वेब सीरीज स्कैम 1992 के हर्षद मेहता, प्रतीक गाँधी की कहानी

दोस्तों आज हम एक ऐसे ही सफर की बात करने वाले है जहां रिस्क से इश्क करना सफलता का सबसे बड़ा मंत्र है।

नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है अनुराग सुर्यवंशी और आप देख रहे हैं नारद टीवी जिसमें आज हम बात करने वाले है वेब सीरीज सिनेमा के उस धमाके की जिसका नाम प्रतीक गांधी है।

प्रतीक गांधी का जन्म 22 फरवरी 1989 को गुजरात के सुरत शहर में एक गुजराती ब्रह्मण परिवार में हुआ था।

प्रतीक के पिता का नाम जयंत गांधी था जो पेशे से एक अध्यापक थे और उनकी मां भी एक अध्यापिका ही थी जिनका नाम रीटा गांधी है।

प्रतीक गांधी के परिवार में शिक्षक बनने की इस रिवायत में उनके माता-पिता के साथ साथ उनके तीन चाचा और चचेरे भाई भी शामिल थे।

लेकिन प्रतीक गांधी को शायद इस बने बनाए ढर्रे पर चलना मंजूर नहीं था और इसीलिए उन्होंने बचपन से ही अपने नए मुकाम और रास्ते तय कर लिए थे।

स्कूल में पढ़ाई करते समय चौथी कक्षा में मार्शल आर्ट सिखने लगे और जब छठी कक्षा में पहुंचे तो एक नृत्य नाटिका का आडिशन देने चले गए।

प्रतीक ने अपनी शुरुआती शिक्षा सुरत के प्रवृत्ति विधालय से पुरी की जहां बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए उन्हें खेती-बाड़ी और चर्खा चलाने जैसे काम भी सिखाए जाते थे।

प्रतीक ने बहुत कम उम्र में ही बहुत कुछ कर लिया था मगर उनका सबसे बड़ा सपना डाक्टर बनने का था जो 10 वीं में कम परसेंटेज बनने के कारण टुट गया था।

प्रतीक अपनी आगे की पढ़ाई के लिए मुम्बई आ गए जहां उन्होंने नोर्थ महाराष्ट्रा कोलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया।

यहां से डिप्लोमा करने के बाद अब कुछ नया करने और कुछ नया सीखने का समय था।

प्रतीक ने एक सेल्समैन के काम को अपनी जिंदगी के पहले रोजगार के रूप में चुना और एनर्जी सेविंग प्रोडेक्ट बेचने का काम शुरू कर दिया।

अपने पहले रोजगार के पहले ही दिन प्रतीक को अपने प्रोडेक्ट बेचने के लिए जीआईडीसी सुरत की एक साइंटीस्ट फर्म में भेज दिया गया।

प्रतीक ने वहां पहुंचकर अपने प्रोडेक्ट के बारे में बताना शुरू किया ही था कि फीजिक्स में पीएचडी कर चुके एक शख्स ने उन्हें यह कहकर बीच में रोक दिया कि तुम्हारी तैयारी कच्ची है।

Pratik Gandhi

प्रतीक ने जब इसका कारण पूछा तो उन्होंने प्रतीक से कुछ सवाल पुछने शुरू कर दिए।

इन प्रश्नों से पीछा छुड़ाकर प्रतीक जब आफिस पहुंचे तो अपने बोस के लिए उनके मन में गुस्सा साफ नजर आ रहा था।

वो ये जानना चाहते थे कि उन्हें अपने पहले ही दिन इतना कठिन काम क्यों दिया गया?

इस प्रशन के जवाब में उनके बोस ने प्रतीक से कहा कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो चाहते थे कि तुम ये समझ पाओ कि हमारी तैयारी कभी भी काफी नहीं हो सकती, कोई इंसान परिपूर्ण नहीं होता है। दुनिया में हर इंसान से बड़ा कोई ना कोई इंसान मौजूद होता है।

ये जवाब प्रतीक के जीवन की सबसे बड़ी सीख साबित हुआ जिसने उन्हें हर क्षेत्र में सहारा दिया फिर चाहे वो सिनेमा हो, नाटक हो या फिर शिक्षा का क्षेत्र हो।

11 महीने सेल्समैन के तौर पर काम करने के बाद प्रतीक ने ग्रेजुएशन करने का मन बनाया और जलगांव में स्थित एक प्राइवेट कोलेज में दाखिला ले लिया। प्रतीक अब तक आ पेर के पेले पार और अपूर्व अवसर जैसे नाटकों में काम कर चुके थे और ग्रेजुएशन करने के दौरान अपने बचे हुए समय का सदुपयोग करने के लिए उन्होंने फिर से थिएटर का सफर शुरू कर दिया। यहां उनके पहले नाटक का नाम अरण्य रुदन था जिसमें प्रतीक ने एक दरबान का किरदार निभाया था। अपनी ग्रेजुएशन पुरी करने तक प्रतीक को थिएटर में भी काफी वाहवाही और पहचान मिल चुकी थी और अब बारी थी किसी एक काम को चुनने की लेकिन प्रतीक ने एक साथ दोनों नावों में सवार होने का निर्णय किया और मुम्बई आ गए।

एक महीने तक अपने कुछ जान पहचान वाले लोगों के साथ रहने के बाद प्रतीक ने कुछ महीने एक मोल के बाहर कोकरोच मारने का स्प्रे बेचने का भी काम किया ताकि वो अपना खर्च चला सके।

इसके अलावा प्रतीक जब भी किसी फिल्म के लिए आडिशन देने जाते तो उन्हें यह कहकर रिजेक्ट कर दिया जाता था कि उनका चेहरा किसी लीड रोल के काबिल नहीं हैं।

बहुत कोशिशों के बाद साल 2006 में प्रतीक को योर्स इमोशनली नाम की फिल्म में काम करने का मौका मिला था जिसमें उन्हें एक गे का किरदार दिया गया था।

इस फिल्म को LGBT फिल्म फेस्टिवल के लिए बनाया गया था जिसके चलते इसे सिनेमा घरों में रिलीज होने का मौका नहीं मिला ।

और इस तरह प्रतीक गांधी के सिनेमाई सफर की शुरुआत पुरी तरह से भुलाने वाली थी।

एक साल‌ के इसी संघर्ष के बाद प्रतीक को रिलायंस इंडस्ट्रीज में एक इंजीनियर के तौर पर काम मिल गया।

अब प्रतीक की जिंदगी पटरी पर आ गई थी और उन्होंने अपने परिवार को भी मुम्बई बुला लिया था जिनके साथ वो एक किराए के मकान में रहने लगे थे।

सबकुछ सही चल रहा था लेकिन अब प्रतीक अपने नाटकों से दुर होते जा रहे थे, पुरे दिन का काम, छः घंटे की नींद और परिवार की उम्मीदों ने जैसे उनसे सबकुछ छीन लिया था।

अपने मंच अपने किरदार और अपनी खुशी को ध्यान में रखते हुए प्रतीक ने एक्सपेरिमेंटल थिएटर में हाथ आजमाने  का विचार किया और पृथ्वी थियेटर पहुंच गए।

यहां इनकी मुलाकात मनोज शाह से हुई जिनके साथ प्रतीक के करियर की सबसे उम्दा पारी की शुरुआत होने वाली थी।

मनोज शाह के साथ काम करते हुए उन्होंने मेरे पिया गए रंगून और मोहन नू मसालों जैसे कई नाटकों में अभिनय किया जिसके चलते प्रतीक को एक अच्छा थिएटर आर्टिस्ट माना जाने लगा था।

Prateek Gandhi Choldhood (L)

मोहन नू मसालों नाम का नाटक महात्मा गांधी के जीवन पर आधारित था जिसके लिए प्रतीक का नाम लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया था।

दरअसल 90 मिनट तक चलने वाले इस नाटक में सिर्फ एक किरदार द्वारा ही गांधीजी के जीवन को लोगों के सामने रखना था।

25 दिनों की रिहर्सल के बाद इस नाटक के मंचन का दिन आया जहां सुबह साढ़े ग्यारह बजे गुजराती, शाम साढ़े चार बजे हिंदी और रात साढ़े सात बजे इस नाटक को अंग्रेजी भाषा में दिखाया गया था।

थिएटर की दुनिया में ऐसा कुछ पहली बार हुआ था जब एक नाटक को एक आर्टिस्ट द्वारा एक दिन में तीन भाषाओं में प्रर्दशित किया गया था और इसीलिए प्रतिक गांधी का नाम वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।

गुजराती थिएटर में प्रतीक को अब हर कोई पहचानने लगा था और इसीलिए उन्हें अपने करियर की पहली गुजराती फिल्म बे यार में मुख्य किरदार के लिए चुन लिया गया।

इस फिल्म की सफलता और प्रतीक को मिली वाहवाही को देखते हुए इन्हें रोंग साईड राजू फिल्म में लिया गया जिसे बेस्ट गुजराती फिल्म का नेशनल अवार्ड भी दिया गया था।

यह फिल्म प्रतीक के करियर में मील का पत्थर साबित हुई जिसके बाद उन्होंने रिलायंस इंडस्ट्रीज के काम से इस्तीफा  देकर पुरी तरह से सिनेमाई दुनिया में जाने का निर्णय कर लिया।

प्रतीक के सबसे पसंदीदा अभिनेता की बात करें तो उनका नाम संजीव कुमार है जिसका कारण बताते हुए प्रतीक कहते हैं कि संजीव कुमार को देखकर उन्हें यह यकीन हो जाता है कि फिल्मों में काम करने के लिए हीरो मैटेरियल चेहरे से कहीं ज्यादा अपने काम में परफेक्शन की जरूरत होती है जो सिर्फ मेहनत के बल पर ही प्राप्त किया जा सकता है।

गुजराती सिनेमा के बाद अब हिंदी सिनेमा में कदम रखने की बारी थी जहां उनकी इसी सोच का इम्तिहान होने वाला था।

गुजराती सिनेमा के हर दुसरे नाटक और फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाले प्रतीक गांधी को यहां उनकी पहली फिल्म लव यात्री में एक छोटा सा किरदार निभाने को दिया गया जिसका नाम नेगेटिव होता है।

इसके बाद प्रतीक को बोलीवुड फिल्म मित्रों में भी एक छोटे किरदार से ही संतुष्ट होना पड़ा था।

अब बात करें अगर प्रतीक के वैवाहिक जीवन की तो उनका विवाह गुजराती थिएटर की अभिनेत्री भामिनी ओझा से 2009 में हुआ था जिनसे उन्हें एक बेटी है  जिसका नाम मिराया है। इसके अलावा प्रतीक गांधी के छोटे भाई का नाम पुनीत गांधी है जो पेशे से एक डिजाइनर है और फिल्म लव नी भवाई के एक गीत में अपनी आवाज भी दे चुके हैं। हिंदी सिनेमा में प्रतीक गांधी को भले ही अब तक वो किरदार नहीं मिले जहां उन्हें खुद को साबित करने का मौका मिल सके लेकिन वेब सीरीज सिनेमा में प्रतीक अपने डेब्यू से ही झंडे गाड़ चुके हैं। नेशनल अवार्ड विजेता डायरेक्टर हंसल मेहता ने प्रतीक गांधी के कई नाटक और फिल्म रोंग साईड राजू देखकर यह निर्णय कर लिया था कि वेब सीरीज स्कैम 1992 में हर्षद मेहता का किरदार प्रतीक ही निभाएंगे।

Pratik Gandhi as Harshad Mehta

प्रतीक ने अपने डायरेक्टर के निर्णय को सही साबित करते हुए इस वेब सीरीज में हर्षद मेहता के किरदार को जीवंत करने का काम बखूबी किया है।

नारद टीवी प्रतीक गांधी के उज्जवल भविष्य और शानदार सिनेमाई सफर की कामना करता है और साथ ही यह उम्मीद करता है कि प्रतीक आगे भी हमें अपने टैलेंट से मनोरंजित करते रहेंगे।

मोहनीश बहल: फिल्मों में हीरो बनने आया और बन गया विलेन

दोस्तों कहा जाता है कि बोलीवुड में आप भले ही कितने ही बड़े परिवार से ताल्लुकात क्यों ना रखते हैं लेकिन ये बात इस इंडस्ट्री में आपकी सफलता का पैमाना तय नहीं कर सकती है।

शायद इसीलिए कहा जाता है कि एक बड़ा परिवार आपको यहां इज्जत दिलवा सकता है काम दिलवा सकता है लेकिन कोई भी परिवार या सरनेम किसी इंसान को हुनर नहीं दिलवा सकता है। मोहनिश बहल एक ऐसे ही अभिनेता हैं जिन्होंने जो भी किया, जितना भी कमाया सिर्फ और सिर्फ अपने हुनर की बदौलत कमाया और इसीलिए बेहतरीन अभिनेत्रियों से भरे हुए परिवार से आने के बाद भी इन्हें आज भी अपने काम की वजह से जाना जाता है।

जो एक अभिनेता की अपने करियर में सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है।

नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है अनुराग सुर्यवंशी और आप देख रहे हैं नारद टीवी।

14 अगस्त 1961 को मुम्बई में भारतीय सिनेमा की मशहूर अभिनेत्री नूतन और भारतीय नेवी में लेफ्टिनेंट कमांडर रहे रजनीश बहल के घर मोहनिश बहल का जन्म हुआ था। इनके परिवार की बात करें तो मोहनिश बहल की नानी शोभना समर्थ भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में एक जानी मानी अभिनेत्री थी और इनकी मौसी तनुजा भी बोलीवुड की एक मशहूर अभिनेत्री रह चुकी है। इस तरह काजोल मोहनिश बहल की चचेरी बहन है, जो अवार्ड्स और फिल्मों के नजरिए से भारतीय सिनेमा की सबसे सफल अभिनेत्री हैं। मोहनिश बहल की पढ़ाई कैथड्रल स्कूल से और सेंट जेवियर्स कॉलेज में हुई थी, जहां से इनके मन में बोडी बिल्डिंग करने में दिलचस्पी बढ़ने लगी थी जो आगे चलकर इनकी आदत बनने वाली थी।

मोहनिश बहल बचपन में एयरफोर्स पायलट बनना चाहते थे और यह सपना कहीं ना कहीं उनकी मां नूतन भी देख रही थी कि उनका बेटा अपने देश की सेवा करें लेकिन मोहनिश बहल के पिता ने उन्हें मना कर दिया।

इसी बीच एक बड़ी अभिनेत्री का बेटा होने के कारण फिल्मी दुनिया के बहुत से लोग उन्हें जानने लगे थे जो मोहनिश बहल की फिटनेस को देखकर उन्हें अपनी फिल्मों में लेना चाहते थे।

साल 1981 में मोहनिश बहल ने फिल्म इतिहास में काम किया जिसमें इनके साथ अनिल कपूर, राज कुमार और शबाना आजमी जैसे दिग्गज भी काम कर रहे थे।

इतिहास फिल्म बनकर तैयार हो गई लेकिन इसे पर्दे तक पहुंचने में छः साल लग गए, तब तक  मोहनिश बहल कुछ और फिल्मों में भी काम कर चुके थे ।

मोहनिश बहल की पहली रिलीज फिल्म का नाम बेकरार था जो साल 1983 में आई थी, जिसके बाद इन्होंने तेरी बाहों में और मेरी अदालत जैसी फिल्मों में भी किया और फिर साल1987 में फिल्म इतिहास भी सिनेमा घरों में रिलीज हो गई।

लेकिन छः सालों में छः फिल्मों में काम करने के बाद भी मोहनिश बहल की सिर्फ एक ही फिल्म हिट हो पाई थी जिसका नाम पुराना मंदिर था, लेकिन इस फिल्म से भी मोहनिश बहल को कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि होरर फिल्मों को उस जमाने में बी ग्रेड फिल्में माना जाता था।

Mohneesh Bahl

अब तक मोहनिश बहल ने सभी फिल्मों में लीड रोल के तौर पर काम किया था लेकिन पांच फिल्मों की नाकामयाबी ने उनका करियर शुरू होने से पहले ही खत्म कर दिया था।

अगले दो सालों में मोहनिश बहल को किसी  भी फिल्म का ओफर नहीं मिला जिसके चलते उन्होंने अपने शौक को ही अपनी जिंदगी बनाने का निर्णय लिया और बोम्बे फ्लाईंग क्लब में पायलट बनने की ट्रेनिंग लेने लगे थे।

 मोहनिश बहल को बोडी बिल्डिंग का भी शौक था जिसके चलते वो मुम्बई के सी रोक होटल में जिम किया करते थे, यहां मोहनिश बहल के साथ एक दुबला पतला लड़का भी जिम करने आया करता था क्योंकि उसे बोलीवुड फिल्मों में हीरो बनना था, इस लड़के का नाम था सलमान खान।

सलमान खान मोहनिश को जब भी ये बताते कि वो एक्टर बनना चाहते हैं तो मोहनिश बहल जवाब में कहते कि जब अच्छी खासी लम्बाई और बोडी होने के बाद भी उन्हें कोई नहीं ले रहा है तो तुम कैसे एक्टर बनोगे।

इसके कुछ समय बाद सलमान खान को फिल्म मैंने प्यार किया में मुख्य अभिनेता के रूप में साइन कर लिया गया जिसमें उनके साथ एक नई लड़की भाग्यश्री भी अपना डेब्यू कर रही थी।

मैंने प्यार किया फिल्म साइन करने के बाद जब सलमान खान ने इस फिल्म के विलेन के बारे में पुछा तो सुरज बड़जात्या ने उन्हें कहा कि विलेन की कास्टिंग अभी नहीं हुई है, फिलहाल उस पर ही काम चल रहा है।

इसके अगले दिन सलमान खान ने मोहनिश बहल को बताया कि उन्हें हीरो के तौर पर एक फिल्म मिल गई और अगर तुम विलेन का रोल करना चाहते हो तो ओडिशन दे सकते हो।

मोहनिश बहल का ओडिशन हुआ वो सलेक्ट भी हो गए लेकिन साइन करने से पहले ताराचंद बड़जात्या नूतन से इसकी परमिशन लेना चाहते थे, परमिशन मिलने के बाद मोहनिश बहल को साइन कर लिया गया और इस तरह एक फ्लोप हीरो के सबसे बड़े विलेन बनने का सफर शुरू हो गया।

मैंने प्यार किया की शूटिंग शुरू हुई, नए चेहरों ‌को मुख्य भूमिकाओं में रखकर बनाई जाने वाली इस फिल्म की कामयाबी से सभी अंजान थे और इसीलिए मोहनिश बहल भी शूटिंग के बाद मिलने वाले समय में अपने पायलट बनने की ट्रेनिंग भी कर रहे थे।

29 दिसंबर 1989 को फिल्म मैंने प्यार किया रिलीज हुई और ब्लोकबस्टर साबित हुई, सलमान खान और भाग्यश्री जहां हीरो हीरोइन के तौर पर हर डायरेक्टर के लिए पहली पसंद बन गए तो वहीं मोहनिश बहल की विलेन वाली छवि भी लोगों के दिलों में बस गई थी।

इस फिल्म के बाद मोहनिश बहल को बड़ी फिल्मों में काम करने का मौका मिलने लगा था जिसमें सलमान खान की बाघी और शाहरुख खान की पहली फिल्म दीवाना के साथ साथ फिल्म हीना भी शामिल थी।

Mohneesh Bahl (C)

साल 1991 में जब मोहनिश बहल गोविंदा के साथ अपनी फिल्म शोला और शबनम की शूटिंग के लिए ऊटी गए हुए थे तब उन्हें अपनी मां की बिगड़ती तबियत के बारे में पता चला , मोहनिश बहल जब तक मुम्बई पहुंचते तब तक उनकी मां का निधन हो चुका था।

राजश्री प्रोडक्शन के मालिक ताराचंद बड़जात्या ने मैंने प्यार किया के दौरान नूतन से उनके बेटे को पोजिटिव रोल में लेकर एक फिल्म बनाने का वादा किया था जिसे पुरा करने का मौका उन्हें साल 1994 में मिला।

इस साल फिल्म हम आपके हैं कौन रिलीज हुई जिसमें अनुपम खेर, माधुरी दीक्षित और सलमान खान के साथ साथ मोहनिश बहल को भी अपना हुनर दिखाने का मौका मिला था।

इस फिल्म में सलमान खान के बड़े भाई के रूप में मोहनिश बहल को लोगों द्वारा बहुत पसंद किया गया था लेकिन नूतन अपने बेटे की इस कामयाबी को देखने के लिए उनके साथ नहीं थी।

इसके बाद साल 1999 में मोहनिश बहल एक बार फिर राजश्री की फिल्म हम साथ साथ है में नजर आए थे, जिसकी कहानी और गानों के कारण इस फिल्म के हर किरदार को आज तक घर घर में पहचाना जाता है।

मोहनिश बहल ने इसके बाद जानवर, LOC और विवाह जैसी फिल्मों में भी काम किया था।

3 अगस्त 2004 को मुम्बई के कोलाबा में स्थित एक 32 मंजिला इमारत में आग लग गई थी जिसके अंतिम फ्लोर पर मोहनिश बहल के पिता रजनिश रहा करते थे।

आनन फानन में पुरी इमारत को खाली करवाया गया लेकिन आखिरी फ्लोर तक पहुंचते पहुंचते बहुत देर हो गई  जिसके कारण मोहनिश बहल के पिता का आग में जलकर निधन हो गया ।

फिल्मों के अलावा मोहनिश बहल ने टेलीविजन इंडस्ट्री में भी काम किया है जहां उनके पहले सीरियल का नाम संजीवनी था जो साल 2002 में आयी थी, इसके अलावा मोहनिश बहल ने साल 2003 में रामानंद सागर के प्रोडक्शन में बन रहे सीरयल आरज़ू है तू ,में भी काम किया था।

विवाह फिल्म के बाद मोहनिश बहल चांस पे डांस फिल्म में भी नजर आए लेकिन उसके बाद फिल्मों में मोहनिश बहल को काम मिलना कम हो गया था जिसके चलते उन्होंने टीवी इंडस्ट्री में अपने सफर को जारी रखा और कुछ तो लोग कहेंगे और सावधान इंडिया में भी काम किया।

मोहनिश बहल साल 2014 में सलमान खान की फिल्म जय हो में और साल 2019 में संजय दत्त और अर्जुन कपूर के साथ पानीपत में भी नजर आए थे।

साल 1992 में मोहनिश बहल ने अभिनेत्री एकता सोहनी से शादी की थी जिन्हे  आरती बहल के नाम से भी जाना जाता है, दोनों की दो बेटियां हैं जिसमें पहली बेटी का नाम प्रनूतन और दुसरी बेटी का नाम तृषा है।

प्रनूतन सलमान खान के प्रोडक्शन हाउस में बनी फिल्म नोटबुक से अपने करियर की शुरुआत कर चुकी हैं।

Mohneesh Bahl

मिर्ज़ापुर वेब सीरीज के कालीन भइया, पंकज त्रिपाठी की कहानी

टेक्नोलोजी के बदलते इस दौर को अगर हम प्रयोगों का दौर भी कहें तो यह ग़लत नहीं होगा और यदि फिल्मों की बात करें तो इन प्रयोगों से जहाँ एक ओर फिल्मों का स्वरूप बदला है वहीं दूसरी तरफ फिल्मों को अलग अलग धाराओं में बाँटने वाली लकीर भी अब धुँधली नज़र आने लगी है। फिल्मों के स्वरूप के साथ-साथ नायक के रूप और व्यक्तित्व में भी बड़ा बदलाव दिखायी देने लगा है। निरंतर नयी कहानियों और नये किरदारों को अब दर्शक भी खुले दिल से स्वीकार करने लग गये हैं और इन कहानियों और किरदारों को अपने अभिनय से जीवन्त कर देने वाले ढेरों नये चेहरे आज अपनी एक अलग पहचान बनाने में कामयाब हो रहे हैं। आम नायकों की परिभाषा से अलग ऐसा ही एक चेहरा जिसके बारे में हम आज बात करने वाले हैं, उस चेहरे का नाम है पंकज त्रिपाठी, जिसने अपनी क़ाबिलियत से हर किसी के दिल में अपनी जगह बना ली। 

नमस्कार दोस्तों मैं अनुराग सूर्यवंशी स्वागत है आपका हमारे आज के वीडियो में जिसके अंतर्गत हम चर्चा कर रहे हैं अभिनेता पंकज त्रिपाठी जी के जीवन से जुड़े कुछ रोचक किस्सों के बारे में। अपने मौलिक अभिनय से सबको अपना क़ायल कर देने वाले जाने-माने अभिनेता पंकज त्रिपाठी का जन्म 5 सितंबर 1976 को बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंद नामक छोटे से गांव में हुआ था।  पकंज के  पिता का नाम श्री बनारस तिवारी है जो कि एक साधारण किसान हैं और उनकी माँ का नाम श्रीमती हेमवंती है। परिवार में पंकज के अलावा उनके 3 भाई और 2 बहनें हैं।  पढ़ाई के साथ साथ पंकज का अभिनय के प्रति हमेशा से ही एक लगाव रहा और उन्होंने बचपन में ही अपने अभिनय की शुरुआत कर दी थी। पंकज ने अपने गाँव में छठ त्योहार पर आयोजित होने वाले कई नाटकों में लड़की का किरदार निभाया था जिसे वहाँ के लोग ख़ूब पसंद किया करते थे। दोस्तों आपको यह जानकर बहुत ताज्ज़ुब होगा कि अभिनय के हर माध्यम में अपनी छाप छोड़ देने वाले पंकज चाहे वह रंगमंच हो, टेलीविज़न हो, फ़िल्मी परदा हो या वेब सिरीज़ हो अपने हाई स्कूल तक की पढ़ाई के दौरान फिल्मों से अनभिज्ञ थे क्योंकि उस दौरान उनके घर में न तो टीवी ही था, न ही आस पास कोई भी सिनेमा हॉल और जो सबसे क़रीब सिनेमा हॉल था वो भी उनके गांव से तकरीबन 20 किलोमीटर की दूरी पर था।

दोस्तों पढ़ाई के दौरान पंकज बचपन में आर एस एस के सदस्य भी बन गये थे और वो उसकी विभिन्न शाखाओं में नियमित रूप से सक्रिय भी रहे इस दौरान वो आर एस एस की सांस्कृतिक गतिविधियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते रहे। साथ ही खेती के काम में भी वो अपने पिता का हाथ बँटाते रहे। प्राथमिक शिक्षा पूरी हो जाने के बाद, पंकज के पिता ने काॅलेज की पढ़ाई पूरी करने के लिए उन्हें पटना भेज दिया जहाँ पंकज ने पटना कॉलेज से हिंदी से स्नातक की डिग्री ली। स्नातक की पढ़़ा़ई के दौरान पंकज राजनीति में भी काफी सक्रिय रहे,  वे छात्र संगठन एबीवीपी में शामिल हुए और कई छात्र आंदोलनों में भाग भी लिया। आपको यह जानकर बहुत हैरानी होगी कि ऐसे ही एक आंदोलन की वज़ह से एक बार पंकज को तकरीबन एक हफ्ते के लिये ज़ेल की हवा भी खानी पड़ी थी। 

Pankaj Tripathi

दोस्तों पंकज एक सक्रिय छात्र नेता और  एक कुशल वक्ता तो थे ही लेकिन कम लोगों को पता होगा कि वो एक अच्छे खिलाड़ी भी रह चुके हैं। उन्होंने कई प्रतियोगिताओं में अपने कॉलेज की ओर से हाई जंप और 100 मीटर स्प्रिंट में प्रतिनिधित्व भी किया है।

पटना में पढ़ाई के दौरान उन्होंने ढेरों नाटक और फिल्में देखी जिसके कारण अभिनय के प्रति उनकी दिलचस्पी फिर से जाग उठी। बताया जाता है कि एक बार नाटक “अंधा कुआं”  देखने के बाद वह भावुक होकर रो पड़े थे। उन्होंने उसी वक़्त से नाटकों में फिर से सक्रिय होने की ठान ली और इस प्रयास में लग गये। वर्ष 1995 में, उन्हें पहली बार नाटक “लीला नंदलाल” में मौक़ा मिला, जिसमें उन्होंने एक स्थानीय चोर की बहुत छोटी भूमिका निभाई थी। इस नाटक को एनएसडी से पास आउट विजय कुमार ने निर्देशित किया था। पंकज के अभिनय को दर्शकों के साथ साथ मीडिया द्वारा भी ख़ूब वाहवाही मिली।

पंकज अपने द्वारा किये अभिनय के बारे में हर किसी राय मांगा करते और जो भी ख़ामियाँ होती उसे दूर करने और ख़ुद में निखार लाने के लिये हमेशा प्रयासरत भी रहते। उनकी यही लगन और निष्ठा उनके अभिनय में साफ साफ नज़र भी आती है। वर्ष 1996 के बाद, पंकज त्रिपाठी एक नियमित रंगमंच कलाकार बन गए और 4 साल तक उन्होंने थिएटर किया।

दोस्तों अभिनय के क्षेत्र में कैरियर बनाने से पहले पंकज त्रिपाठी ने हाज़ीपुर से होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर पटना के होटल मौर्या में दो साल तक काम भी किया।  होटल मौर्या में काम करने के दौरान पंकज से जुड़ा एक बड़ा ही मज़ेदार क़िस्सा, दमदार अभिनेता मनोज बाजपेयी जी ने टेलीविजन के एक कार्यक्रम में बताया था, इस क़िस्से को सुनकर यक़ीनन आपको भी बहुत ही मज़ा आयेगा।  फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’  जिसमें अभिनेता मनोज बाजपेयी और पंकज त्रिपाठी दोनों ने साथ काम किया है, एक दिन शूटिंग के दौरान फुरसत के क्षणों में मनोज कहीं बैठे हुये थे उसी वक़्त पीछे से खैनी रगड़ते हुये पंकज धीरे से उनके पास आकर बैठ गये और बड़े ही मूड में कहा कि “मनोज भाई एक बात बतायें आपसे?” मनोज ने कहा “हाँ हाँ बता?” पंकज ने थोड़ा मुस्कुराते हुए कहा “आप पटना के मौर्या होटल में रुकते थे ना?” मनोज ने कहा “हाँ क्यों?” पंकज ने पूछा “एक बार जब आप आये थे तो वहाँ से आपका कोई सामान गायब हुआ था ?” मनोज बोले, “हाँ मेरा चप्पल एक बार.. जो है कि मिला नहीं मुझे” पंकज ने थोड़ा झिझकते हुए बताया, “हम वहाँ काम करते थे …और ऊ चप्पलवा हम ही ले के चले गये थे” मनोज के आश्चर्य से पूछने पे कि ऐसा क्यों किया? तो पंकज ने बहुत ख़ुशी से कहा, “हमको लगा कि गुरुजी आये हैं तो कोई सामान इनका निशानी के तौर पर रख लें।” ये घटना जहाँ एक ओर हमारे मन को गुदगुदाती है वहीं दूसरी तरफ पंकज के गुरु प्रेम को भी दर्शाती है। पंकज दिवंगत अभिनेता इरफ़ान ख़ान के भी ज़बरदस्त प्रशंसक हैं। उनका कहना है कि शायद ही कोई इरफ़ान का  ऐसा फैन होगा जिसने उनकी हर एक फिल्म देखी होगी। पंकज का कहना है कि उन्होंने न सिर्फ इरफ़ान की हर एक फिल्म देखी है बल्कि उनसे बहुत कुछ सीखा भी है वो अपनी नेचुरल ऐक्टिंग का श्रेय अभिनेता इरफ़ान ख़ान को ही देते हैं।

Pankaj Tripathi

थियेटर से जुड़े रहने के लिए पंकज त्रिपाठी रात में होटल में काम करते थे और सुबह-सुबह थियेटर करते थे। तकरीबन दो सालों तक ऐसे ही काम करने के बाद उन्होंने होटल का काम छोड़ कुछ दिनों तक जूते बेचने का भी काम किया। ये समय पंकज के जीवन के सबसे कठिन दौर में से एक था। उस मुश्किल दौर को याद करते हुए एक इंटरव्यू में पंकज ने बताते हैं कि पटना में उनका एक कमरे वाला घर उन्हें आज भी याद है। एक दिन इतना तेज़ तूफान आया कि उनके घर के टिन शेड की छत ही उड़ गयी और वो उस छत की जगह खुले आकाश के नीचे खड़े रह गये। 

ऐसे बुरे हालातों के बीच रहने के बावजूद भी उनका अभिनय के प्रति जुनून कभी कम नहीं हुआ, वर्ष 2001 में उन्होंने अभिनय का विधिवत प्रशिक्षण लेने के लिये नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में प्रयास किया जहाँ उनका सेलेक्शन भी हो गया। वर्ष 2001 से 2004 तक एनएसडी में नाटक की पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस पटना लौटकर उन्होंने 4 महीने तक थिएटर में काम किया और फिर 16 अक्टूबर वर्ष 2004 को

 फिल्मों में अपनी किस्मत आजमाने मुंबई निकल गये। 

मुंबई में पंकज त्रिपाठी की शुरुआत छोटे पर्दे से हुई उन्होंने बाहुबली, गुलाल और सरोजिनी आदि धारावाहिकों में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। उन्होंने वर्ष 2004 से 2010 तक टेलीविज़न में कई तरह की भूमिकाएं अदा करने के साथ ही विज्ञापनों में भी काम किया जिसमें टाटा टी का विज्ञापन प्रमुख है।

कम लोगों को पता होगा कि पंकज की फिल्मों में अभिनय की  शुरुआत एन एस डी के दौरान 2003 में बनी एक कन्नड़ फिल्म ‘चिगुरिडा कनासू’ से ही हो गयी थी लेकिन रोल इतना छोटा था कि फिल्म में उन्हें कोई क्रेडिट ही नहीं दिया गया।

Pankaj Tripathi Young

इसलिये उनकी पहली फिल्म वर्ष 2004 में प्रदर्शित “रन” को ही माना जाता है। इस फिल्म में वह बहुत छोटे से किरदार में थे। इसके बाद वह ओमकारा और अपहरण जैसी कई यादगार फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार में नज़र आये जिनमें उनके काम को नोटिस भी किया गया लेकिन उनके अभिनय को असली पहचान मिली वर्ष 2012 में प्रदर्शित अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से। इस फिल्म में उनके किरदार  को दर्शकों ने खूब पसंद किया। इस फिल्म में पंकज के काम मिलने का किस्सा भी बड़ा ही रोचक है। जिस वक़्त पंकज धारावाहिक गुलाल की शूटिंग में व्यस्त थे उसी दौरान उन्हें मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबरा ने फिल्म “गैंग्स ऑफ़ वासेपुर” के ऑडिशन के लिए बुलाया। हालांकि फिल्म के निर्देशक अनुराग कश्यप उनके ऑडिशन से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे फिर भी मुकेश छाबरा द्वारा समझाने के बाद पंकज को “सुल्तान” की भूमिका सौंप दी गई जिस पर वो पूरी तरह से खरे भी उतरे। फिल्म गैंग्स ऑफ वासेपुर के बाद पंकज त्रिपाठी ने कभी पोछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक तकरीबन हर दमदार फिल्मों में अलग-अलग किरदारों में वो नज़र आते रहे। फिल्मों के अलावा उन्होंने कई सफल वेब सीरीज में भी अभिनय किया जिनमें सेक्रेड गेम्स और मिर्जापुर प्रमुख है। इन सीराज़ में पंकज त्रिपाठी की एक्टिंग को लोगों ने ख़़ू़ूब सराहा। पंकज ने तकरीबन 60 से अधिक टी वी शोज़ में काम किया है और अब तक वो 60 से ज़्यादा फिल्मों में भी नज़र आ चुके हैं। 

दोस्तों पंकज त्रिपाठी ने अनुसार मुंबई में उन्हें उतना संघर्ष नहीं करना पड़ा या यूँ कहें कि उन्होंने काम खोजने में कोई जल्दबाज़ी नहीं की और न ही बहुत बड़ा अभिनेता का ख़्वाब ही देखा था इसीलिए उन्हें कभी संघर्ष का कष्ट समझ में ही नहीं आया। अपने संघर्ष के बारे में बात करते हुए एक इंटरव्यू में पंकज त्रिपाठी ने बताया कि मुंबई में उनकी ज्यादा दुखद कहानियां नहीं रहीं अगर आप मेरे संघर्ष के बारे में पूछेंगे तो मेरा ऐसा कोई ऐसा इतिहास नहीं है कि मैं फुटपाथ पर सोया या कई दिनों तक भूखा रहा। यह इसलिए संभव हो सका, क्योंकि मेरी पत्नी मृदुला ने घर की सारी जिम्मेदारियां उठा ली थीं। मैं तो सबसे यही कहता हूं कि वह घर की पुरुष हैं।” वो अपनी सफलता का सारा श्रेय अपनी पत्नी को ही देते हैं। 

अपने एक इंटरव्यू में पंकज त्रिपाठी ने बताया था कि वह 16 अक्टूबर साल 2004 को 46,000 रुपये लेकर मुंबई पहुंचे थे, और 25 दिसंबर 2004 तक उनके जेब में कुल 10,000 रुपये बचे थे। इस दिन को याद करते पंकज त्रिपाठी ने कहा कि वह इस तारीख को कभी नहीं भूलते क्योंकि इस दिन उनकी पत्नी का जन्मदिन होता है और उस दिन उनके पास अपनी पत्नी के लिए न तो तोहफा खरीदने के पैसे था और न ही केक खरीदने के। दोस्तों पंकज जब वर्ष 2004 में मुंबई आये थे तो वो शादीशुदा थे और उनकी पत्नी मृदुला भी उनके साथ ही आयी थीं। मुंबई आकर मृदुला जी ने गोरेगांव के एक स्कूल में बतौर अध्यापिका नौकरी कर ली। मृदुला और पंकज के प्रेम और विवाह से जुड़ा बड़ा ही रोचक किस्सा है जिसका ज़िक्र उन्होंने कई बार किया है। पंकज ने बताया कि कैसे उन्हें मृदुला से बिना देखे ही प्यार हो गया था ।उन्होंने बताया कि वर्ष1992 में मृदुला के गाँव सुलभ शौचालय बनाना था और सुलभ शौचालय बनवाने में एक्सपर्ट पंकज के भाई ने मृदुला के गांव में अपने एक मिस्त्री को शौचालय का एस्टीमेट लेने के लिये भेजा जहाँ उस मिस्त्री की नज़र मृदुला जी पर पड़ गयी और वापस आकर उसने पंकज से मृदुला जी की इतनी तारीफ कर दी कि बिना देखे ही उनको मृदुला से प्यार हो गया। मिस्त्री ने उनसे बताया कि उधर एक लड़की है एकदम हिरणी की माफिक। पंकज मृदुला की याद में रोमांटिक गाने गा गाकर रोया करते थे। उन्होंने बताया कि जिन गानों को सुनकर वो 90s के दौर में रोते थे, उन गानों पर अब बात करके हंसा करते हैं। आख़िर वो दिन भी आ ही गया जब पंकज ने मृदुला को साक्षात भी देेेेख लिया। संयोग से मृदुला के भाई की शादी पंकज की बहन से तय हो गयी और  24 मई, 1993 को पंकज की बहन का तिलक का दिन निर्धारित हुआ। तिलक के दिन हाथ में नारियल और पान का पत्ता लिये पंकज की निगाहें पंडित जी के मंत्र के बीच  इधर – उधर उस हिरनी को तलाश रहीं थी  जिसका ज़िक्र उनके मिस्त्री ने किया था। पंकज ने बताया कि अचानक ऐसा लगा कि 200 से 250 लोगों की भीड़ ख़त्म, मैं अकेला नारियल लिए बैठा हूं और वो खाली आंगन में अकेले चलते हुए आईं और हिरनी की तरह कुलाचे भरते हुए चली गईं बिल्कुल किसी फिल्मी सीन की तरह।’ पंकज ने बताया कि दोनों ची सोच में कोई मेल नहीं था बस  एक ही बात की समानता थी और वो थी दोनों के साहित्य का शौक पंकज ने साहित्य की मदद से ही मृदुला का दिल जीता। 

Pankaj Tripathi in Mirzapur Web Series

पंकज ने बताया कि उनकी शादी में भी बड़ी मुश्किलें आई क्योंकि मृदुला की मां नहीं चाहती थीं कि शादी हो। उन्होने बताया, ‘लड़की के मां शादी के ख़िलाफ़ थीं। उनकी लगता था कि ये नाटक – नौटंकी करता है, कभी होटल में काम करता है, कभी जूते बेचता है। कुछ वर्षों बाद मृदुला के घरवालों ने उनकी शादी कहीं और तय कर दी। एक इंटरव्यूमें मृदुला जी ने बताया कि पंकज मेरे भैया और भाभी के साथ मेरे होने वाले दूल्हे के घर गए और लौटने पर उन्होंने मुझे बताया कि यह जोड़ी मेरे लिए अच्छी रहेगी और मुझे ‘भौतिक सुख’ मिलेगा। मैं इस बात का अर्थ नहीं समझी तब पंकज जी ने मुझे समझाया कि मटीरियलिस्टिक वर्ल्ड में तो तुम अच्छा जीवन जियोगी, लेकिन मेरे जैसा इंसान तुम्हें कहीं नहीं मिलेगा। इसी तरह हमारे बीच में नोंकझोंक चलती रही और फिर हमने बड़े जतन करके वो शादी तुड़वाई और पंकज के एनएसडी थर्ड इयर में हमने शादी का फैसला ले लिया।’ 15 जनवरी वर्ष 2004 को पंकज और मृदुला ने विवाह कर लिया।

पंकज और मृदुला की एक बेटी है जिसका नाम आशी है जो अब किशोरावस्था में प्रवेश कर चुकी है और मृदुला जी ने स्कूल की नौकरी त्याग कर, घर और पंकज के ऑफिस दोनों की ज़िम्मेदारियों को संभाल रही हैं। पंकज के व्यस्त होने पर  मृदुला ही उनकी नई फिल्मों की स्क्रिप्ट पढ़ा करती हैं। पंकज के एड, शूट और फिल्मों के प्रमोशन से लेकर उनका पूरा शिड्यूल बनाने तक, हर छोटा-बड़ा काम किसी मैनेजर की तरह मृदुला बखूबी हैंडल करती हैं।

दोस्तों पंकज के अभिनय के न सिर्फ दर्शक बल्कि फिल्म मेकर भी क़ायल हैं क्या नये क्या पुराने। मशहूर अभिनेता और निर्देशक सतीश कौशिक जी का कहना है कि अपनी आगामी फिल्म ‘कागज़’  से उन्हें एक निर्देशक के रुप में  फिर से उभरने का मौका मिला है और इसका श्रेय फिल्म के मुख्य अभिनेता पंकज त्रिपाठी को ही जाता है जिन्होंने इस फिल्म में नई ऊर्जा डाली है।

दोस्तों आने वाले वक़्त में पंकज त्रिपाठी फिल्म ‘कागज़’ के अलावा ढेरों फिल्मों और वेब सिरीज़ में नज़र आने वाले हैं जिनका दर्शक बहुत ही बेताबी से इंतज़ार कर रहे हैं। नारद टी वी ऐसे दमदार अभिनेता पंकज त्रिपाठी जी को उनके आने वाली फिल्मों के लिये ढेरों शुभकामनायें देता है और उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हैं। हमें उम्मीद है कि आपको हमारा आज का ये वीडियो अवश्य पसंद आया होगा। वीडियो के बारे में अपनी राय हमें कमेंट्स के ज़रिये अवश्य बतायें। तो मिलते हैं अगले वीडियो में किसी और रोचक किस्से के साथ।

मिर्ज़ापुर वेब सीरीज के अखंडा, कुलभूषण खरबंदा की कहानी

उर्दू ज़बान के महान शायर शकील आज़मी की कलम से निकले ये शब्द हमें हर हाल में उड़ते रहने का हौसला देते हैं। यह शेर हमें बताता है कि किसी भी मुसीबत से डरकर हमें अपने काम को नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि पुरी शिद्दत और मेहनत से अपने काम को करते रहने का जुनून हमें वो कला सीखा जाता है जिसे परफेक्शन कहते हैं।

क्रिकेट की एक गेंद पर तीन चार वोट खेलने की कला और सिनेमाई पर्दे पर एक किरदार को अलग-अलग ढंग से निभाने का हुनर ही परफेक्शन कहलाता है जिसे मेहनत के जरिए ही हासिल किया जा सकता है।

और बात जब हिन्दी सिनेमा में सम्पूर्णता लाने की हो तो इस प्रतिभा की गिनती में बहुत कम अभिनेता ही आते हैं।

आज के इस एपिसोड में हम एक ऐसे ही परफेक्ट अभिनेता की बात करने वाले है जिसकी संवाद अदायगी और अपने किरदार को पी जाने वाली बात का कायल हर सिनेमा प्रेमी है।

नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है अनुराग सुर्यवंशी और आप देख रहे नारद टीवी जिसमें आज हम बात करने वाले है हिंदी सिनेमा के शाकाल यानी कुलभूषण खरबंदा जी के बारे में।

कुलभूषण खरबंदा का जन्म 21 अक्टूबर 1944 में अविभाजित भारत के पंजाब राज्य में अटोक जिले के हसनाबदल नामक स्थान पर हुआ था।

1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो यह जगह पाकिस्तान के हिस्से में आ गई लेकिन कुलभूषण खरबंदा के परिवार ने भारत को अपना देश माना और भारत आ गए।

भारत आने के बाद कुलभूषण खरबंदा की पढ़ाई जोधपुर, देहरादून, अलीगढ़ और दिल्ली जैसे स्थानों पर हुई।

कुलभूषण जी को बचपन से ही कहानियां पढ़ने और सुनने का बहुत शौक था और ये कहानियां भी अपने एक अलग अंदाज में पढ़ा करते थे।

दरअसल कुलभूषण जी किसी भी कहानी में अपने पसंदीदा किरदार के संवादों को जोर जोर से अदायगी के साथ बोला करते थे और यहीं से इनके मन में अदाकारी का खुमार चढ़ने लगा था।

अपनी शुरुआती पढ़ाई पुरी करने के बाद इन्होंने आगे की पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी की किरोड़ीमल कॉलेज से पुरी की जहां इनके सहपाठियों में अमिताभ बच्चन भी शामिल थे।

Kulbhushan Kharbanda Young

कोलेज के दिनों में इनका रुझान थिएटर की तरफ बढ़ने लगा और इन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक थिएटर ग्रुप बनाया जिसका नाम अभियान रखा गया था।

अब कुलभूषण जी के मन में एक्टिंग के लिए प्यार अपने पैर पसार चुका था और इसी का नतीजा था कि उन्होंने कोलेज के बाद एक और थिएटर ग्रुप ज्वाइन किया जिसका नाम यात्रिक था।

इस ग्रुप में कुलभूषण खरबंदा ने अपनी प्रतिभा से सबको अपना दीवाना बना लिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि कुलभूषण जी इस ग्रुप के पहले विधार्थी बन गए जिन्हें एक्टिंग के लिए पैसे दिए जाते थे।

कुलभूषण खरबंदा अपने थिएटर ग्रुप में एक बड़ा नाम बन चुके थे लेकिन वो वहीं रुकना नहीं चाहते थे।

अपनी अदाकारी को बेहतर से बेहतरीन बनाने की उनकी जिद्द उन्हें nsd ले गई जो उस समय अपने शुरुआती दौर से गुजर रहा था।

कुलभूषण खरबंदा ने nsd में प्रवेश प्राप्त करने के लिए एग्जाम दिया और उनका सलेक्शन भी हो गया लेकिन वो फिर कभी भी वहां नहीं गए।

जिसका कारण इन्होंने उस समय nsd के बारे में प्रचलित कई भ्रांतियों को बताया है।

कुलभूषण खरबंदा nsd को छोड़कर कोलकाता चले गए और एक गैस फैक्ट्री में सेल्समैन के तौर पर नौकरी करने लगे और साथ ही यहां अपनी अदाकारी के ख्वाब को जीवित रखने के लिए कुलभूषण जी पदातिक नाम के थिएटर ग्रुप में शामिल हो गए।

यहां कुलभूषण जी ने एक से बढ़कर एक नाटकों में अभिनय किया लेकिन सखाराम बिंदर नाम के नाटक को लेकर एक बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया जिसके चलते इन्हें अपने काम से निकाल दिया गया।

काम से हाथ धोने के बाद कुलभूषण जी ने अपना पुरा समय थिएटर को समर्पित कर दिया और अपनी प्रतिभा और काम से खुद को एक अच्छे अभिनेता के रूप में ढाल लिया था।

कुलभूषण जी अपनी अदायगी से कोलकाता के थिएटर ग्रुप का जाना माना नाम बन गए थे और दुसरी तरफ  सिनेमा की दुनिया में एक नया सितारा निर्माता के रुप में अपने कदम बढ़ा चुका था नाम था श्याम बेनेगल जिनकी पहली फिल्म अंकुर ने सबको उनका मुरीद बना दिया था।

एक दिन कुलभूषण जी के किसी मित्र ने श्याम बेनेगल को इनका नाम बताया और कहा कि ये अभिनेता आपकी फिल्मों में काम कर सकता है।

Kulbhushan Kharbanda

श्याम बेनेगल ने कुलभूषण जी को फोन किया और अपनी फिल्म निशान्त में काम करने के लिए कहा लेकिन कुलभूषण जी अपनी थिएटर की दुनिया को छोड़कर फिल्मों में काम नहीं करना चाहते थे।

कुलभूषण खरबंदा ने श्याम बेनेगल को अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि मैं कोलकाता से मुंबई आऊंगा ओडिशन दुंगा लेकिन आप मुझे काम दोगे नहीं और मेरे पैसे भी खर्च हो जाएगे। यह कहते हुए कुलभूषण जी ने श्याम बेनेगल को मना कर दिया।

लेकिन श्याम बेनेगल को कुलभूषण जी की प्रतिभा पर शायद भरोसा हो गया था जिसके चलते उन्होंने कुलभूषण जी की टिकिट और रहने का इंतजाम करवाया और उन्हें मुम्बई बुला लिया।

निशांत फिल्म में कुलभूषण खरबंदा का रोल कुछ ही दिनों का था जिसके चलते इन्होंने एयरपोर्ट तक जाने के लिए अपना स्कूटर लिया और एयरपोर्ट से टिकट लेकर मुम्बई चले गए। ये सोचकर कि कुछ दिन शूटिंग करने के बाद जल्दी ही कोलकाता वापस आ जाऊंगा लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।

मुम्बई आने के बाद लगभग एक महीने कुलभूषण जी को फिल्म के शुरू होने का इंतजार करना पड़ा और इसके बाद जब शूटिंग शुरू हुई तो इनके काम और प्रतिभा ने श्याम बेनेगल पर अपना जादू कर दिया था।

श्याम बेनेगल ने कुलभूषण जी के काम को देखते हुए इन्हें अपनी कुछ और फिल्मों में भी साइन कर लिया और वह स्कूटर तीन सालों तक उसी एयरपोर्ट पर उनके आने का इंतजार करता रहा।

कुलभूषण खरबंदा की पहली मैन स्ट्रीम बोलीवुड फिल्म का नाम जादु का शंख था जो साल 1974 में आई थी।

थिएटर के अपने शानदार अनुभव को साथ लेकर आएं कुलभूषण जी ने निशांत के बाद मंथन, जूनून और भूमिका जैसी फिल्मों में भी श्याम बेनेगल के साथ काम किया जिसके चलते थिएटर के बाद पैरेलल सिनेमा में भी कुलभूषण खरबंदा एक जाना पहचाना नाम बन गए थे।

श्याम बेनेगल और कुलभूषण खरबंदा की जोड़ी जहां पैरेलल सिनेमा में झंडे गाड़ रही थी वहीं दूसरी ओर रमेश सिप्पी और जावेद सलीम की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को बदल कर रख दिया था।

1975 में आई फिल्म शोले ने हिंदी सिनेमा के एक नए दौर को जन्म दिया था जिसके बाद रमेश सिप्पी वैसी ही एक और फिल्म बनाना चाहते थे।

1980 में आने वाली फिल्म शान में रमेश सिप्पी शोले के गब्बर की ही तरह एक नए विलेन को पर्दे पर लाना चाहते थे।

एक ऐसा विलेन जो अपने हाथों से मार धाड़ करने की बजाय टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए अपने दुश्मनों को खत्म करता हो।

फिल्म के इस किरदार के लिए तलाश शुरू हुई और संजीव कुमार से होते हुए कुलभूषण खरबंदा पर जाकर खत्म हो गई और खरबंदा जी बन गए हिंदी सिनेमा के पहले हाईटैक विलेन।

Kulbhushan Kharbanda as Shakaal

कुलभूषण खरबंदा को शान फिल्म मिलने का किस्सा कुछ यूं है कि जिस समय शान के शाकाल की खोज चल रही थी उस दौरान एक दिन सलीम खान कुलभूषण खरबंदा को जानने वाले कुछ लोगों के साथ खाना खा रहे थे और खाना खाते-खाते सलीम खान ने शान के विलेन के बारे में बताते हुए कहा कि दो सालों से इस किरदार के लिए अभिनेता की तलाश कर रहे हैं लेकिन कोई मिल नहीं रहा है।

एक अभिनेता को मैंने मंथन फिल्म में देखा था जो इस किरदार के लिए सही लग रहा है लेकिन उस अभिनेता का भी पता नहीं कहां है?

इस पर खरबंदा जी के दोस्तों ने पुछा कहीं आप मंथन फिल्म के सरपंच की बात तो नहीं कर रहे हैं?

इसके जवाब में सलीम ख़ान ने हां कहा और इतना कहते ही वहां बैठी एक महिला ने कहा उनसे तो मैं आपकी आज ही बात करवा सकती हूं, इतना कहकर वो महिला वहां से चली गई।

कुलभूषण खरबंदा के पास जाकर उस महिला ने सलीम खां की बात उनसे करवाई और सलीम खान ने उन्हें सुबह मिलने के लिए बुला लिया।

सुबह जब खरबंदा जी सलीम खान के घर पहुंचे तो वहां फिल्म शक्ति से जुड़े कुछ लोग भी बैठे हुए थे।

सलीम खां ने खरबंदा जी को शान के लिए फाइनल किया और शक्ति फिल्म से जुड़े लोगों ने उन्हें शक्ति के लिए साइनिंग अमाउंट पकड़ा दिया और इस तरह कुलभूषण खरबंदा को एक साथ अपने करियर की दो सबसे बड़ी फिल्में मिल गई।

शान फिल्म की शूटिंग खत्म हुई और फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई। फिल्म को देखने वाला हर इंसान अमिताभ बच्चन के होते हुए भी 8 लाख की लागत से बने उस डैन और उस डैन‌ में बैठे हुए शाकाल से नजरें नहीं हटा पा रहा था।

शान फिल्म का शाकाल अमर हो गया और साथ ही हिंदी सिनेमा में शुरू हो गया कुलभूषण खरबंदा का जादुई सफर जिसके कई आयाम तय होने बाकि थे।

साल 1981 में आई श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म कलयुग को महाभारत का आधुनिक संस्करण माना जाता है जिसमें शशि कपूर और रेखा जैसे अभिनेताओं ने भी काम किया था।

श्याम बेनेगल के अलावा अब कुलभूषण खरबंदा कई और निर्माताओं के चहेते बन गए थे जिनकी फिल्मों में इनका नाम होना जैसे फिल्म की जरूरत बन गया था, इन निर्माता निर्देशकों में रमेश सिप्पी, दीपा मेहता, जेपी दत्ता और महेश भट्ट जैसे बड़े नाम भी शामिल थे।

1982 में आई फिल्म अर्थ जिसका निर्देशन महेश भट्ट ने किया था कुलभूषण खरबंदा के सिनेमाई सफर को एक नया आयाम देने वाली फिल्म थी, जिसमें शबाना आजमी और स्मिता पाटिल जैसी दिग्गज अभिनेत्रीयों ने उनके साथ काम किया था।

कई फिल्मों में विलन का किरदार निभाने के बाद कुलभूषण खरबंदा ने आगे करेक्टर किरदारों में भी अपनी प्रतिभा का लौहा मनवाया और एक से बढ़कर एक कई किरदारों को जीवंत करने का काम किया।

बोर्डर, घायल, गुप्त, जो जीता वही सिकंदर, शक्ति और लगान जैसी फिल्मों में इनके निभाए किरदार आज भी सिनेमा प्रेमियों को याद है।

कुलभूषण खरबंदा की निजी जिंदगी की बात करें तो इनकी शादी महेश्वरी देवी से हुई, जिनकी पहली शादी कोटा के महाराजा से हुई थी।

Kulbhushan Kharbanda with his wife

महेश्वरी देवी से इन्हें एक बेटी हुई जिसका नाम श्रुति खरबंदा है जो एक ज्वैलरी डिजाइनर के तौर पर काम करती है।

बहुत से लोग कीर्ती खरबंदा को भी इनकी बेटी मानते हैं लेकिन ऐसा नहीं है।

फ़िल्मों में काम करने के बाद कुलभूषण खरबंदा ने टीवी में भी हाथ आजमाया लेकिन 2011 में कुलभूषण खरबंदा होर्स राइडिंग करते हुए गिर गए जिसके चलते इन्हें बहुत सी चोटे आई और डोक्टर ने इन्हें बैंड रेस्ट करने को कह दिया।

कुछ समय बाद प्ले राइटर और डायरेक्टर विनय शर्मा इनके पास आए और उन्होंने कुलभूषण खरबंदा को अपने नाटक आत्मकथा में काम करने को कहा लेकिन कुलभूषण जी ने अपनी हालत को देखते हुए उन्हें मना कर दिया।

मगर विनय शर्मा को अपने नाटक के लिए कुलभूषण खरबंदा ही चाहिए थे और इसीलिए उन्होंने खरबंदा जी के ठीक होने और हां कहने का इंतजार किया।

खरबंदा जी ने आत्मकथा नाटक में काम किया और यही नाटक कुलभूषण खरबंदा के सिनेमा जगत में फिर से वापसी करने का कारण बनकर सामने आया।

आत्मकथा जैसे नाटक में काम करने के बाद कुलभूषण खरबंदा ने एक बार फिर फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा जहां इन्होंने मणिकर्णिका और नो फादर इन कश्मीर के साथ साथ मिर्जापुर वेबसीरीज में अपनी अदाकारी का जौहर दिखाया।

मिर्जापुर वेबसीरज में कुलभूषण खरबंदा के द्वारा निभाए गए किरदार सत्यानंद त्रिपाठी उर्फ बाऊजी ने नई जनरेशन को भी उनका मुरीद बना दिया है।एक ही जगह एक ही कपड़े में बैठे हुए अपने किरदार को इन्दरधनुषी रंग देने वाली उनकी प्रतिभा उनकी अदायगी आज भी वैसी ही है जैसी आज से 40 साल पहले थी। कुलभूषण खरबंदा अब तक थिएटर, पैरेलल और मैन स्ट्रीम सभी पर अपना जादू बिखेर चुके हैं लेकिन पैरेलल सिनेमा में उनके इस जादु का रंग थोड़ा गाढ़ा नजर आता है जिसके पीछे का कारण वे किरदार है जो कुलभूषण खरबंदा ने वहां निभाए हैं।

हिंदी सिनेमा में यह अभिनेता अपने बढ़ते करियर के साथ साथ सिमटता चला गया, शान जैसी फिल्मों में मुख्य फोकस में रहने वाले कुलभूषण खरबंदा 90’s के बाद कुछ मिनटों में सिमट कर रहने लगे थे।

मिर्जापुर वेबसीरज ने कुलभूषण खरबंदा की इसी सिमटती अदाकारी फिर से फैलाव देने का मौका दिया था जिसका इन्होंने पुरा फायदा भी उठाया है।

लगभग 45 सालों का सिनेमाई करियर और लगभग 150 फिल्मों में अपने शानदार काम के बावजूद भी इस महान अभिनेता को एक भी अवार्ड नहीं दिया गया।

Kulbhushan Kharbanda as Akhanda

1986 में आई फिल्म गुलामी के लिए कुलभूषण खरबंदा को अपने करियर का एकमात्र फिल्मफेयर नोमिनेशन दिया गया था।

इसीलिए कहा जाता शायद कि कई काम ऐसे भी होते हैं जिनके लिए कोई अवार्ड मायने नहीं रखता, वो काम हर अवार्ड से बढ़कर होता है।

इसी उम्मीद के साथ कि कुलभूषण खरबंदा जी आगे भी हमें अपने बेहतरीन काम से मनोरंजित करते रहेंगे आज के इस एपिसोड में बस इतना ही मिलते हैं आपसे अगले एपिसोड में तब तक के लिए नमस्कार।

बाज़ीगर के मदन चोपड़ा दिलीप ताहिल की कहानी

नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है अनुराग सुर्यवंशी और आप देख रहे हैं नारद टीवी।

दलिप ताहिल भारतीय सिनेमा के जिस दौर से ताल्लुक रखते हैं वो दौर भारतीय सिनेमा का एक ऐसा समय था जब हर अभिनेता के लिए कुछ चुनिंदा किरदार तय हुआ करते थे।

उस दौर में जहां अच्छी शक्ल और शरीर वाले अभिनेता ही हीरो की भूमिका निभा सकते थे तो वहीं मोटा पेट और कुछ अजीब चेहरे वाले अभिनेता फिल्म में कोमेडियन का किरदार निभाया करते थे।

ऐसे समय में अपने आप को एक वर्सेटाइल अभिनेता साबित करने वाले लोगों की गिनती बहुत कम है जिसमें से एक नाम दलिप ताहिल का भी है।

जवाहरलाल नेहरू से लेकर मदन चोपड़ा और फिर इश्क फिल्म वाले हरबंश लाल का किरदार निभाने वाले इस अभिनेता की जिंदगी भी अलग अलग रंगों से सजी हुई है।

आज के इस एपिसोड में हम इसी दमदार अभिनेता की बेमिसाल जिंदगी के बारे में बात करने वाले है।

दिलिप ताहिल का जन्म 30 अक्टूबर 1952 को उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में हुआ था।

इनके पिता का नाम घनश्याम ताहिलरमानी था जो भारतीय एयरफोर्स में काम किया करते थे जिसके चलते इनकी पोस्टिंग समय समय पर भारत के अलग अलग शहरों में होती थी और इसीलिए दलिप ताहिल का बचपन भी अलग अलग स्थानों पर बीता है।

दलीप ताहिल की एक बड़ी बहन है जिनका नाम गीता है।

नैनीताल की शेरवुड कोलेज में पढ़ाई करते समय दलिप ताहिल यहां होने वाली हर तरह की गतिविधियों में हिस्सा लिया करते थे जिसमें क्रिकेट और फुटबॉल जैसे खेलों के अलावा नाटक भी शामिल थे।

शेरवुड कोलेज में अपने आखिरी सालों के दौरान दलिप ताहिल को माई थ्री एंजल्स नाम के नाटक में जोसेफ और सेक्सपियर के मशहूर नाटक मैकबेथ में टाइटल रोल निभाने के कारण लगातार दो बार कैंडल कप पुरुस्कार दिया गया था।

तीन बार यह पुरस्कार अपने नाम करने के बाद लोगों से वाहवाही और तारीफों को सुनकर दिलीप ताहिल ने अदाकारी को अपना प्रोफेशन बनाने का विचार किया जो आगे चलकर हकीकत की शक्ल लेने वाला था।

साल 1968 में जब दलिप ताहिल के पिता इंडियन एयरफोर्स से रिटायर हुए तो उन्हें मुम्बई में एक नौकरी मिल गई थी जिसके चलते इनका परिवार मुंबई आ गया और फिर वहीं रहने लगा।

यहां अपनी कोलेज की छुट्टियों के दौरान दलीप ताहिल अदाकारी के अपने शौक को एक नई दिशा देने के लिए एलिक पद्मसी के थिएटर ग्रुप से जुड़ गए जहां इन्हें अभिनय के अलावा थिएटर से जुड़े और भी बहुत से काम करने का मौका मिला था।

Dalip Tahil

एलिक पद्मसी के थिएटर ग्रुप में गोडस्पेल जैसे नाटकों में काम करने के दौरान वहां काम करने वाले अभिनेताओं और थिएटर में लोगों की भीड़ को देखकर दलिप ताहिल को इसके वकार का पता चला और उन्होंने थिएटर को ही फिल्मों तक पहुंचने के लिए माध्यम के रूप में चुन लिया।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और सेंट जेवियर्स कॉलेज में पढ़ाई करने के दौरान दलीप ताहिल के पिता इन्हें जहाज उड़ाने की ट्रेनिंग भी दिया करते थे लेकिन दलिप ताहिल ने अपने आप को एक अभिनेता के रूप में देखना शुरू कर दिया था और इसीलिए उन्होंने जेट्स, जहाज और पायलट जैसे शब्दों से दुरी रखना ही सही समझा और थिएटर में काम करना जारी रखा।

इसी दौरान भारतीय सिनेमा के जाने माने निर्देशक श्याम बेनेगल की नजर इन पर पड़ी और उन्होंने दलिप ताहिल को साल 1974 में आई अपनी फिल्म अंकुर में साइन कर लिया।

अंकुर में दलिप ताहिल का रोल बहुत बड़ा था लेकिन प्रीमियर पर जब दलिप ताहिल अपनी फिल्म देखने गए तो वो बहुत बड़ा रोल सिर्फ एक सीन में ही सिमट कर रह गया था।

पुरी फिल्म में काम करने के बावजूद खुद को सिर्फ पांच सात मिनट ही पर्दे पर देखने के बाद दलिप ताहिल श्याम बेनेगल के पास गए और उनसे इसका कारण पुछा तो उन्हें पता चला कि फिल्म की लम्बाई को सीमित करने के लिए उनका रोल काट दिया गया है।

इस घटनाक्रम के बाद दलिप ताहिल को फिल्मी दुनिया में एडिटिंग टेबल का महत्त्व मालूम हुआ जहां एक अच्छा खासा रोल भी महज कुछ पलों में स्पेशल अपीयरेंस का रुप ले सकता है।अंकुर फिल्म के बाद छः सालों तक दलिप ताहिल को किसी भी फिल्म में काम करने का मौका नहीं मिला जिसके चलते इन्हें जिंगल्स, एड्वर्टाइजमेंट और मोडलिंग के जरिए अपना खर्च चलाना पड़ा था।साल 1980 में इन्हें रमेश सिप्पी की फिल्म शान में एक छोटे सा किरदार निभाने का मौका मिला जो दलिप ताहिल के करियर की पहली मैन स्ट्रीम फिल्म भी थी।दलिप ताहिल को शान फिल्म में काम करने का मौका कैसे मिला इसके जवाब में दलिप ताहिल ने अपने एक इंटरव्यू में बताया है कि शान फिल्म में काम करने का ओफर उन्हें इस फिल्म के संवाद लेखक जावेद अख्तर ने दिया था और उन्होंने ही दलिप ताहिल को रमेश सिप्पी से मिलवाया था।

शान के बाद दलिप ताहिल को रिचर्ड एटनबरो की 1982 में आई फिल्म गांधी में एक कैमियो करने का भी मौका मिला था जिसमें इन्होंने एक सत्यग्राही का किरदार निभाया था।

उसी साल इन्हें दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन के साथ शक्ति और फिर महेश भट्ट की फिल्म अर्थ में भी काम करने का मौका मिला था।

Dalip Tahil

आज की आवाज, सल्तनत और डांस डांस जैसी फिल्मों में काम करने के बाद दलिप ताहिल साल 1987  में मशहूर टीवी सिरियल बुनियाद में भी नजर आए थे और यहां से इन्होंने अपना टेलीविजन करियर भी शुरू कर दिया था।

दिलिप ताहिल साल 1989 में संजय खान के मशहूर टीवी सिरियल दि स्वार्ड ओफ टीपू सुल्तान में भी नजर आए जिसके बाद इन्होंने ब्रिटिश टीवी सीरीज बोम्बे ब्लूज में भी काम किया।

होलीवुड में दलिप ताहिल की शुरुआत कहने को तो गांधी फिल्म से हो गई थी लेकिन साल 1988 में आई फिल्म दी डिसीवर्स और दि परफेक्ट मर्डर ने इन्हें होलीवुड में असल पहचान दिलवाई थी।

इसके बाद कयामत से कयामत तक, राम लखन, त्रिदेव और सौदागर जैसी फिल्मों ने दलिप ताहिल को उस मुकाम पर ला दिया जहां उन्हें हर तरह के किरदार में देखा जाने लगा था।

 फिर आया साल 1993 और फिल्म आई बाजीगर जिसने भारतीय सिनेमा को शाहरुख खान के रूप में एक नया सुपरस्टार दिया था।

इस फिल्म में शाहरुख खान की लाजवाब अदाकारी के अलावा दलिप ताहिल का मदन चोपड़ा वाला किरदार अपनी एक अलग अहमियत रखता है जिसे देखकर बहुत से सिनेमाई पंडितों ने मदन चोपड़ा को गब्बर और मोगेम्बो जैसे अमर किरदारों की लिस्ट का हिस्सा भी बता दिया था।

मदन चोपड़ा के किरदार को मिली प्रशंसाओं के चलते दलिप ताहिल आगे बहुत सी बड़ी फिल्मों में नजर आए जिसमें राजा, जीत और सुहाग जैसे नाम भी शामिल है।

इसके बाद साल 1997 में आमिर खान और अजय देवगन स्टारर फिल्म इश्क में इन्हें हरबंश लाल के किरदार में देखा गया जो इनके पिछले किरदारों से बिल्कुल ही अलग था।

भारतीय सिनेमा में अगर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का किरदार निभाने की बात हो तो पहला नाम दलिप ताहिल का ही आता है, साल 2013 में आई फिल्म भाग मिल्खा भाग में इन्होंने पहली बार नेहरू के किरदार को पर्दे पर अभिनीत किया था जिसके बाद साल 2014 में श्याम बेनेगल की टेलीविजन सीरीज संविधान में भी इन्होंने इस किरदार को जीवंत किया था।

बाजीगर के डायरेक्टर अब्बास मस्तान की फिल्म रेस में कबीर अहुजा का किरदार निभाने के बाद साल 2011 में इन्होंने शाहरुख खान के साथ रावन फिल्म से एक बार फिर पर्दे पर देखा गया था।

इसके बाद इन्होंने होस्टेज और दि फैमिली मैन जैसी वेब सीरीज के साथ अपने करियर में एक नई पारी शुरू की जिसके साथ ही दलिप ताहिल हर माध्यम में एक्टिंग करने वाले अभिनेताओं की लिस्ट में शामिल हो गए हैं।

साल 2015 में स्टार प्लस के टीवी सिरियल सीया के राम में इन्होंने महाराज दशरथ का किरदार निभाया था जिसके बाद साल 2019 में मिशन मंगल और 2020 में इन्होंने तमिल फिल्म दरबार में भी काम किया था।

एक अच्छे अभिनेता होने के साथ साथ दलिप ताहिल एक बेहतरीन आवाज के भी मालिक है, दलीप ताहिल ताहिल ने अक्टूबर  1994 में अपना एक एल्बम भी रिलीज किया था जिसका नाम राज की बातें हैं, इसके अलावा इन्होंने ए आर रहमान के साथ उनके बोम्बे ड्रीम्स वल्ड टूर में भी परफोर्म किया था।

Dalip Tahil Young

बात करें दलिप ताहिल की जिंदगी से जुड़े कुछ विवादों की तो  23 अक्टूबर 2018 के दिन दलीप ताहिल को खार पुलिस द्वारा अरेस्ट कर लिया गया था क्योंकि ये एल्कोहल के नशे में ड्राइव कर रहे थे और इनकी कार का एक्सीडेंट एक ओटोरिक्शा से हो गया था जिसके चलते उसमें बैठी सवारी को काफी चोटें आई थी।

सौं से ज्यादा बोलीवुड फिल्मों में काम करने वाले दलिप ताहिल साल 2017 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे।

अब बात करें इनकी निजी जिंदगी के बारे में तो इनकी शादी एक बिजनेस वुमन अमृता से हुई थी जिससे इन्हें एक बेटा और एक बेटी है जिसमें बेटे का नाम ध्रुव है जो अपने पिता की ही तरह एक अभिनेता हैं।

अभिनेता जीवन के जीवन से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ

जब भी कभी हिंदी फिल्मों के सफल खलनायकों का ज़िक्र होता है सैकड़ो चेहरे आँखों के सामने किसी चलचित्र की तरह गुज़रने लगते हैं और उन्हीं चेहरों में से कुछ ऐसे चेहरे भी होते हैं जिन पर आके निगाहें थम सी जाती हैं। वो चेहरे जो न सिर्फ बरसों से बल्कि कई दशकों से लोगों के दिलों पर राज करते रहे हैं। उनका अभिनय और उनका अलग अंदाज़ उन्हें अपने दौर के अभिनेताओं की भीड़ से अलग खड़ा कर देता है। उन्हीं दमदार और सफल अभिनेताओं में से एक हैं लेजेंडरी ऐक्टर जीवन।

नमस्कार दोस्तों मैं अनुराग सूर्यवंशी स्वागत है आपका हमारे आज के वीडियो में जिसके अंतर्गत हम चर्चा कर रहे हैं लेजेंडरी ऐक्टर और मशहूर खल अभिनेता ‘जीवन’ से जुड़े कुछ रोचक किस्सों के बारे में।

जीवन जी का जन्म 24 अक्टूबर 1915 में कश्मीर में हुआ था। उनका असली नाम ओंकार नाथ धर था। जीवन के पिता जी पाकिस्तान में स्थित गिलगिट के गवर्नर थे जो कि तब भारत का हिस्सा था। जीवन की माताजी का देहांत वर्ष 1915 में ही हो गया था जिस वर्ष जीवन का जन्म हुआ था और उनके तीन वर्ष का होते-होते उनके पिताजी का भी देहांत हो गया। जीवन का पालन-पोषण उनके 24 भाई-बहनों से भरे बड़े से परिवार में हुआ था। दोस्तों जीवन जी का सपना बचपन से ही एक अभिनेता बनने का था लेकिन एक गवर्नर फैमिली का बेटा फिल्मों में काम करे इस बात की इजाज़त मिलने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। उस ज़माने में फिल्मों में काम करना बिल्कुल अच्छा नहीं माना जाता था। नतीज़तन 18 साल की उम्र में दिन घर से भागकर जीवन बंबई आ गए। उस वक़्त उनकी ज़ेब में मात्र 26 रुपए थे, हालांकि उस ज़माने में ये बहुत कम भी नहीं थे लेकिन इतने ज़्यादा भी नहीं थे कि बंबई जैसी बड़ी और अनजान जगह के लिये इसलिये उन्होंने काम तलाशना शुरू कर दिया।

शुरुआत में उन्हें जो पहला काम मिला वो था निर्देशक मोहन सिन्हा के स्टूडियो में रिफ्लेक्टर पर सिल्वर पेपर चिपकाने का। मोहन लाल जी उस समय के जाने-माने निर्देशक हुआ करते थे और जब उनको पता चला कि जीवन की दिलचस्पी अभिनेता बनने की है तो उन्होंने अपनी फिल्म ‘फैशनेबल इंडिया’ में उन्हें रोल दिया। जीवन के काम को लोगों ने ख़़ूब पसंद किया और उन्हें कुछ और फिल्मों में बतौर अभिनेता काम भी मिला। उसी दौरान निर्माता निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें जीवन नाम दिया। 

Jeevan

वर्ष 1935 में प्रदर्शित फिल्म ‘रोमांटिक इंडिया’ से जीवन को उनकी असली पहचान मिली और उसके बाद तो उनके अभिनय का जो सिलसिला शुरू हुआ वो एक दो नहीं बल्कि पूरे 4 दशक तक चला। के एन सिंह, मदन पुरी, प्राण और प्रेम चोपड़ा जैसे नामी खल अभिनेताओं के दौर में भी उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई। जीवन ने अफसाना, स्टेशन मास्टर, नागिन, शबनम, कोहिनूर, हीर-रांझा, जॉनी मेरा नाम, कानून, सुरक्षा, लावारिस, अमर अकबर एंथनी और धर्म-वीर आदि ढेेरों यादगार फिल्मों में अहम भूमिकाएं निभाई।

दोस्तों जीवन अच्छी तरह से इस बात को जानते थे कि उनका चेहरा फिल्मी नायकों के जैसा नहीं है इसलिए उन्होंने खलनायकी में हाथ आजमाया और अपनी एक अलग पहचान बनायी। जीवन जी के अभिनय के जादू का अंदाज़ा आप इसी से लगा सकते हैं कि निर्माता निर्देशक बी आर चोपड़ा की फिल्म ‘क़ानून’ में उनके हिस्से सिर्फ एक ही दृश्य आया लेकिन वही दृश्य उस फ़िल्म का सबसे यादगार दृश्य बन गया। 

  कम लोगों को ही पता होगा कि अभिनेता जीवन के नाम पर एक किरदार को सबसे ज्यादा बार फिल्मों में निभाने का एक रिकॉर्ड दर्ज है और उस किरदार का नाम है ‘नारद’। 50 के दशक में बनी तकरीबन हर धार्मिक फिल्म में उन्होंने ‘देवर्षि नारद’ का रोल किया था। आलम ये था कि उस दौर में उनके बिना नारद के रोल की कोई कल्पना भी नहीं कर पाता था, फिर चाहे वो दर्शक हो या लेखक-निर्देशक। कुल 61 फिल्मों में ‘नारद’ का किरदार निभाने के लिये उनका नाम ‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड’ में दर्ज है। जीवन ख़ुद कहते थे कि ‘मैंने इतनी बार नारायण-नारायण का जाप किया है कि अगर जिंदगी में भूल-चूक से कुछ भी पाप किए होंगे तो वह धुल चुके होंगे।’ इस रोल के प्रति उनके समर्पण का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि नारद मुनि का किरदार निभाते समय वे मांसाहार का पूरी तरह त्याग कर देते थे। मांस-मछली के साथ-साथ शराब तक को भी हाथ नहीं लगाते थे। उनका कहना था कि, ‘सेट पर खड़ा होकर जब मैं नारायण-नारायण बोलता हूं, तब मेरे अंदर मांस-मच्छी या कुछ भी मांसाहार नहीं होना चाहिए। मैं इस किरदार को बड़ी श्रद्धा के साथ निभाता हूं।’

दोस्तों अपने ख़ास डायलॉग डिलीवरी के साथ साथ जीवन का अंदाज़ भी औरों से बिल्कुल अलग हुआ करता था। खलनायकी के हर रूप के अलावा उन्होंने कॉमेडी सहित विभिन्न चरित्रों को बखूबी निभाया। यदि उन्हें कंप्लीट और परफेक्ट एक्टर कहा जाये तो ये ग़लत नहीं होगा। 

 फोटोग्राफी, नृत्य, एक्शन, संगीत आदि में भरपूर दिलचस्पी में भी जीवन की भरपूर दिलचस्पी थी लेकिन उन्हें सफलता अभिनय के क्षेत्र में ही मिली।हिंदी के साथ-साथ जीवन ने पंजाबी फिल्मों में भी काम किया था। 

Jeevan Old Age

बेशक जीवन की छवि एक खलनायक की हुआ करती थी लेकिन निजी ज़िन्दगी में वो बहुत ही भले इंसान थे। कभी पैसों के मामले में उन्हें कोई धोखा दे जाये तो वे यही कहते कि “उस व्यक्ति को शायद ज्यादा जरुरत होगी”।

बहुत से लोगों ने जीवन की नकल कर उनकी जगह भरने की कोशिश की लेकिन इसमें कोई भी सफल नहीं हो सका। उनके बेटे अभिनेता किरन कुमार जी का कहना है कि, “मेरे पिता खलनायकी के ऐसे तिलिस्म थे जो कोई नहीं ढूँढ सकता था।” अपनी आवाज़ और अपने अंदाज़ से जीवन किसी भी साधारण चरित्र को एक अलग पहचान दे देते थे।

10 जून 1987 को मुम्बई में उनका लीवर ख़राब हो जाने से महान अभिनेता जीवन जी की मृत्यु हो गई।

आइये अब बात करते हैं उनके परिवार के बारे में। जीवन की पत्नी का नाम किरण धर था और वो लाहौर की रहने वाली थीं जो कि अब पाकिस्तान का हिस्सा है। दोस्तों जीवन के घर का नाम ‘जीवन किरण’ है जो कि उनके और उनकी पत्नी के नाम को जोड़कर उन्होंने रखा था। हालांकि लोग समझते थे कि उन्होंने अपने साथ अपने बेटे किरण कुमार का नाम जोड़ा था। दरअसल जीवन जी के बेटे अभिनेता किरण कुमार जी का असली नाम ‘दीपक धर’ था जिसे बाद में बदल कर उन्होंने ‘किरण कुमार” कर लिया। किरण कुमार जी की पत्नी का नाम ‘सुषमा शर्मा’ है जो कि एक गुजराती एक्ट्रेस हैं, जिनसे उन्हें दो बच्चे भी हैं।

जीवन के दूसरे बेटे का नाम भूषण जीवन है जो कि एक अभिनेता और निर्माता निर्देशक थे उनकी पत्नी  नेहा शरद रंगमंच टेलीविज़न और फिल्मों की अभिनेत्री हैं। नेहा शरद जाने माने लेखक शरद जोशी की बेटी हैं और ख़ुद भी लेखन में सक्रिय हैं। भूषण जीवन जी की मात्र छत्तीस साल की उम्र में किडनी फ़ेल होने से मृत्यु हो चुकी है।

Jeevan

जीवन जी की 2  बेटियाँ भी हैं जिनके नाम हैं निक्की जीवन और रिक्की जीवन।

दोस्तों हमें उम्मीद है कि महान अभिनेता जीवन जी पर आधारित आज का यह वीडियो आपको ज़रूर पसंद आया होगा। वीडियो के बारे में अपनी राय कमेंट्स के ज़रिये ज़रूर दें। तो मिलते हैं अगले वीडियो में ऐसे ही किसी और रोचक किस्से के साथ तब तक के लिये नमस्कार।

“मेरा नाम है बुल्ला” वाले अभिनेता मुकेश ऋषि की कहानी

भारतीय सिनेमा के हर दौर में विलेन्स का अपना एक अंदाज और अपना इतिहास देखने को मिलता है।

और समय समय पर पर्दे पर नजर आने वाले हर बड़े खलनायक ने फिल्मों के इस क्षेत्र में अपने ढंग से योगदान भी दिया है।

प्राण साहब ने जहां इस इतिहास में वर्सेटेलीटी यानि बदलाव को पोपुलर बनाया तो वहीं अमरीश पुरी और रजा मुराद ने अपने दौर में इस क्षेत्र को एक रौबदार आवाज देने का काम किया था।

डेनी डेन्जोंगपा जहां विलेन के तौर पर अपनी लगभग हर फिल्म में आलीशान जिंदगी बिताते नजर आते हैं तो वहीं अमजद खान ने गब्बर के किरदार से पहाड़ और डाकु जैसे शब्दों को एक अहम स्थान दिलवाया था।

इन सबके बावजूद जब भारतीय सिनेमा में खूंखार और वहशी खलनायकों की बात होती है तो इन बड़े चेहरों से बहुत पहले जो चेहरा हमारे जेहन में आता है वो चेहरा है मुकेश ऋषि का।

नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है अनुराग सुर्यवंशी और आप देख रहे हैं नारद टीवी जिसमें आज हम बात करने वाले है मुकेश ऋषि के बारे में।

मुकेश ऋषि का जन्म 19 अप्रैल 1956 को जम्मू के कठुआ जिले में हुआ था।

 इनके पिता स्टोन क्रशिंग यानी पत्थर तोड़ने का काम किया करते थे जो इनका फैमिली बिजनेस भी था।

अपनी शुरुआती पढ़ाई मुकेश ऋषि ने जम्मू में ही पुरी की थी और क्रिकेट बहुत अच्छा खेलते थे और स्कुल स्तर पर कई प्रतियोगिताओं में भाग भी लिया करते थे।

क्रिकेट में अपनी दिलचस्पी के चलते इनका दाखिला स्पोर्ट्स कोटे से पंजाब यूनिवर्सिटी में हो गया था और जल्द ही मुकेश ऋषि कोलेज क्रिकेट टीम के उपकप्तान भी बन गए थे।

कोलेज के दिनों के दौरान ही इनकी रुचि फिल्मी दुनिया में भी बढ़ने लगी थी जिसका सबसे बड़ा कारण था इनकी हाइट और पर्सनेलिटी जिसे देखकर हर कोई इन्हें फिल्मों में काम करने के लिए कहा करता था।

कोलेज की पढ़ाई पुरी करने के बाद मुकेश ऋषि मुम्बई आ गए और फैमिली बिजनेस में अपने पिता और बड़े भाई का हाथ बंटाने लगे लेकिन कुछ समय तक यह काम करने के बाद भी इनका मन इस काम में नहीं लग रहा था।

फैमिली बिजनेस को छोड़कर मुकेश ऋषि काम की तलाश में फिजी आ गए जहां इनकी मुलाकात अपनी कोलेज के समय की गर्लफ्रेंड केशनी से हुई जिनका परिवार फिजी में एक डिपार्टमेंटल स्टोर चलाया करता था।

मुकेश ऋषि भी उसी डिपार्टमेंटल स्टोर में काम करने लगे और कुछ समय बाद उनकी शादी फिजी में ही अपनी दोस्त केशनी से हो गई।

फिजी में काम करते हुए इन्हें एक कोर्स का पता चला जिसमें मोडलिंग और रेम्प वोक की ट्रेनिंग दी जाती थी, अपनी कद-काठी को देखते हुए दुकान के बाद मिलने वाले खाली समय का सदुपयोग करने के लिए मुकेश ऋषि ने यह कोर्स ज्वाइन कर लिया।

कुछ समय बाद मुकेश ऋषि अपने स्टोर के काम के चलते न्यूजीलैंड आ गए लेकिन वहां उनका सामना एक नए अनुभव से होने वाला था।

Mukesh Rishi (Bulla)

न्यूजीलैंड में उन्हें एक मोडलिंग एंजेसी के बारे में पता चला और अपने शौक को पूरा करने के लिए मुकेश ऋषि वहां चले गए, मोडलिंग एंजेसी के मालिक ने मुकेश ऋषि की कद काठी और रेम्प वोक देखकर इन्हें सलेक्ट कर लिया।

अगले दिन जब एंजेसी के मालिक ने उन्हें रेम्प वोक के लिए अपने स्टोर से ड्रेस सलेक्ट करने के लिए कहा तो वहां मुकेश को अपनी साईज की कोई ड्रेस ही नहीं मिली और इसलिए उन्हें अपने पहले मोडलिंग असाइनमेंट को छोड़ना पड़ा।

काम तो छुट गया लेकिन मुकेश ऋषि को यह भरोसा मिल गया था कि वो मोडलिंग की दुनिया में कुछ  कर सकते हैं और इसलिए न्यूजीलैंड में इन्होंने अलग-अलग एजेंसियों के लिए रेम्प वोक करना जारी रखा।

सात साल बाद अपनी बहन की शादी में शामिल होने के लिए मुम्बई आए और यहां अपने बड़े भाई से एक्टिंग की दुनिया में काम करने की इच्छा जताई और उनकी अनुमति मिलने के बाद मुकेश ऋषि इस चकाचौंध भरी दुनिया में अपना स्थान बनाने के लिए पहुंच गए।

मुकेश ऋषि स्ट्रगल से पहले एक्टिंग के बारे में सबकुछ सिखना चाहते थे और इसीलिए उन्होंने रोशन तनेजा की एक्टिंग स्कूल में दाखिला ले लिया और साथ ही डांस मास्टर मधुमति से ट्रेनिंग भी लेने लगे थे।

रोशन तनेजा की एक्टिंग स्कूल में एक एक्ट के दौरान आईशा जुल्का के साथ अपने एक सीन को करते समय मुकेश ऋषि इस तरह से उसमें डुब गए कि उनकी आंखों से आंसू निकलने लगे थे।

छः महीने के अंदर ही एक अभिनेता में इतनी परिपक्वता को देखकर रोशन तनेजा ने मुकेश ऋषि से कहा कि अब तुम फिल्मों में काम करने के लिए तैयार हो, बाकि एक्टिंग तुम्हें वक्त, हालात और अनुभव अपने आप ही सिखा देंगे।

इसके बाद शुरू हुआ मुकेश के स्ट्रगल का दौर जिसमें इन्होंने थमजप और च्यवनप्राश की कम्पनियों के एड्स में भी काम किया था।

इसी बीच संजय खान अपने टीवी सिरियल दी स्वोर्ड ओफ टीपू सुल्तान पर काम कर रहे थे जिसमें उन्होंने काम की तलाश में भटक रहे मुकेश ऋषि को मीर सादिक नाम का किरदार निभाने को दे दिया।

इस किरदार से उन्हें पहचान तो नहीं मिली लेकिन कैमरे को फेस करने का अनुभव और एक्टिंग की कुछ बारीकियों का ज्ञान उन्हें हो गया था।

इसके बाद मुकेश ऋषि घायल और हमला जैसी फिल्मों में भी छोटे किरदारों में नजर आए जिसके बाद साल 1993 में डायरेक्टर प्रियदर्शन की फिल्म गर्दिश में इन्हें बिल्ला जलानी के किरदार में देखा गया था।

अमरीश पुरी, जैकी श्राफ और डिम्पल कपाड़िया जैसे सितारों से सजी इस फिल्म में मुकेश के काम को बहुत पसंद किया गया था और इसीलिए मुकेश ऋषि फिल्म गर्दिश को अपनी ओफीशीयल डेब्यू फिल्म मानते हैं।

Mukesh Rishi

भारतीय सिनेमा में जहां हर कोई हीरो बनने का सपना लिए आता है तो वहीं मुकेश ऋषि शुरू से ही अपना करियर एक विलेन के तौर पर बनाना चाहते थे।

इससे जुड़ा एक किस्सा कुछ यूं है कि एक बार मुकेश ऋषि फिल्म निर्माता यश चोपड़ा से मिलने गए थे, वहां यश चोपड़ा ने मुकेश से उनके काम के बारे में पुछा तो उन्होंने कहा कि वो विलेन का रोल करना चाहते हैं, इसके जवाब में यश चोपड़ा ने कहा कि उनकी फिल्मों में विलेन जैसा कुछ होता ही नहीं है अगर रोमांटिक फिल्मों में कोई रोल चाहिए तो बताओ।

ये सुनकर मुकेश ऋषि खड़े हुए यश चोपड़ा का आशीर्वाद लिया और वहां से चले गए, हालांकि बाद में यश चोपड़ा ने ही मुकेश ऋषि को अपनी फिल्म परम्परा में एक रोल दिया था, जिसमें सुनिल दत के अलावा आमिर खान भी काम कर रहे थे।

इसके बाद मुकेश ऋषि बाजी फिल्म में भी नजर आए और इसी फिल्म के दौरान आमिर खान ने उन्हें अपनी अगली फिल्म सरफ़रोश की कहानी सुनाई, जो उन्हें पसंद भी आ गई थी लेकिन उस फिल्म पर काम तब तक शुरू नहीं हुआ था।

बाजी के बाद मुकेश ऋषि ने साल 1996 में लोफर, सपूत और घातक जैसी फिल्मों में काम किया था।

इसके बाद साल 1999 में सरफ़रोश फिल्म पर काम शुरू हुआ और इंस्पेक्टर सलीम के किरदार के लिए मुकेश ऋषि नाम सामने आया, लेकिन फिल्म के डायरेक्टर ने  मुकेश को इस रोल के लिए ओडिशन देने के लिए कह दिया।

मुकेश ऋषि ने तब तक किसी भी फिल्म के लिए ओडिशन नहीं दिया था लेकिन एक ही तरह के रोल करके वो थक गए थे इसलिए कुछ नया करने के लिए वो मान गए और इस तरह मुकेश ऋषि को इंस्पेक्टर सलीम का किरदार मिल गया।इसके बाद सुर्यवंशम, अर्जुन पंडित, पुकार और कुरुक्षेत्र में भी मुकेश ऋषि के काम को पसन्द किया गया था।2001 में सनी देओल की फिल्म इंडियन में वसीम खान और 2004 की फिल्म गर्व में जफर सुपारी के किरदार आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में ताज़ा है जिनमें मुकेश ऋषि के बेहतरीन काम को देखा गया था।

मुकेश ऋषि ने बोलीवुड फिल्मों के अलावा तेलगु, मलयालम, कन्नडा, भोजपुरी और पंजाबी फिल्मों में भी काम किया है जहां हर साल उनकी तीन से चार फिल्में रीलीज होती है।

नरसिम्हा नायडू, अधिपति और नमो वेंकटेशा जैसी तेलगु फिल्मों के अलावा  वार एंड लव और ब्लैक कैट जैसी मलयालम फिल्में भी इस लिस्ट में शामिल है।

बदलते समय के साथ साथ बोलीवुड फिल्मों में विलेन के किरदारों में भी बदलाव आता गया और 21 वीं सदी में जब हिन्दी सिनेमा में खलनायकों की अहमियत फिल्मों में कम होने लगी तो मुकेश ऋषि ने साउथ इंडस्ट्री में अधिक काम करना शुरू कर दिया जहां विलेन आज भी वैसे ही है जो 80’s और 90’s की बोलीवुड फिल्मों हुआ करते थे।

2010 में आई कम्प्यूटर एनिमेटेड फिल्म रामायण दी एपिक में हनुमान का किरदार निभाने के बाद मुकेश ऋषि खिलाड़ी786 और फोर्स में भी नजर आए थे।

Mukesh Rishi

बोलीवुड फिल्मों आज भले ही मुकेश ऋषि को ज्यादा काम नहीं मिलता है लेकिन अपनी अदाकारी से साउथ इंडस्ट्री में अब भी वो एक सुपरस्टार के तौर पर देखें जाते हैं।

हाल ही में मुकेश ऋषि ने महेश बाबू की फिल्म महर्षी में काम किया था और इस साल पवन कल्याण के साथ मुकेश ऋषि फिल्म वकील साहब में नजर आने वाले है।

100 से ज्यादा फिल्मों में काम करने वाले मुकेश ऋषि के सबसे यादगार किरदार की बात करें तो साल 1998 में आई फ़िल्म गुंडा में बुल्ला का किरदार आज भी सबको याद है।

शायरी की भाषा में लिखे गए संवादों से सजी इस फिल्म में मुकेश ऋषि का डायलॉग मैं हूं बुल्ला रखता हूं खुल्ला आज इंटरनेट की जनरेशन के बीच बहुत लोकप्रिय है, जिस पर कई मीम्ज भी बन चुके हैं।

बात करें इनकी निजी जिंदगी के बारे में तो मुकेश ऋषि के बेटे राघव ऋषि भी अपने पिता की तरह एक अभिनेता हैं।

मन्दाकिनी: कैसे एक वायरल तस्वीर ने ख़त्म किया करियर

दोस्तों कहा जाता है कि तस्वीरें इंसान की जिंदगी को और उससे जुड़ी यादों को फैलाव देने का काम करती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई जिंदगी तस्वीरों में ही सिमट कर रह जाए तो उस जिंदगी का रंग रुप कैसा होगा? वो जिंदगी कैसी होगी जिसकी कहानी हम चंद तस्वीरों को सामने रखकर बता सकते हैं। तो दोस्तो आज के इस एपिसोड में हम एक ऐसी ही खुबसूरत अदाकारा की बात करने वाले है जिन्हें अपनी जिंदगी में शोहरत उस दर्जे की नसीब हुई जिसे किसी पैमाने पर तौल पाना मुश्किल है लेकिन आज वही हीरोइन महज कुछ तस्वीरों में सिमटकर रह गई है।

नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है अनुराग सुर्यवंशी और आप देख रहे हैं नारद टीवी। 30 जुलाई 1963 को उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर में जन्मी मन्दाकिनी का असली नाम यास्मिन जोसेफ है। मन्दाकिनी के पिता जोसेफ एक ब्रिटिशर थे और मां का तालुक मुस्लिम धर्म से था। मन्दाकिनी की नीली आंखें और चेहरे की मासूमियत के चलते इन्हें बहुत छोटी उम्र में ही फिल्मों में काम करने का मौका मिल गया था। लेकिन यह काम इतना आसान भी नहीं था, फिल्म मजलूम से पहले मंदाकिनी को तीन फिल्म निर्माताओं द्वारा रिजेक्ट कर दिया गया था जिसका सबसे बड़ा कारण था इनका नाम जो उस समय की हिंदी फिल्मों के लिए सटीक नहीं था।

इसलिए जब इन्होंने फिल्म मजलूम में काम करने की इच्छा जताई तो फिल्म के प्रोड्यूसर रणजीत विरके ने इनका नाम बदलकर पहले माधुरी और फिर मन्दाकिनी रख दिया था। मन्दाकिनी जब अपनी पहली फिल्म मजलूम में काम कर रही थी उस दौरान महान फिल्ममेकर राज कपूर की नजर इन पर पड़ी जो फिल्म राम तेरी गंगा मैली से अपने सबसे छोटे बेटे राजीव कपूर को लोंच करने की तैयारी कर रहे थे। फिल्म राम तेरी गंगा मैली के लिए सबसे पहली पसंद डिम्पल कपाड़िया थी जो अपनी पहली फिल्म बोबी से फिल्म इंडस्ट्री का जाना पहचाना चेहरा बन चुकी थी।

लेकिन डिम्पल कपाड़िया एक पहाड़ी लड़की के किरदार में फिट नहीं बैठ रही थी और इसीलिए राज कपूर ने जब मंदाकिनी को देखा तो वो भोला भाला चेहरा उन्हें अपनी फिल्म के लिए सही लगा और इस तरह मंदाकिनी को अपने करियर की सबसे बड़ी फिल्म मिल गई। राम तेरी गंगा मैली फिल्म रीलीज हुई और मंदाकिनी रातों रात एक सुपरस्टार बन गई, फिर बात चाहे इनकी मासूमियत की हो या फिर इस फिल्म में दिए गए इनके कुछ बोल्ड सीन्स की मंदाकिनी की हर चीज दर्शकों के लिए इस फिल्म का केंद्र बन गई थी। हालांकि इस फिल्म के कई दृश्यों के लिए राजकपूर और मंदाकिनी को आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ा था जिसमें झरने वाला दृश्य भी शामिल है, लेकिन कारण चाहे कुछ भी हो मगर मंदाकिनी इस फिल्म से बॉलीवुड का एक बड़ा नाम बन चुकी थी।

Mandakini

राजीव कपूर को लोंच करने के लिए बनाई गई इस फिल्म से मंदाकिनी को बेस्ट एक्ट्रेस का फिल्म फेयर नोमीनेशन भी प्राप्त हुआ था। इसके बाद मंदाकिनी को कई बड़े अभिनेताओं के साथ मुख्य भूमिकाओं में फिल्मी पर्दे पर देखा गया जिसमें साल 1987 में आई फिल्म डांस डांस में मिथुन चक्रवर्ती, 1989 में कहां है कानून में आदित्य पंचोली और प्यार करके देखो में गोविंदा जैसे बड़े नाम शामिल हैं। मन्दाकिनी को 1987 में रिलीज हुई फिल्म लोहा और 1986 की फिल्म आग और शोला में भी देखा गया था जिनमें कई बड़े अभिनेताओं ने काम किया था, लेकिन कोई भी फिल्म वो सफलता हासिल नहीं कर पाई जो मंदाकिनी की पहली फिल्म ने हासिल की थी।

धीरे धीरे फिल्म निर्माताओं के जेहन से भी मंदाकिनी की वो छवि दुर होने लगी जो उन्होंने फिल्म राम तेरी गंगा मैली में देखी थी और इसीलिए इन्हें तेजाब जैसी फिल्मों में छोटे छोटे किरदार मिलने लगे थे। मन्दाकिनी ने कुछ तेलगु फिल्मों में भी काम किया था जिसमें सिमहासनम और भार्गव रामुदु शामिल है, इसके अलावा मंदाकिनी साल1990 में मिथुन की बंगाली फिल्म अंधा बिचार में एक स्पेशल अपीयरेंस में भी नजर आई थीं। कमांडो और तकदीर का तमाशा जैसी फिल्मों में मुख्य भूमिकाओं में नजर आने वाली मंदाकिनी के करियर को साल 1994 में सामने आई कुछ तस्वीरों ने खत्म कर दिया था। इन तस्वीरों में भारत का सबसे बड़ा भगौड़ा दाउद इब्राहिम दिखाई दे रहा था और उसके साथ मंदाकिनी बैठी हुई थी।

इसके बाद लोगों का नजरिया मंदाकिनी के लिए बिल्कुल बदल गया, उनके बारे में कई तरह की बातें होने लगी जिनमे से कुछ लोगों द्वारा कहा गया कि मंदाकिनी दाउद इब्राहिम की गर्लफ्रेंड है तो कुछ ने कहा कि मंदाकिनी ने दुबई जाकर दाउद से शादी कर ली है। फिल्मी गलियारों में ये खबरें भी उड़ने लगी कि दाउद के कहने पर ही बहुत सी फिल्मों में मंदाकिनी को हीरोइन के तौर पर लिया गया था जिसमें फिल्म राम तेरी गंगा मैली भी शामिल है, इस फिल्म के बारे में कहा गया कि इस फिल्म में डिम्पल कपाड़िया को छोड़कर मंदाकिनी को दाउद के कहने पर कास्ट किया गया था। कुछ तस्वीरों और खबरों ने मंदाकिनी के करियर की रफ्तार को एकदम खत्म कर दिया था जिसके चलते साल 1996 में आई फिल्म जोरदार के बाद यह अदाकारा फिल्मी दुनिया से गायब हो गई थी।

Mandakini

मंदाकिनी ने कुछ समय बाद वापसी करने की भी कोशिश की जिसके लिए इन्होंने म्यूजिक एल्बम का सहारा लिया और नो वेकेन्सी और सम्बाला जैसे दो एल्बम निकाले लेकिन कोई भी रास्ता इन्हें बोलीवुड फिल्मों में नहीं ला पाया। बात करें इनकी निजी जिंदगी के बारे में तो मंदाकिनी की शादी 1990 में पुर्व बौद्धिस्ट मोंक डोक्टर कग्यूर रिन्पोचे ठाकुर से हुई थी, जिनसे आज मंदाकिनी दो बच्चों की मां है जिसमें बेटे का नाम राबिल और बेटी का नाम राब्जे इनाया है। मंदाकिनी के पति डोक्टर कग्यूर को 70’s और 80’s  की जनरेशन मर्फी रेडियोज के विज्ञापन की तस्वीरों में नजर आने वाले बच्चे के तौर पर जानती है जो उस दौर में बहुत मशहूर विज्ञापन था। 2005 में एक इंटरव्यू के दौरान मंदाकिनी ने अपने करियर और कोन्ट्रोवर्सीज पर बात करते हुए कहा था कि जिन खबरों के चलते उनका करियर बर्बाद हुआ था उनमें लेशमात्र भी सच्चाई नहीं थी।

दाउद से उनकी मुलाकात दुबई में स्टेज शोज के दौरान एक फिल्म अभिनेत्री और एक फैन की तरह हुई थी, हम दोनों में रिश्ते और सम्बन्धों जैसा कुछ भी नहीं था। मंदाकिनी फिलहाल दलाई लामा की एक अनुयायी के तौर पर अपने पति के साथ मुम्बई में तिब्बती योगा क्लासेज और तिब्बती मेडिसिन सेंटर सम्भालती है। अपनी पहली फिल्म से ही अपनी मासूमियत से सबको अपना दीवाना बना लेने वाली मंदाकिनी की पुरी जिंदगी को अगर कुछ तस्वीरों में समेटने की कोशिश करें तो राम तेरी गंगा मैली में सफेद साड़ी में लिपटी मंदाकिनी जहां सभी के दिल में अपनी जगह बना चुकी थी तो वहीं एक क्रिकेट मैच के दौरान दाउद के साथ उनकी तस्वीर ने इस अदाकारा को हर भारतीय की नजरों में गिरा भी दिया था और बात करें आज के समय की तो 22 साल की वो खुबसूरत हीरोइन आज 58 साल की हो गई है जहां उन्हें पहचान पाना भी कभी कभी मुश्किल जान पड़ता है।

Mandakini With Dawood

यूसुफ खान से दिलीप कुमार बनने का किस्सा

भारतीय सिनेमा की कई पीढ़ियों को अपने प्रकाश से रोशन करने वाले एक ऐसे ही चिराग का नाम दिलीप कुमार है। कौनसा संवाद कैसे बोला जाएगा, कितनी हंसी कितनी उदासी और कैसा इमोशन पर्दे पर अभिनीत हो सकता है इस तरह के कई नियमों से भारतीय सिनेमा को रुबरु करवाने वाली एक भरी पुरी किताब है दिलीप कुमार जिसे पढ़कर न जाने कितने अभिनेताओं ने अपनी अदाकारी को संवारा है। आज के इस एपिसोड में हम इसी किताब के बनने की कहानी को पहले पन्ने से जानने कोशिश करेंगें। दिलीप कुमार का जन्म 11 दिसंबर 1922 को अविभाजित भारत के पेशावर में मशहूर किस्सा ख्वानी बाजार में मोहम्मद सरवर खान और आईशा बीबी के घर हुआ था और इनके बचपन का नाम युसुफ खान था। दिलीप कुमार अपने पिता की 13 संतानों में चौथे स्थान पर पैदा हुए थे और अपने माता-पिता के साथ एक संयुक्त परिवार में रहते थे। सरवर खान पेशावर में एक बड़े फल विक्रेता के रूप में काम करते थे जिन्हें दिलीप कुमार आघाजी कहकर पुकारा करते थे।

आघाजी के पारिवारिक रिश्ते दीवान बशेश्वरनाथ जी और उनके परिवार के साथ बहुत अच्छे थे और उन्हीं के कहने पर दुसरे विश्वयुद्ध के खतरे को देखते हुए सरवर खान का परिवार बम्बई गया था जहां व्यापार करने की स्थिति पेशावर से कहीं ज्यादा अच्छी थी। इसके बाद दिलीप कुमार के बड़े भाई की तबीयत बम्बई में बिगड़ने लगी तो यह परिवार महाराष्ट्र के पहाड़ी स्थान देओलाली में आकर रहने लगा था और अपने पिता के इन्हीं तबादलों के चलते दिलीप कुमार की शुरुआती पढ़ाई अंजुमने इस्लाम हाई स्कूल और बार्न्स स्कूल में हुई थी। माटुंगा की खालसा कॉलेज में पढ़ाई करते समय राजकपूर इनके सहपाठी थे जो दिलीप कुमार के फिल्मी सफर में इनके साथ रहे थे। सरवर खान अपने बेटे को सरकारी नौकरी करते देखना चाहते थे तो वहीं दिलीप कुमार बचपन में सोकर और क्रिकेट खेलना पसंद करते थे और उसी में अपना करियर बनाना चाहते थे। दुसरा विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद आघाजी को अपने काम में आने वाली मुश्किलों और पैसों की तंगी के कारण एक दिन युसुफ खान और इनके पिता के बीच झगड़ा हो गया था जिसके चलते युसुफ खान ने खुद पैसे कमाने का फैसला लिया और 40 रुपए घर से लेकर पुणे आ गए। पुणे पहुंचकर दिलीप कुमार एक रेस्टोरेंट में काम मांगने गए जहां उन्हें एक कैंटीन में फलों, सब्जियों, घी और दुध का स्टोक चैक करने और नया सामान मंगाने का काम मिल गया। एक दिन कैंटीन के मुख्य सैफ की अनुपस्थिति में अंग्रेजी सिपाहियों के मेजर जनरल अपने कुछ साथियों के साथ वहां आए तो उनके लिए दिलीप कुमार ने अपने मैनेजर के कहने पर सैंडविच बनाया जो उन्हें बहुत पसंद आया जिसके लिए मेजर जनरल और उनके साथियों ने मैनेजर की बहुत प्रशंसा की थी।

Dilip Kumar Young

इसके बाद जब दिलीप कुमार ने अपने मैनेजर से कैंटीन के क्लब के पास अपनी एक सैंडविच की स्टाल लगाने की इच्छा जताई तो मैनेजर ने खुशी खुशी उन्हें इजाजत दे दी और इसके बाद दिलीप कुमार का यह काम भी अच्छे मुनाफे के साथ आगे बढ़ने लगा। दुसरा विश्व युद्ध अपने चरम पर था और भारत का स्वतंत्रता संग्राम भी जोरों शोरों से जारी था इसी बीच एक दिन किसी सिपाही ने दिलीप कुमार को इन मुद्दों पर एक भाषण तैयार करने को कहा जो उन्हें कैंटीन के सभी सदस्यों के सामने सुनाना था।

दिलीप कुमार ने अपना भाषण तैयार किया और अगले दिन जब उन्होंने अपना भाषण सबको सुनाया तो वहां मौजूद कुछ पुलिस अधिकारियों ने उन्हें पकड़ लिया और यरवदा जेल की कोठरी में कुछ सत्याग्रहियों के साथ बंद कर दिया। कुछ देर बाद सत्याग्रहियों की बातें सुनकर दिलीप कुमार को पता चला कि सरदार वल्लभ भाई पटेल भी इसी जेल की किसी कोटड़ी में बंद है जिनके साथ ये सभी लोग भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं। इतना सुनकर दिलीप कुमार भी उनके साथ भूख हड़ताल में शामिल हो गए और एक रात बिना कुछ खाए पीए रहने के बाद उन्हें अगले दिन किसी आर्मी मेजर के कहने पर रिहा कर दिया गया था। इसके बाद दिलीप कुमार अपनी कमाई के पांच हजार रुपए लेकर वापस बम्बई आ गए और अपने पिता के काम में उनका हाथ बंटाने लगे लेकिन अब भी उनके मन में कुछ नया करने की इच्छा थी और उन्हें लगने लगा था कि वो कुछ बड़ा करने के लिए ही पैदा हुए हैं।

एक दिन जब दिलीप कुमार चर्चगेट स्टेशन पर दादर जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहे थे तब उनकी मुलाकात डॉ मसानी से हुई जो इनके पिता को जानते थे। जब युसुफ खान ने उन्हें बताया कि वो किसी काम की तलाश में हैं तो डाक्टर मसानी ने उन्हें कहा कि मैं बोम्बे टाकीज की मालकिन से मिलने मालाड जा रहा हूं अगर तुम्हें कुछ दिक्कत ना हो तो तुम भी मेरे साथ चलो वहां तुम्हें कोई काम जरूर मिल जाएगा। युसुफ खान जब बोम्बे टोकीज की मालकिन देविका रानी से मिले तो उन्होंने युसुफ खान को उर्दू भाषा में उनकी अच्छी पकड़ को देखते हुए एक एक्टर के तौर पर 1250 रुपए की सैलरी पर उन्हें काम पर रख लिया। कुछ समय तक फिल्मों की शूटिंग देखने और अशोक कुमार से एक्टिंग के गुर सीखने के बाद एक दिन देविका रानी ने युसुफ खान को ज्वार भाटा फिल्म से लोंच करने का मन बनाया जिसके लिए उन्हें एक स्क्रीन नाम की जरूरत महसूस हुई। दिलीप कुमार जो तब तक युसुफ खान थे उनके सामने वासुदेव, जहांगीर और दिलीप कुमार ये तीन नाम रखे गए जिसमें से इन्होंने तीसरा नाम अपने लिए चुना और इस तरह युसुफ खान बन गए दिलीप कुमार।

Dilip Kumar

दिलीप कुमार की पहली दो फिल्में ज्वार भाटा और प्रतिमा बोक्स ओफीस पर फ्लॉप होने के बाद 1946 में आईं फिल्म मिलन दिलीप कुमार के करियर की पहली हिट साबित हुई। इसके बाद 1947 में आई फिल्म जुगनू के बाद दिलीप कुमार को मिडिया और फ़िल्म प्रशंसकों ने पहचानना शुरू कर दिया और फिर शुरू हुआ शोहरत का वो दौर जो अगले पचास सालों तक बदस्तूर जारी रहने वाला था। एक दिन बशेश्वरनाथ जी आघाजी के घर आए और उन्हें अपने साथ उस जगह ले गए जहां फिल्म जुगनू का एक बड़ा पोस्टर लगा हुआ था जिसे देखकर दिलीप कुमार के पिताजी को पहली बार मालूम हुआ कि उनके बेटे ने उस काम को अपना प्रोफेशन बना लिया है जिसे वो नौटंकी मानते हैं। इस बात ने आघाजी को नाराज कर दिया लेकिन यह नाराजगी लोगों से अपने बेटे के काम की प्रशंसा सुनते ही दुर हो गई। इसी साल आई फिल्म शहीद में दिलीप कुमार जहां कामिनी कौशल के साथ पहली बार नजर आए तो वहीं साल 1948 में आई फिल्म मेला में नरगिस और दिलीप कुमार की जोड़ी को पहली बार पर्दे पर देखा गया था।

मेला फिल्म की रिलीज के बाद नौशाद साहब के कहने पर दिलीप कुमार के पिताजी पहली बार कोई फिल्म देखने सिनेमाघर गए जहां उनके साथ दिलीप कुमार के चाचाजी भी थे। शाम को जब दिलीप कुमार अपने घर पहुंचे तो उनके पिता जी ने उनसे कहा देखो मुझे बताओ वो लड़की कौन थी जिससे तुम शादी करना चाहते हो, मैं उसके माता-पिता से बात करूंगा। कुछ देर बाद दिलीप कुमार को एहसास हुआ कि उनके पिता जी मेला फिल्म की हीरोइन नरगिस की बात कर रहे हैं और फिल्म की कहानी को सच मान बैठे हैं। इसके बाद दिलीप कुमार ने उन्हें समझाया और कहा कि ऐसा कुछ भी नहीं है, वो लड़की फिल्म में मेरी हीरोइन थी जिसका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। इसके बाद नदियां के पार, शबनम और अनोखा प्यार जैसी फिल्मों से यह सिलसिला जारी रहा और फिर साल 1949 में आई फिल्म अंदाज से दिलीप कुमार को भारतीय सिनेमा के ट्रेजेडी किंग का ताज मिल गया।

साल‌ 1951दिलीप कुमार के करियर में बहुत अहमियत रखता है क्योंकि इस साल‌ आई फिल्म दीदार में उन्हें एक अंधे आदमी का किरदार निभाने को कहा गया था। इस किरदार के लिए दिलीप कुमार ने बम्बई के एक अंधे फकीर को अपना दोस्त बना लिया था और घंटो उसके साथ बैठे रहते थे, जिसका परिणाम यह हुआ कि आज यह किरदार हिंदी सिनेमा में अमर हो गया है। इसके अलावा साल 1951 में तराना फिल्म भी रिलीज हुई थी जिसमें मधुबाला और दिलीप कुमार की जोड़ी को पहली बार पर्दे पर देखा गया था। फिर साल 1952 में दिलीप कुमार ने महबूब खान के साथ आन फिल्म में काम किया जो इनके करियर की पहली रंगीन फिल्म थी और कहा जाता है कि यही वो फिल्म थी जिसे देखकर सायरा बानो दिलीप कुमार को पसंद करने लगी थी। दिलीप कुमार हिंदी सिनेमा में एक बड़ा नाम बन चुके थे,लेकिन एक के बाद एक ट्रेजेडी फिल्में और उनके किरदार दिलीप कुमार के दिमाग पर गलत असर डाल रहे थे जिसके चलते इन्होंने कई डोक्टरों से अपना इलाज भी करवाया और हर डोक्टर ने इन्हें ट्रेजेडी फिल्मों की जगह कुछ समय के लिए कोमेडी फिल्मों में काम करने की सलाह दी। इसके बाद दिलीप कुमार साल 1955 में प्राण साहब और मीना कुमारी के साथ फिल्म आजाद में नजर आए थे जो एक कोमेडी फिल्म थी। लेकिन अगले ही साल दिलीप कुमार एक बार फिर फिल्म देवदास के साथ ट्रेजेडी किंग के तौर पर नजर आए जो शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के एक नोवेल पर आधारित फिल्म थी।

Dilip Kumar

साल 1957 में आई फिल्म नया दौर जिसे आज भी इसके शानदार म्यूजिक और इस फिल्म में दिलीप कुमार द्वारा निभाए गए एक तांगेवाले के किरदार के कारण पसंद किया जाता है। फिर आया साल 1960 जिसमें वर्षों के इंतजार के बाद फिल्म मुगल-ए-आजम रिलीज हुई जिसने हिंदी सिनेमा के इतिहास में कमाई के नए आयाम स्थापित कर दिए थे। अपने बेहतरीन संवादो के कारण याद की जाने वाली इस फिल्म के दौरान मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच बातचीत होना भी बंद हो गया था जिसके बाद यह जोड़ी हमें किसी भी फिल्म में नजर नहीं आई। इस फिल्म से जहां दिलीप कुमार एक अभिनेता के तौर पर सभी को अपना दीवाना बना चुके थे तो वहीं अगले साल आई फिल्म गंगा जमुना के साथ दिलीप कुमार एक प्रोड्यूसर के तौर पर भी नजर आए और यहां भी अपने जौहर से सबको अपना मुरीद बना दिया। इसके बाद दिलीप कुमार की लीडर फिल्म बोक्स ओफीस पर नाकामयाब रही लेकिन यह असफलता भी साल 1967 में आई फिल्म राम और श्याम के सामने धुंधली पड़ गई जिसमें दिलीप कुमार ने अपने फन का सबसे नायाब नमूना पेश किया था।

इसी दौरान 11 अक्टूबर 1966 को 44 साल की उम्र में दिलीप कुमार की शादी सायरा बानो से हो गई थी ‌। अपनी बढ़ती उम्र को देखते हुए दिलीप कुमार ने 1976 में आई फिल्म बैराग के बाद अगले पांच सालों तक किसी भी फिल्म में काम नहीं किया और फिर 1981 में मनोज कुमार के डायरेक्शन में बनी फिल्म क्रांति से इनके करियर की दुसरी पारी की शुरुआत हुई।

इसके बाद विधाता, कर्मा और सौदागर जैसी फिल्मों में काम करने के अलावा दिलीप कुमार ने मशाल और शक्ति में भी काम किया। 50 सालों के करियर में लगभग 65 फिल्मों में काम करने के बाद साल 1998 में आई फिल्म किला दिलीप कुमार की आखिरी फिल्म थी जिसके बाद दिलीप कुमार साल 2000 से 2006 तक मेम्बर ओफ पार्लियामेंट भी रहे थे। बात करें अगर दिलीप कुमार को मिले अवार्ड्स की तो आठ फिल्म फेयर पुरस्कार और 1994 में दादा साहेब फाल्के अवार्ड के अलावा दिलीप कुमार को पद्मभूषण, पद्मविभूषण और पाकिस्तान का सबसे बड़ा पुरस्कार निशाने इम्तियाज से भी नवाजा गया है। साल 2014 में दिलीप कुमार की ओटोबायोग्राफी रिलीज हुई जिसका नाम the substance and the shadow है। अपनी हर फिल्म, हर किरदार और हर संवाद को अमर कर देने वाले दिलीप कुमार आज 98 साल के हो गए हैं।

कंवलजीत सिंह: छोटे पर्दे का अमिताभ बच्चन

फिल्मी दुनियाँ हो या खेल का मैदान या कोई भी ऐसा फील्ड जहाँ एक शख़्स अपना रास्ता ख़ुद तय करता है और बिना किसी के सहारे, अपने दम पर अपनी मंज़िलों को हासिल कर लेता है। यक़ीनन ऐसी शख्सियत के बारे में जानने का मन किसे नहीं होता होगा। आप सभी की फरमाइश पर आज हम एक ऐसी ही शख्सियत से जुड़े कुछ रोचक और अनसुने किस्सों को आपसे साझा करने वाले हैं, और वो शख़्सियत हैं जाने माने अभिनेता कँवलजीत सिंह।

नमस्कार दोस्तों…

अभिनेता कंवलजीत जी का जन्म 19 सितम्बर 1951 को उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में एक सिख परिवार में हुआ था। सहारनपुर में ही पले बढ़े कंवलजीत ने ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद पुणे के फ़िल्म्स एंड टेलीविज़न इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया यानि FTII से ऐक्टिंग का कोर्स किया।

दोस्तों कंवलजीत जी के FTII में दाखिला लेने का भी एक बड़ा ही रोचक किस्सा है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि कँवलजीत जी का अभिनय के क्षेत्र में आने का कोई इरादा नहीं था 17 वर्ष की उम्र में उनका सपना एयरफोर्स में पायलट बनने का था। यहाँ तक कि उन्होंने बाकायदा उसके लिये तैयारी कर एन डी ए की परीक्षायें भी दीं, उन्होंने एक बार एयरफोर्स की परीक्षा पास भी कर ली थी लेकिन उसके बाद भी उनका सेलेक्शन नहीं हो सका क्योंकि उन्हें दाहिने कान से काफी कम सुनाई देता है। हालांकि अपने एक कान से कम सुनाई देने का वो अक्सर फायदा भी उठा लिया करते हैं ऐसा उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि उन्हें जब किसी की बात को नज़रअंदाज़ करना होता है तो वे अपनी इसी कमज़ोरी का बहाना बना लेते हैं ये कहकर कि “साॅरी यार सुन नहीं सका था ठीक से।”

ख़ैर हम बात कर रहे थे कंवलजीत के FTII जाने और अभिनेता बनने के सफर के बारे में। दरअसल कंवलजीत को ऐसा लगता था कि जीवन में कुछ करना है तो छोटे शहर से निकल किसी बड़ी जगह जाना होगा लेकिन इसके लिये उन्हें कोई नौकरी करनी होगी या किसी ट्रेनिंग के बहाने ही बाहर निकलने का मौक़ा मिल सकता है। कई सारी परीक्षायें देने के बाद भी उन्हें कोई सफलता तो नहीं मिल सकी लेकिन उसी दौरान उनके एक दोस्त के घर पर एक पत्रिका में छपे FTII के एक इश्तेहार पर उनकी नज़र पड़ गयी जिसमें वहाँ एडमिशन लेने से संबंधित जानकारी दी गयी थी। कंवलजीत को लगा कि ये एक अच्छा मौक़ा है सहारनपुर से बाहर निकलने का। बस फिर क्या था वो पहुँच गये अपने एक फोटोग्राफर मित्र के पास अपनी फोटो निकलवाने, साथ ही उन्होंने उसे यह भी हिदायत दी कि जब तक मेरा सेलेक्शन न हो जाये तब तक यह बात लीक नहीं होनी चाहिए। दरअसल कंवलजीत नहीं चाहते थे कि अगर किसी वज़ह से उनका सेलेक्शन न हो सका और उन्हें वापस आना पड़ा तो कोई उनका मज़ाक उड़ाये और कहे कि ‘हीरो बनने गया था और लौट आया।’

Kanwaljit Singh

बहरहाल उन्होंने अपनी तस्वीरें और फाॅर्म वगैरह FTII को भेज दिया और जल्दी ही उन्हें  ऑडिशन के लिये बुला लिया गया, जिसका सेंटर दिल्ली के एन एस डी यानि राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में था। ऑडिशन से ठीक एक दिन पहले दिल्ली में ही अपने चाचाजी के ज़रिये उनकी मुलाक़ात जाने माने रंगकर्मी हबीब तनवीर जी से हुई। उन्होंने कंवलजीत से पूछा “ऑडिशन के लिये क्या तैयारी है? कुछ करके दिखाओ ज़रा।” कंवलजीत जो कि देव आनंद जी के ज़बरदस्त फैन थे उन्होंने अपना तैयार किया हुये सारे संवाद को देव आनंद जी के अंदाज़ में अभिनय करते हुये सुना दिया। हबीब तनवीर जी ने हँसते हुये कहा कि “अगर तुम देव साहब की एक्टिंग करोगे तो देव साहब क्या करेंगे?” दरअसल कंवलजीत को अभी तक यही पता था कि  देव साहब, राज कपूर जी या दिलीप कुमार जी जैसे करते हैं वैसे ही करने को ऐक्टिंग कहते हैं। हबीब तनवीर ने समझाया कि किसी की नकल नहीं करना है आपको नॉर्मल तरीक़े से ही बोलना है जैसे आम ज़िन्दगी में आप बोलते हैं।  कंवलजीत को बात समझ में आ गयी, उन्होंने अभ्यास करके सफलता पूर्वक ऑडिशन दिया और उन्हें पुणे से बुलावा भी आ गया। कंवलजीत जी को अब अपना सपना साकार लगने लगा क्योंकि अब उन्हें इस बात पर विश्वास हो गया था कि अब वो आराम से लम्बे वक़्त तक बाहर पुणे जैसे शहर में रह सकेंगे।

दोस्तों कंवलजीत जी का पूणे जाने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है जिसका ज़िक्र उन्होंने अपने कई इंटरव्यूज़ में किया है। हुआ ये कि जब वो पुणे के लिये निकले तो उनकी ट्रेन पहले मुंबई के एक स्टेशन ‘मुंबई सेंट्रल’ पहुँचनी थी फिर उसके बाद उन्हें अगली ट्रेन मुंबई के ही दूसरे स्टेशन ‘सी एस टी’ जो कि उस वक़्त ‘वी टी’ स्टेशन के नाम से जाना जाता था, वहाँ से पकड़नी थी। मुंबई सेंट्रल पहुँच कर उन्होंने वहाँ से वी टी के लिये एक टैक्सी ली, टैक्सी वाला भी मीटर डाउन कर चल पड़ा लेकिन पता नहीं टैक्सी वाले ने जान बूझकर या फिर शार्टकट के चक्कर में टैक्सी को किसी ऐसे रास्ते से ले गया जहाँ औरते लड़कियाँ ऐसे खड़ी थीं जैसे भेड़ बकरियां बेची जा रही हों वे इशारे कर-कर के सबको बुला रही थीं। कंवलजीत को वो सब बहुत अजीब सा लगा, उन्होंने ड्राईवर से पुछा कि क्या है ये सब? तो ड्राइवर ने बताया कि ये रेड लाइट एरिया है कंवलजीत जी को यह सब देखकर बहुत तक़लीफ़ हुई उन्हें लगने लगा कि वे ग़लत जगह आ गये हैं, उस माहौल को देख उनका मन पूरी तरह से ख़राब हो गया और वे सोचने लगे कि उन्हें सहारनपुर वापस लौट जाना चाहिए।

इसी उधेड़बुन में उनकी टैक्सी वी टी स्टेशन पहुँच गयी और उनकी निगेटिविटी फिर से पॉजिटिवटी में बदल गयी। कंवलजीत वहाँ से पूणे रवाना हुए और वहाँ पहुँचकर उन्होंने FTII की ट्रेनिंग पूरी की और इसके बाद मुंबई आकर फ़िल्मों में प्रयास करना शुरू कर दिया।

वर्ष 1977 में उन्हें उनकी पहली फिल्म मिली ‘शंकर हुसैन’ जिसे बना रहे थे उस दौर के जाने माने निर्माता निर्देशक व गीतकार कमाल अमरोही जी। हालांकि वह फिल्म बनने में 3 वर्ष लग गये इस बीच उनकी दूसरी साइन की हुई फिल्म पहले रिलीज़ हो गयी उस फिल्म का नाम था ‘दास्ताँने लैला मजनूँ’ जो कि उनकी डेब्यू फिल्म बन गयी। इस फिल्म का एक गाना बहुत हिट हुआ था ‘कहीं एक मासूम सी एक लड़की’ जिसे कि रफ़ी साहब ने बहुत ही अलग अंदाज़ में गाया था। इसके बाद उन्होंने हम रहे न हम, शक़, सत्ता पे सत्ता और अशांति जैसी कई फिल्मों में काम किया।

Kanwaljit Singh

फिल्मों में काम करने के बाद उन्होंने टेलीविज़न का रुख़ कर लिया क्योंकि उनकी फिल्में सफल नहीं हो रही थी और जो हो रही थीं उससे उन्हें कुछ ख़ास फायदा भी नहीं मिल रहा था।

दोस्तों बहुत से लोग यह समझते हैं कि उनका पहला धारावाहिक बुनियाद था जिससे उन्होंने टेलीविज़न पर अपने अभिनय की शुरूआत की लेकिन ऐसा नहीं है। जाने माने निर्माता निर्देशक रमेश सिप्पी जी के बुनियाद से पहले उन्हीं के बैनर तले एक धारावाहिक बना था जिसका नाम था ‘छपते-छपते’, इस धारावाहिक से ही कंवलजीत ने टेलीविज़न पर शुरुआत की थी,  इस धारावाहिक के ज़्यादातर कलाकारों को बुनियाद में मौक़ा दिया गया था। धारावाहिक बुनियाद से उनकी एक पहचान तो बन गयी लेकिन सोने पे सुहागा तब हुआ जब कंवलजीत ने धारावाहिक फरमान में काम किया। जाने माने निर्देशक लेख टंडन जी के इस बेहद ही सफल धारावाहिक में कंवलजीत द्वारा निभायी एक नवाब की भूमिका से उनकी पहचान घर घर में हो गयी। हालांकि यह किरदार शुरू में कुछ नकारात्मक सा था लेकिन धीरे-धीरे उस किरदार के बदलते रूप ने अपने साथ-साथ कंवलजीत को भी सभी का चहेता बना दिया। इसके बाद तो उन्होंने ढेरों धारावाहिकों में सशक्त भूमिकाओं को निभाई जिनमें सांस, फैमिली नंबर 1, अभिमान, सिसकी, सारा आकाश और सबकी लाडली बेबो  आदि प्रमुख हैं।

बतौर चरित्र अभिनेता दिल मांगे मोर, कुछ मीठा हो जाये, हमको तुमसे प्यार है, मन्नत, बैंग बैंग, फिर से, कप्तान, वन नाईट स्टैंड और तुम बिन-2 आदि ढेरों फिल्मों में कंवलजीत ने हर तरह के किरदारों को अपने मौलिक अभिनय से जीवंत किया। कंवलजीत जी ने निर्देशक लेख टंडन जी की आख़िरी अधूरी फिल्म ‘फिर उसी मोड़ पर’ को भी पूरा करवाया इस फिल्म को बनाने के दौरान लेख टंडन जी के देहांत हो जाने की वज़ह से यह फिल्म अधूरी रह गयी थी। इस फिल्म को विभिन्न फिल्म फेस्टिवल में कई अवाॅर्ड्स भी मिले।

दोस्तों कंवलजीत  हिंदी के साथ साथ पंजाबी फिल्मों के भी एक सफल अभिनेता के रूप में जाने जाते हैं, साथ ही उन्होंने टाइपराइटर और होस्टेसेज़ जैसे कुछ वेब शोज़ में भी काम किये हैं और वो आज भी उसी उत्साह के साथ सक्रिय हैं। 

टीवी और फिल्मों में काम करने के अलावा उन्होंने रंगमंच पर ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ नाम के मशहूर नाटक में भी काम किया है। हालांकि उन्हें शुरूआत से ही रंगमंच से एक डर सा लगता था और उस पर से उनसे पहले भरत कपूर और लेजेंडरी ऐक्टर बलराज साहनी जैसे दमदार अभिनेताओं ने इस किरदार को अपने दमदार अभिनय से एक अलग ऊँचाई दे दी थी। उन्होंने बताया कि फिल्मों और टीवी शो में तो ऐक्टर को अपनी गलती सुधारने के लिए कई टेक मिलते है, लेकिन थिएटर में दूसरा मौका नहीं मिलता, और नाटक के दौरान अगर ऐक्टर अपने डायलॉक्स भूल गया तो दर्शकों के सामने उसका मज़ाक बन जायेगा। इसलिए वो थिएटर से हमेशा दूर ही रहते थे लेकिन इस डर के बावज़ूद उन्होंने रंगमंच पर शानदार अभिनय किया और वहाँ भी अपने अभिनय का लोहा मनवाया। इस नाटक को करने में उन्हें जितना डर लगा उससे कहीं ज़्यादा उन्हें एक सुकून मिला क्योंकि वे मिर्ज़ा ग़ालिब को पहले से ही बहुत दिल से मानते थे। न सिर्फ मिर्ज़ा ग़ालिब बल्कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ सहित जितने भी बड़े शायर रह चुके हैं सबको उन्होंने ख़ूब पढ़ा है। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि जब फ़ैज़ साहब की डेथ हुई थी तो कँवलजीत ने पूरे 3 दिन अपने बंद कमरे में उनकी किताबों को पढ़ते रहे। आइये अब एक नज़र डाल लेते हैं उनकी निजी ज़िंदगी पर। कंवलजीत जी की पत्नी का नाम है अनुराधा पटेल जो कि 80 के दशक की एक जानी मानी अभिनेत्री रह चुकी हैं। 30 अगस्त 1961 को मुंबई में पैदा हुईं अनुराधा पटेल का संबंध काफी बड़े फिल्मी परिवार से है, लेजेंडरी ऐक्टर अशोक कुमार जी रिश्ते में अनुराधा के नाना लगते हैं। अनुराधा ढेरों टीवी शोज और फिल्मों में नजर आ चुकी हैं उनके अभिनय जीवन की शुरुआत वर्ष 1983 में रिलीज हुई फिल्म ‘लव इन गोवा’ से हुई। उसके बाद वे वर्ष 1984 में रिलीज हुई फिल्म ‘उत्सव’ में रेखा की सहेली के किरदार में नजर आईं। इस फिल्म के एक सदाबहार गीत ‘बन मन क्यों बहका रे बहका’ को आज भी लोग उसी शिद्दत से देखते और सुनते हैं। वर्ष 1987 में प्रदर्शित फिल्म ‘इजाजत’में अपने शानदार अभिनय से अनुराधा ने सबका दिल जीत लिया फिल्म के गीत ‘मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है’ में उनकी ख़ूबसूरती और शानदार अदायगी के दर्शक आज भी कायल हैं । दूरदर्शन पर प्रसारित अपने पहले धारावाहिक छपते छपते में कँवलजीत और अनुराधा पटेल ने साथ काम किया था हालांकि इसके अलावा भी इन्हें दो फिल्मों में एक साथ काम करने का मौक़ा मिला था लेकिन उनमें से एक फिल्म पूरी न हो सकी जिसका नाम था ‘खिलाड़ी’ और दूसरी फिल्म थी ‘झूठी शान’ जिसमें बाद में उनकी जगह अभिनेत्री पल्लवी जोशी को रिप्लेस कर दिया गया।

Kanwaljit Singh

गई जो बाद में मोहब्बत में बदल गयी। 13 अप्रैल 1988 को कंवलजीत सिंह और अनुराधा पटेल वैवाहिक बंधन में बंध गये। सदा सुहागन, धर्म अधिकारी, रुखसत, दयावान, दीवाने, तुझे मेरी कसम,  ‘जाने तू या जाने ना’  रेडी और रब्बा मैं क्या करूं जैसी ढेरों फिल्मों में काम करने के अलावा अनुराधा कुछ धारावाहिकों जैसे ‘देखो मगर प्यार से’ और ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ में कैमियो रोल्स करती भी नज़र आयीं, साथ ही उन्होंने कई बड़े विज्ञापनों में भी काम किया। दोस्तों अनुराधा पटेल जी का मुंबई में ‘पर्सनालिटी डवलपमेंट’ का अपना एक इंस्टिट्यूट भी है। 

 अनुराधा और कंवलजीत की संतानों की बात करें तो उनके दो बेटे और एक बेटी हैं सिद्धार्थ, आदित्य और मरियम। बड़े बेटे सिद्धार्थ सिंगर राइटर और म्यूज़िक कॅम्पोज़र हैं तो छोटे बेटे आदित्य एक जाने माने आर्टिस्ट हैं, मुंबई में अक्सर उनके पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगती रहती है। एक ख़ास बात जो कि कम लोग जानते होंगे कि यू॰एस॰ए॰ में रह रही उनकी बेटी मरियम को उन्होंने गोद लिया था। 

Jad Se Jahan Tak

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