BiographyCricketSports

वो खिलाडी जिसके करियर में सिर्फ इंतजार था

मुरली कार्तिक Biography

      बेबाकी, ये शब्द कहने में बहुत रोमांचक लगता है। इस शब्द को अपने जीवन में उतार लेने वाला व्यक्ति ज़्यादातर मुश्किलों से घिरा रहता है। मगर, जो बेबाक हो! वो भला दुनिया से क्यों डरे? दोस्तों, आज अनसंग हीरोज़ ऑफ़ इंडियन क्रिकेट  में हम एक ऐसे ही बेबाक भारतीय खिलाड़ी की ज़िंदगी की कहानी आप से साँझा करने जा-रहे हैं। जो मैदान के बाहर अपने से बड़ो की ऐसी इज़्ज़त करता है कि मानो मुँह में ज़ुबान ना हो। लेकिन, मैदान में जाते ही उसे सिर्फ़ जीत दिखायी देती थी। वो खिलाड़ी जो बड़े नामों के टीम में होने के बावजूद युवाओं का स्टाइल आइकन था। वो खिलाड़ी जिसकी गेंदों से ज़्यादा चर्चा उसके चश्में और सुनहरे बालों की होती थी। वो खिलाड़ी आज जिसकी आवाज़ की दुनिया दीवानी है। अब तक तो आप पहचान ही गये होंगे। हम यहाँ मुरली कार्तिक की बात कर रहे हैं। वो मुरली कार्तिक जिन्हें कभी अधिक अपील करने के लिए बैन किया गया। तो कभी मांकडिंग‘ करने के लिये आलोचना झेलना पड़ी।  लेकिन, मुरली कार्तिक अपनी ही धुन में मग्न रहे।

11 सितम्बर 1976 को तमिल ब्रह्मिन परिवार में जन्मे मुरली कार्तिक के लिए क्रिकेट बस एक शौक था। लेकिन, मुरली के पिता उन्हें महान वेस्टइंडीज खिलाड़ी गैरी सोबर्स जितना बड़ा क्रिकेटर बनता देखना चाहते थे। पिता के कहने पर ही मुरली ने तेज़ गेंदबाज़ी करना शुरू की और पिता के ही कहने पर उन्होंने अपनी बल्लेबाज़ी पर काम किया। चेन्नई में रहने वाला दुबला-पतला लड़का मुरली कार्तिक जब दिल्ली आया। तो, उसकी गेंदों की रफ़्तार साथी खिलाड़ियों के मुक़ाबले बहुत कम थी। यहाँ से शुरू हुआ मुरली कार्तिक के स्पिनर बनने का सफ़र। उसी दौरान कार्तिक ने पूर्व भारतीय स्पिनर बिशन सिंह बेदी की निगरानी में स्पिन की बारीकियाँ सीखी। उसी दौरान बिशन सिंह बेदी की निगरानी में कार्तिक ने इंग्लैंड में एक मैच में महान वेस्टइंडीयन बल्लेबाज़ एल्विन कालीचरण को बोल्ड किया। जो कार्तिक के अनुसार उनकी ज़िंदगी के सबसे यादगार लम्हों में से एक है। क्रिकेट के मैदान पर कार्तिक शुरू से ही बेबाक रहे। गेम के प्रति उनका एटीट्यूड कमाल का रहा।

Murali Karthik

जिसे याद करते हुए मुरली के मेंटोर और महान भारतीय आल राउंडर कपिल देव ने कहा था “मैंने अपने 20 साल के अंतर्राष्ट्रीय कैरियर में इस तरह के एटीट्यूड वाला जोशीला लड़का अभी तक नहीं देखा है।”

      कार्तिक ने छोटी-सी उम्र में ही तारीफ़ और नाकामी दोनों देखी। साल 1992 में दिल्ली के लिए अंडर-16 डेब्यू करते हुए मुरली ने 74 रन देकर 10 विकेट लेने का कारनामा किया। लेकिन, अधिक उम्र के चलते वो ज़्यादा दिन तक अंडर-16 क्रिकेट नहीं खेल पाये। मुरली को उम्मीद थी कि शानदार प्रदर्शन के चलते दिल्ली अंडर-19 टीम में जगह मिल जाएगी। मगर, मुरली बस इंतज़ार ही करते रहे। क़रीब दो साल तक कोई भी घरेलू मैच नहीं खेलने के बाद मुरली ने रेल्वेज़ के लिए खेलने का फ़ैसला लिया। रेलवे के लिये अंडर-19 डेब्यू सीज़न में मुरली ने 14 की लाजवाब औसत से 24 विकेट लिए। अगले साल 1995-96 सत्र में मुरली ने क़रीब 19 की औसत से 38 विकेट लिए। जिसमे लगातार 3 पारियों में 5 विकेट लेने का रिकॉर्ड भी शामिल था। अब मुरली की ओर्थोडॉक्स स्पिन के चर्चे सीनियर क्रिकेट में होने लगे थे। साल 1996-97 में मध्य प्रदेश के ख़िलाफ़ एक साधारण डेब्यू के बाद मुरली ने विदर्भ के विरुद्ध अपने अगले फर्स्ट क्लास मैच में सनसनी मचा दी। मुरली ने विदर्भ की पहली पारी में हैटट्रिक ली और मैच में कुल 9 विकेट लिये। साल दर साल मुरली का प्रदर्शन बेहतर होता जा रहा था। मुरली ज़रूरत पड़ने पर रन भी बना रहे थे। लेकिन, हवा में फ्लैट ट्राजेक्टरी और लूपी गेंद के अलावा मुरली के पास जादुई टर्न नहीं था। उस दौर की क्रिकेट में स्पिनर का मतलब था गेंद घुमाने वाला मदारी। यही वजह रही कि मुरली को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर आने के लिए इंतज़ार करना पड़ा। लेकिन, मुरली के एटीट्यूड में कोई बदलाव नहीं आया। यहाँ एक घटना का ज़िक्र ज़रूरी है। दरअसल बात 1999-2000 की है। भारतीय टीम ऑस्ट्रेलियाई पिचों पर बुरी तरह हारकर लौटी थी। एक घरेलू मैच में मुरली जब बैटिंग करने आये । तो, उनके सामने सर्वश्रेष्ठ स्पिनरों में से एक अनिल कुंबले गेंदबाज़ी कर रहे थे। अनिल ने जब गेंद फ़ेंकी तो मुरली ने आगे बढ़कर डिफेंस किया। मुरली की इस हरकत पर कुंबले ने उन्हें चिढ़ाती हुई मुस्कुराहट दी। अपनी धुन में रहने वाले मुरली ने बेबाकी से कहा “यहाँ क्या अग्रेशन दिखा रहे हो। ऑस्ट्रेलिया में तो हवा टाइट थी।”  उस दौर में एक नए खिलाड़ी का अनुभवी गेंदबाज़ से ऐसा कहना बहुत बड़ी बात थी।

ये भी पढ़ें-बिली बोडेन: क्रिकेट इतिहास का वो अंपायर जिसे लोग मसखरा और बेहूदा कहते थे

हर परिस्थिति में मुरली कार्तिक के सकारात्मक एटीट्यूड ने उनका हौसला बनाये रखा। फिर वो दिन आया जिसके लिए मुरली ने दिन-रात मेहनत की थी। मुरली ने 24 फरवरी 2000 को दक्षिण अफ़्रीका के विरुद्ध टेस्ट मैच में पहली बार भारतीय कैप पहनी। नौजवान मुरली ने उस सिरीज़ में 2 टेस्ट खेले। मुरली ने 2 टेस्ट की 3 पारियों में 87 रन देकर 6 विकेट लिए। जिनमें पोलाक, क्लूजनर और बाउचर जैसे बल्लेबाज़ों के विकेट शामिल थे। 5 फुट 2 इंच के मुरली के पास गेंदों पर ग़ज़ब का नियंत्रण था। ऑर्थोडॉक्स गेंदबाज़ होने के बावजूद भी वो वेरिएशन में माहिर थे। साथ ही छोटे क़द के होते हुए भी गेंद को बाउंस कराने का दम रखते थे। इन सब ख़ूबियों के बावजूद भी मुरली की भारतीय टीम में जगह तय नहीं थी। क्योंकि, मुरली भारतीय टीम के साथ तीसरे स्पिनर के रूप में थे। मुख्य दो हरभजन सिंह और अनिल कुंबले थे। मुरली को अपने खेलने के लिए किसी के चोटिल होने का इंतज़ार करना पड़ता था। फिर आया साल 2004 ऑस्ट्रेलिया का भारतीय दौरा। शुरुआती दो मैचों में मुरली कार्तिक टीम में थे। मुरली ने उस सिरीज़ में खेले 3 मैचों में 13 विकेट लिये। ख़ासकर वानखेड़े में कुंबले और हरभजन के होते हुए भी मुरली ने भारत को करिश्माई जीत दिलाने में अहम योगदान दिया और मैच में 7 विकेट लेकर ‘मैन ऑफ़ द मैच’ बनें। इस प्रदर्शन के बाद मुरली अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खबरों में आ गए थे। सबको उम्मीद थी कि कम से कम भारत मे तो मुरली भारतीय टीम के नियमित सदस्य रहेंगे। लेकिन, ये नसीब ही कहा जायेगा कि उस यादगार मैच के बाद मुरली सिर्फ़ 1 टेस्ट मैच में ही भारतीय जर्सी पहन पाये। ऐसा ही कुछ मुरली के साथ वन-डे में भी हुआ। अपने आख़िरी 4 मैचों में मुरली ने 5.05 की शानदार इकॉनमी से 8 विकेट लिए। जिसमे ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ वानखेड़े वन-डे में 27 रन देकर 6 विकेट लेने का रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन भी शामिल था। इसमें कोई शक नहीं कि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में मुरली कार्तिक की शुरुआत अच्छी नहीं थी। लेकिन, जब मुरली ने अच्छा खेल दिखाना शुरू किया तो चयनकर्ताओं ने उनसे मुँह फेर लिया। मुरली का ज़िक्र करते हुए कई बड़े खिलाड़ियों ने कहा “मुरली उस युग मे आया, जब हरभजन और कुंबले अपने शीर्ष पर थे। अगर, मुरली किसी अन्य देश में होता। तो, वो उस टीम का बेस्ट स्पिनर होता।” लेकिन, ये बातें बस काल्पनिक ही हैं। मुरली कार्तिक साल 2007 के बाद फिर कभी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी नहीं कर पाये।

Watch on You Tube:-

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में वापसी की कोई उम्मीद न होने के बावजूद भी मुरली अगले 6 सालों तक फर्स्ट क्लास क्रिकेट खेलते रहे। इस दौरान मुरली इंग्लैंड में चार टीमों के लिए काउंटी क्रिकेट भी खेले। अंत मे साल 2014 में मुरली ने सभी तरह की क्रिकेट से संन्यास की घोषणा कर दी। मुरली ने भारत के लिए 8 टेस्ट में 24 और 37 वन-डे मैचों में 37 विकेट लिये।मुरली ने 56 आईपीएल मैच भी खेले। जिनमें वो सिर्फ़ 30 विकेट हासिल कर पाये। लेकिन, मुरली के आईपीएल और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के आँकड़ें उनकी प्रतिभा के साथ न्याय नहीं करते हैं। जिसका सबूत है 203 फर्स्ट क्लास मैचों में मुरली के नाम 644 विकटों का होना। फर्स्ट क्लास मैचों में मुरली के विकटों की संख्या ये बताती है कि ‘अगर चयनकर्ताओं ने मुरली में विश्वास दिखाया होता, तो आज मुरली नाम का सितारा अंतर्राष्ट्रीय पटल की शान होता’। लेकिन, मुरली कार्तिक को ज़्यादा मौके नहीं मिल पाने का बिल्कुल भी मलाल नहीं है। एक इंटरव्यू में मुरली ने कहा था “मैंने ज़िन्दगी भर क्रिकेट खेला और खूब एन्जॉय किया। मुझे क्रिकेट के सिवा कुछ नहीं आता है। मैं चाहता हूं कि अपने अनुभवों से मैं आने वाली पीढ़ी की ज़्यादा से ज़्यादा मदद कर पाऊं।” मुरली की यही चाहत उन्हें कमेंटटर्स बॉक्स में ले आयी। क्रिकेट को अपनी ज़िंदगी दे चुके मुरली आज हिंदी हो और इंग्लिश , दोनों भाषाओं में शीर्ष के कमेंटटरों में आते हैं।

Show More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Related Articles

Back to top button