्बा है कि उनके लिये 80 और 90 तक के गायकों ने भी प्ले  बैक किया। इनकी  सफल फिल्मों की लिस्ट इतनी लम्बी है की इस वीडियो में उन सबका नाम ले पाना असंभव सा है . धर्मेन्द्र जी ने हर तरह के किरदार  किये .आयी मिलन की बेला फिल्म में उन्होंने ग्रे शेड के कैरेक्टर का रोल किया जो पूरी तरह से तो निगेटिव तो नहीं था लेकिन उनकी छवि से बिल्कुल विपरीत था। फिल्म शोले में सबसे बड़ा रोल धर्मेन्द्र का ही था ये अलग बात है कि उस फिल्म से फायदा हर किसी को मिला। धर्मेन्द्र जी ने 300 से भी अधिक फिल्मों में काम किया है और अभी भी समय समय पर चुनिंदा फिल्मों में अपनी सशक्त भूमिका के साथ नज़र आते रहते हैं। धर्मेन्द्र जी ने अपने दौर की सभी प्रसिद्ध अभिनेत्रियों के साथ काम किया और सफल रहे। माला सिन्हा, आशा पारेख, वेजयन्ती माला, मीना कुमारी, शर्मीला टैगोर, शायेरा बानो, तनुजा, लीना चंद्रावरकर, राखी, हेमामालिनी ये फेहरिस्त बड़ी लम्बी है । मीना कुमारी जी के साथ उनकी नज़दीकियों के भी काफी क़िस्से चर्चा में आये। हेमामालिनी जी के साथ उनकी जोड़ी को लोगों ने बहुत पसंद किया परदे की यह सफल जोड़ी असल जीवन में भी एक सफल जोड़ी बनी।

धर्मेन्द्र जी फिल्मों के साथ साथ राजनीति में भी सफल रहे और आज भी दोनों ही क्षेत्र में सक्रिय हैं। राजनीति में उनकी शुरुआत सन 2012 में राजस्थान के बीकानेर से हुई जो कि एक सफल शुरुआत रही और वो सफलता आज भी बदस्तूर ज़ारी है।

फिल्मों और राजनीति के बाद आइये कुछ चर्चा कर लेते हैं उनके पारिवारिक जीवन की। हालांकि वो किसी से छुपा नहीं है फिर भी संक्षिप्त में हम जान लेते हैं धर्मेन्द्र अपने 6 भाई बहनों में एक थे। धर्मेन्द्र की बूआ के बेटे यानि उनके फूफेरे भाई वीरेन्द्र सिंह भी फिल्मों से जुड़े थे जो पंजाब में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान आतंकवादियों की गोली के शिकार हो गये थे। धर्मेन्द्र ने दो शादियाँ की थीं पहली पत्नी प्रकाश कौर जी से उनके 4 बच्चे हैं। दोनों बेटों से तो आप सभी परिचित ही हैं बड़ा बेटा अजय सिंह देओल यानि सनी देओल और छोटा विजय सिंह देओल यानि बाॅबी देओल जो कि फिल्मों के सफल ऐक्टर हैं सनी देओल तो एक सफल निर्देशक भी बन चुके हैं। धर्मेन्द्र जी की दोनों बेटियों विजेयता और अजीता का फिल्मों से कोई जुड़ाव नहीं हैं दोनों बहनें यू एस के कैलीफोर्निया में बस चुकी हैं। बेटी विजेयता के नाम पर ही धर्मेन्द्र का प्रोडक्शन हाउस भी है। धर्मेन्द्र की तीसरी पीढ़ी यानि उनके पोते और सनी देओल के बेटे करण देओल की भी फिल्म *पल पल दिल के पास* से बतौर हीरो एक शुरुआत हो चुकी है जिसका निर्देशन सनी देओल ने ही किया है। फिल्म का टाइटल धर्मेन्द्र जी के ही एक सुपरहिट सदाबहार गीत से लिया गया है जिसको महान गायक किशोर कुमार जी ने गाया था।

अब बात करते हैं धर्मेन्द्र जी की दूसरी पत्नी हेमामालिनी जी की जिनसे 2 मई सन् 1980 में धर्मेन्द्र ने शादी की । हेमामालिनी जी खुद  एक महान अभिनेत्री हैं और एक कुशल नृत्यांगना होने के साथ साथ सफल नेत्री व समाज सेविका भी हैं। हेमामालिनी जी के बारे में और उनकी शादी से जुड़े क़िस्सों के बारे में हम यहाँ ज़्यादा चर्चा इसलिये नहीं कर रहे हैं क्योंकि इनके बारे में अलग-अलग एक-एक एपीसोड बन सकते हैं आप सबका रेस्पॉन्स अच्छा रहा तो ज़रूर बनाएंगे । धर्मेन्द्र और हेमा जी से 2 बेटियाँ हैं ईशा देओल और आहना देओल जो माँ की ही तरह कुशल नृत्यांगना हैं ईशा देओल ने बहुत सारी फिल्में भी की हैं फिलहाल दोनों बेटियाँ शादी कर अपने पारिवारिक जीवन में व्यस्त  हैं।

धर्मेन्द्र के एक भाई अजीत सिंह देओल के बेटे भी फिल्मों में अभिनय करते हैं और उनका नाम है अभय देओल। खुद अजित सिंह ने भी कई फिल्मों में बतौर एक्टर काम किया है .जो की अब इस दुनिया में नहीं हैं .

धर्मेन्द्र की दरियादिली के बारे में भी हर कोई जानता है। अपनी मिट्टी से जुड़े धर्मेन्द्र कभी अपने संघर्ष के दिनों को नहीं भूले इसीलिए वो हर वक़्त सबकी मदद करते रहे कम पैसों में भी फिल्में साईन करते रहे किसी को ना नहीं कहते थे हालांकि इस दरियादिली का कुछ लोगों ने फायदा भी उठाया। एक फिल्म में तो कुछ सीन्स को मिलाकर और डुप्लीकेट का सहारा लेकर बग़ैर उनकी जानकारी के गन्दे दृश्य बना दिये गये जिसकी जानकारी मिलते ही उनके बेटे सनी देओल ने तुरंत ऐक्शन लेकर उस सीन को हटवाया  और फिल्म के डायरेक्टर प्रोड्यूसर से माफी भी मँगवायी। बाद में सुनने में यही आया कि वो फिल्म रिलीज़ ही नहीं हुई।

धर्मेन्द्र जी को अपने बेहतर अभिनय के बावजूद बहुत कम अवार्ड मिले। इसका उन्हें मलाल तो होता था लेकिन जिन्हें वो अवार्ड मिलते थे वो उनके लिये ख़ूश भी होते थे। अमिताभ बच्चन जी के लिये तो उनके दिल में छोटे भाई और दोस्त के जैसी जगह है। धर्मेन्द्र मज़ाक मज़ाक में दिल की बात भी बताते हैं कि मैं हर अवार्ड फंक्शन के लिये नया सूट बनवाता लेकिन हर बार अवार्ड किसी और को मिल जाता।

बहरहाल उनको 1997 में फिल्म फेयर की तरफ से लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड और कई पुरस्कारों सहित 2012 में पद्म भूषण अवार्ड से भी नवाज़ा गया।

दर्शकों का जितना प्यार धर्मेन्द्र जी को मिला शायद ही किसी और को मिला है और ये प्यार आगे भी मिलता ही रहेगा। नारद टी वी और धर्मेन्द्र जी के चाहने वाले उनके कुशल स्वास्थ्य की कामना करते हैं और उम्मीद करते हैं आगे भी उनकी बेहतरीन फिल्में देखने को मिलती रहेंगी।

3 thoughts on “कभी मुंबई की सड़कों पर भूखें पेट सोते थे: कहानी ज़मीन से जुड़े सुपरस्टार धर्मेंद्र की”
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