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बिली बोडेन: क्रिकेट इतिहास का वो अंपायर जिसे लोग मसखरा और बेहूदा कहते थे

“आवश्यकता ही अविष्कार की जननी है”। आइंस्टीन हो, एडीसन हो या फिर फैराडे । स्कूल में हर वैज्ञानिक के अविष्कार को इस कथन के साथ ही बताया जाता था। जोकि, समाज की दृष्टि से भी सही साबित होता है। लेकिन, खेल के मैदान पर ये वाक्य अपना रूप बदल लेता है। मैदान में आने वाली नई परेशानी रोमांच को जन्म देती हैं। फिर, चाहे मलिंगा की अंगूठा तोड़ यॉर्कर के जवाब में धोनी का हेलीकॉप्टर शॉट हो या अख़्तर की तीखी बाउंसर पर सचिन का अपर कट हो। खिलाड़ी हर समस्या का कोई न कोई समाधान निकाल ही लेते हैं। अपने ज़माने के एक ऐसे ही खिलाड़ी का नाम है बिली बोडेन। जी हाँ दोस्तों, वो बिली बोडेन जिन्हें आप अंपायरिंग के निराले अंदाज के लिये जानते हैं। नारद टी. वी. की ख़ास श्रृंखला ‘मेमोरेबल अंपायर’  के तीसरे एपिसोड में, दर्शकों की ख़ास डिमांड पर आज हम बिली बोडेन से जुड़े कुछ रोमांचक और अनछुए पहलुओं की बात करेंगे।

दोस्तों, साल 1963 के अप्रैल महीने में न्यूजीलैंड के हेंडर्सन में जन्मे बिली बोडेन स्कूली दिनों में एक तेज़ गेंदबाज़ थे। लेकिन, 20 साल की छोटी उम्र में ही बिली को जोड़ो में दर्द और खिचाव की शिकायत रहने लगी। ये पहला मौका था जब बिली को अपनी बीमारी के बारे में पता चला। दरअसल बिली को एक तरह की गठिया थी। जिसमें उनके जोड़ो के भीतर का तरल पदार्थ समाप्त हो रहा था। क्रिकेट से बेपनाह लगाव रखने वाले बिली को अपनी बीमारी के चलते खेल को छोड़ना पड़ा। लेकिन, उनके अंदर के खिलाड़ी ने हार नहीं मानी और बिली ने क्रिकेट से जुड़े रहने के लिए अंपायरिंग चुनी। क्रिकेट को नज़दीक से देखने वाले बिली ने शानदार तरीक़े से अंपायरिंग की ज़िम्मेदारी संभाली और सिर्फ़ दो साल के अंदर ही वो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के अंपायरों में शामिल हो गये। बिली ने हैमिल्टन साल 1995 में श्रीलंका बनाम न्यूजीलैंड एकदिवसीय मैच से अपने अंतर्राष्ट्रीय अंपायरिंग कैरियर की शुरुआत की। इसके 5 साल बाद बिली ने ऑस्ट्रेलिया बनाम न्यूजीलैंड मैच से अंपायर के रूप में अपना टेस्ट डेब्यू किया।       दोस्तों, बिली ने जिस गठिया के चलते अंपायरिंग चुनी। उस ने कुछ सालों बाद बिली के लिए अंपायरिंग करना भी मुश्किल कर दिया। हालाँकि, अंपायरिंग में खेलने जितनी मेहनत नहीं थी। लेकिन, अंपायरिंग में हाथों का तो इस्तेमाल होता ही है। यही बिली के लिये सबसे बड़ी परेशानी थी। बिली जब भी किसी बल्लेबाज़ को परंपरागत सीधी उंगली दिखा कर आउट देते थे। तो, उन्हें बहुत दर्द होता था। यही परेशानी बिली के साथ चौके और छक्के का इशारा करने में भी आती थी। लेकिन, बिली ने हार नहीं मानी और ज़रूरी इशारे देने का अपना ही तरीका निकाला। बिली ने आउट देने के लिये उंगली को सीधा रखने के बजाय टेढ़ा रखना शुरू किया। जिसे आगे चलकर ‘क़यामत की कुटिल ऊँगली’ कहा जाने लगा। क्योंकि, वो बल्लेबाज़ों के लिए एक बुरी ख़बर का इशारा थी। जबकि, छक्के का इशारा करते हुए वो हाथ को धीरे-धीरे हवा में उठाने लगे। वहीं चौका देते समय हाथ को झाड़ू देने के अंदाज़ में लहराने के साथ पैरों को भी लहराने लगे। चौके और छक्के देते समय बिली के पैर हिलाने के पीछे भी उनकी बीमारी ही है। दरअसल, पैर को इस तरह से मूव करने से बिली को दर्द से राहत मिलती है। ये एक तरह की एक्सरसाइज है। जो जोड़ो में तरलता बनाये रखती है। यहाँ एक ख़ास बात ये भी है। कि, बिली के ये इशारे फॉरमेट के साथ बदला करते थे। टेस्ट मैचों में उनके संकेत शांत और गंभीर होते थे। जबकि, एकदिवसीय मैचों में आकर्षक और निश्चित। वहीं ट्वेंटी -20 में भड़कीले और रोमांचक हुआ करते थे।

Billy Bowden

बिली का ये निराला अंदाज़ ही क्रिकेट प्रेमियों के दिल मे घर कर गया और वो देखते ही देखते फैन्स के पसंदीदा अम्पायर बन गये।

      दोस्तों, बिली बोडेन की अंपायरिंग का ये निराला अंदाज़ उनके प्रशंसकों और आलोचकों दोनों का ध्यान अपनी ओर खींचता था। उनके इस निराले अंदाज़ पर कई बार विशेषज्ञ बोल देते थे कि “बिली को याद रखना चाहिये। ये खिलाड़ियों का खेल है, अम्पायरों का नहीं। उसे अपनी हद पता होनी चाहिये।”  बिली के इस अन्दाज़ पर न्यूज़ीलैंड के पूर्व कप्तान मार्टिन क्रो उन्हें ‘मसखरा बोज़ो’  कहा करते थे। लेकिन, बिली इन सब बातों से परे अंपायरिंग का आनंद उठाने में व्यस्त रहते थे। बिली अपने शरुआती दिनों में ही एक अच्छे अंपायर के रूप में उभरे। वक़्त के साथ बिली का अंपायरिंग स्तर  बेहतर होता जा-रहा था। जिसका नतीजा रहा कि साल 2002 में वो अंतर्राष्ट्रीय अम्पायरों के एलीट पैनल का हिस्सा बन गए और अगले साल प्रोमोट होकर आई. सी. सी. द्वारा चयनित अम्पायरों के एलीट पैनल में शामिल होने का गौरव प्राप्त किया। इतना ही नहीं बिली ‘ब्रॉन्ज़ बेल्स’ सम्मान यानी 100 वन-डे मैचों में अंपायरिंग का सम्मान प्राप्त करने वाले दूसरे सबसे यूवा अंपायर थे। जबकि, उनसे आगे ऑस्ट्रेलियाई अंपायर साइमन टफेल हैं। बिली क़रीब 10 सालो तक आई. सी. सी. के एलीट पैनल का हिस्सा रहे। लेकिन, सलाना प्रदर्शन के आधार पर उन्हें साल 2013 में पैनल से निकाल दिया गया। ज़िन्दगी भर हार नहीं मानने वाले बिली ने 2014 में अपने ही देश के टोनी हिल को पीछे कर फिर पैनल में जगह बनाई। लेकिन, अगले साल 2015 में उन्हीं के देश के क्रिस गेफ़नी ने बिली की जगह ली और फिर वो पैनल से बाहर हो गये। उसके बाद फिर कभी बिली पैनल में शामिल नहीं हो पाये। साल 1995 से लेकर 2015 तक बिली ने 84 टेस्ट, 200 वन-डे और 24 टी-20 मैचों में अंपायरिंग की।

दोस्तों, बिली का अंपायरिंग कैरियर क़रीब 20 साल लम्बा रहा। ज़ाहिर है इस दौरान वो बहुत सी इतिहासिक घटनाओं का हिस्सा भी रहे हैं। जिसमे खासतौर पर है बिली बोडेन और टोनी हिल का साल 2010 इंग्लैंड बनाम पाकिस्तान लॉर्ड्स टेस्ट में एक साथ अंपायरिंग करना। वो ऐसा पहला टेस्ट था। जिसमे अंपायरिंग करने वाले दोनों न्यूट्रल अंपायर टोनी हिल और बिली बोडेन एक ही देश न्यूज़ीलैंड से थे। ये वो ही टेस्ट है जिसे अब मैच फिक्सिंग प्रकरण के लिये याद किया जाता है।

Billy Bowden

साथ ही बिली इतिहास के पहले अंतर्राष्ट्रीय टी-20 मैच में भी अंपायर थे। साल 2005 में खेले गए ऑस्ट्रेलिया बनाम न्यूज़ीलैंड मैच में बिली ने एक ख़ास और इतिहासिक हरकत भी की थी। बिली के साथ जुड़ी रोचक बातों में एक ये भी है। कि, बिली पहले ऐसे क्रिकेट अंपायर हैं जिसने फुटबॉल की तरह क्रिकेट में भी रेड कार्ड प्रयोग किया हो। बिली ने ऐसा एक नहीं दो बार किया। जिसमे पहला मौका तो पहले अंतर्राष्ट्रीय टी-20 मैच में ही आया। जब बिली ने मैक्ग्राथ को अंडर आर्म बोल फेंकने से रोकने के लिये रेड कार्ड दिखाया था। जबकि, दूसरा मौका 2014 में आया। जब बिली ने अफ़ग़ानिस्तानी कीपर शहज़ाद को ज़्यादा अपील के लिए रेड कार्ड दिखाया था।

      ऐसा नही है कि बिली ने अपने पूरे अंपायरिंग कैरियर में सिर्फ़ यादगार और सुनहरे पल ही देखे। कई मौकों पर बिली भी ग़लत साबित हुए हैं। कई मौकों पर बिली बोडेन भी विवाद का हिस्सा रहे हैं। जिसमें सबसे परेशान करने वाला मैच था साल 2007 विश्व कप फाइनल। जिसमें बिली फोर्थ अंपायर की भूमिका में थे। श्रीलंका बनाम ऑस्ट्रेलिया वो मैच गिलक्रिस्ट के शतक के अलावा, मैच के आख़िरी क्षणों में श्रीलंका के लगभग अँधेरे में बैटिंग करने के लिये याद किया जाता है। विश्व कप फाइनल जैसे मौके पर इस तरह अंधेरे में हुए मैच ने आई. सी. सी. की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किरकिरी करायी। जिसका परिणाम ये रहा कि मैच में अंपायरिंग कर रहे सभी अम्पायरों को अगले आई.सी.सी. टूर्नामेंट से बैन कर दिया गया। बिली की मानें तो वो उनके अंपायरिंग कैरियर का सबसे मुश्किल वक़्त था। लेकिन, कभी हार ना मानने वाले बिली अगले 8 साल यानी 2015 अंपायरिंग करते रहे। बिली फ़िलहाल न्यूज़ीलैंड के घरेलू क्रिकेट में अंपायरिंग से जुड़े हुए हैं। 

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