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मिर्ज़ापुर के अखंडा, कुलभूषण खरबंदा की कहानी

उर्दू ज़बान के महान शायर शकील आज़मी की कलम से निकले ये शब्द हमें हर हाल में उड़ते रहने का हौसला देते हैं। यह शेर हमें बताता है कि किसी भी मुसीबत से डरकर हमें अपने काम को नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि पुरी शिद्दत और मेहनत से अपने काम को करते रहने का जुनून हमें वो कला सीखा जाता है जिसे परफेक्शन कहते हैं।

क्रिकेट की एक गेंद पर तीन चार वोट खेलने की कला और सिनेमाई पर्दे पर एक किरदार को अलग-अलग ढंग से निभाने का हुनर ही परफेक्शन कहलाता है जिसे मेहनत के जरिए ही हासिल किया जा सकता है।

और बात जब हिन्दी सिनेमा में सम्पूर्णता लाने की हो तो इस प्रतिभा की गिनती में बहुत कम अभिनेता ही आते हैं।

आज के इस एपिसोड में हम एक ऐसे ही परफेक्ट अभिनेता की बात करने वाले है जिसकी संवाद अदायगी और अपने किरदार को पी जाने वाली बात का कायल हर सिनेमा प्रेमी है।

नमस्कार दोस्तों मेरा नाम है अनुराग सुर्यवंशी और आप देख रहे नारद टीवी जिसमें आज हम बात करने वाले है हिंदी सिनेमा के शाकाल यानी कुलभूषण खरबंदा जी के बारे में।

कुलभूषण खरबंदा का जन्म 21 अक्टूबर 1944 में अविभाजित भारत के पंजाब राज्य में अटोक जिले के हसनाबदल नामक स्थान पर हुआ था।

1947 में जब भारत का विभाजन हुआ तो यह जगह पाकिस्तान के हिस्से में आ गई लेकिन कुलभूषण खरबंदा के परिवार ने भारत को अपना देश माना और भारत आ गए।

भारत आने के बाद कुलभूषण खरबंदा की पढ़ाई जोधपुर, देहरादून, अलीगढ़ और दिल्ली जैसे स्थानों पर हुई।

कुलभूषण जी को बचपन से ही कहानियां पढ़ने और सुनने का बहुत शौक था और ये कहानियां भी अपने एक अलग अंदाज में पढ़ा करते थे।

दरअसल कुलभूषण जी किसी भी कहानी में अपने पसंदीदा किरदार के संवादों को जोर जोर से अदायगी के साथ बोला करते थे और यहीं से इनके मन में अदाकारी का खुमार चढ़ने लगा था।

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अपनी शुरुआती पढ़ाई पुरी करने के बाद इन्होंने आगे की पढ़ाई दिल्ली यूनिवर्सिटी की किरोड़ीमल कॉलेज से पुरी की जहां इनके सहपाठियों में अमिताभ बच्चन भी शामिल थे।

कोलेज के दिनों में इनका रुझान थिएटर की तरफ बढ़ने लगा और इन्होंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक थिएटर ग्रुप बनाया जिसका नाम अभियान रखा गया था।

अब कुलभूषण जी के मन में एक्टिंग के लिए प्यार अपने पैर पसार चुका था और इसी का नतीजा था कि उन्होंने कोलेज के बाद एक और थिएटर ग्रुप ज्वाइन किया जिसका नाम यात्रिक था।

इस ग्रुप में कुलभूषण खरबंदा ने अपनी प्रतिभा से सबको अपना दीवाना बना लिया था जिसका परिणाम यह हुआ कि कुलभूषण जी इस ग्रुप के पहले विधार्थी बन गए जिन्हें एक्टिंग के लिए पैसे दिए जाते थे।

कुलभूषण खरबंदा अपने थिएटर ग्रुप में एक बड़ा नाम बन चुके थे लेकिन वो वहीं रुकना नहीं चाहते थे।

अपनी अदाकारी को बेहतर से बेहतरीन बनाने की उनकी जिद्द उन्हें nsd ले गई जो उस समय अपने शुरुआती दौर से गुजर रहा था।

कुलभूषण खरबंदा ने nsd में प्रवेश प्राप्त करने के लिए एग्जाम दिया और उनका सलेक्शन भी हो गया लेकिन वो फिर कभी भी वहां नहीं गए।

जिसका कारण इन्होंने उस समय nsd के बारे में प्रचलित कई भ्रांतियों को बताया है।

कुलभूषण खरबंदा nsd को छोड़कर कोलकाता चले गए और एक गैस फैक्ट्री में सेल्समैन के तौर पर नौकरी करने लगे और साथ ही यहां अपनी अदाकारी के ख्वाब को जीवित रखने के लिए कुलभूषण जी पदातिक नाम के थिएटर ग्रुप में शामिल हो गए।

यहां कुलभूषण जी ने एक से बढ़कर एक नाटकों में अभिनय किया लेकिन सखाराम बिंदर नाम के नाटक को लेकर एक बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो गया जिसके चलते इन्हें अपने काम से निकाल दिया गया।

काम से हाथ धोने के बाद कुलभूषण जी ने अपना पुरा समय थिएटर को समर्पित कर दिया और अपनी प्रतिभा और काम से खुद को एक अच्छे अभिनेता के रूप में ढाल लिया था।

Kulbhushan Kharbanda

कुलभूषण जी अपनी अदायगी से कोलकाता के थिएटर ग्रुप का जाना माना नाम बन गए थे और दुसरी तरफ  सिनेमा की दुनिया में एक नया सितारा निर्माता के रुप में अपने कदम बढ़ा चुका था नाम था श्याम बेनेगल जिनकी पहली फिल्म अंकुर ने सबको उनका मुरीद बना दिया था।

एक दिन कुलभूषण जी के किसी मित्र ने श्याम बेनेगल को इनका नाम बताया और कहा कि ये अभिनेता आपकी फिल्मों में काम कर सकता है।

श्याम बेनेगल ने कुलभूषण जी को फोन किया और अपनी फिल्म निशान्त में काम करने के लिए कहा लेकिन कुलभूषण जी अपनी थिएटर की दुनिया को छोड़कर फिल्मों में काम नहीं करना चाहते थे।

कुलभूषण खरबंदा ने श्याम बेनेगल को अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि मैं कोलकाता से मुंबई आऊंगा ओडिशन दुंगा लेकिन आप मुझे काम दोगे नहीं और मेरे पैसे भी खर्च हो जाएगे। यह कहते हुए कुलभूषण जी ने श्याम बेनेगल को मना कर दिया।

लेकिन श्याम बेनेगल को कुलभूषण जी की प्रतिभा पर शायद भरोसा हो गया था जिसके चलते उन्होंने कुलभूषण जी की टिकिट और रहने का इंतजाम करवाया और उन्हें मुम्बई बुला लिया।

निशांत फिल्म में कुलभूषण खरबंदा का रोल कुछ ही दिनों का था जिसके चलते इन्होंने एयरपोर्ट तक जाने के लिए अपना स्कूटर लिया और एयरपोर्ट से टिकट लेकर मुम्बई चले गए। ये सोचकर कि कुछ दिन शूटिंग करने के बाद जल्दी ही कोलकाता वापस आ जाऊंगा लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था।

मुम्बई आने के बाद लगभग एक महीने कुलभूषण जी को फिल्म के शुरू होने का इंतजार करना पड़ा और इसके बाद जब शूटिंग शुरू हुई तो इनके काम और प्रतिभा ने श्याम बेनेगल पर अपना जादू कर दिया था।

श्याम बेनेगल ने कुलभूषण जी के काम को देखते हुए इन्हें अपनी कुछ और फिल्मों में भी साइन कर लिया और वह स्कूटर तीन सालों तक उसी एयरपोर्ट पर उनके आने का इंतजार करता रहा।

कुलभूषण खरबंदा की पहली मैन स्ट्रीम बोलीवुड फिल्म का नाम जादु का शंख था जो साल 1974 में आई थी।

थिएटर के अपने शानदार अनुभव को साथ लेकर आएं कुलभूषण जी ने निशांत के बाद मंथन, जूनून और भूमिका जैसी फिल्मों में भी श्याम बेनेगल के साथ काम किया जिसके चलते थिएटर के बाद पैरेलल सिनेमा में भी कुलभूषण खरबंदा एक जाना पहचाना नाम बन गए थे।

श्याम बेनेगल और कुलभूषण खरबंदा की जोड़ी जहां पैरेलल सिनेमा में झंडे गाड़ रही थी वहीं दूसरी ओर रमेश सिप्पी और जावेद सलीम की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को बदल कर रख दिया था।

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1975 में आई फिल्म शोले ने हिंदी सिनेमा के एक नए दौर को जन्म दिया था जिसके बाद रमेश सिप्पी वैसी ही एक और फिल्म बनाना चाहते थे।

1980 में आने वाली फिल्म शान में रमेश सिप्पी शोले के गब्बर की ही तरह एक नए विलेन को पर्दे पर लाना चाहते थे।

एक ऐसा विलेन जो अपने हाथों से मार धाड़ करने की बजाय टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए अपने दुश्मनों को खत्म करता हो।

फिल्म के इस किरदार के लिए तलाश शुरू हुई और संजीव कुमार से होते हुए कुलभूषण खरबंदा पर जाकर खत्म हो गई और खरबंदा जी बन गए हिंदी सिनेमा के पहले हाईटैक विलेन।

कुलभूषण खरबंदा को शान फिल्म मिलने का किस्सा कुछ यूं है कि जिस समय शान के शाकाल की खोज चल रही थी उस दौरान एक दिन सलीम खान कुलभूषण खरबंदा को जानने वाले कुछ लोगों के साथ खाना खा रहे थे और खाना खाते-खाते सलीम खान ने शान के विलेन के बारे में बताते हुए कहा कि दो सालों से इस किरदार के लिए अभिनेता की तलाश कर रहे हैं लेकिन कोई मिल नहीं रहा है।

एक अभिनेता को मैंने मंथन फिल्म में देखा था जो इस किरदार के लिए सही लग रहा है लेकिन उस अभिनेता का भी पता नहीं कहां है?

इस पर खरबंदा जी के दोस्तों ने पुछा कहीं आप मंथन फिल्म के सरपंच की बात तो नहीं कर रहे हैं?

इसके जवाब में सलीम ख़ान ने हां कहा और इतना कहते ही वहां बैठी एक महिला ने कहा उनसे तो मैं आपकी आज ही बात करवा सकती हूं, इतना कहकर वो महिला वहां से चली गई।

कुलभूषण खरबंदा के पास जाकर उस महिला ने सलीम खां की बात उनसे करवाई और सलीम खान ने उन्हें सुबह मिलने के लिए बुला लिया।

सुबह जब खरबंदा जी सलीम खान के घर पहुंचे तो वहां फिल्म शक्ति से जुड़े कुछ लोग भी बैठे हुए थे।

सलीम खां ने खरबंदा जी को शान के लिए फाइनल किया और शक्ति फिल्म से जुड़े लोगों ने उन्हें शक्ति के लिए साइनिंग अमाउंट पकड़ा दिया और इस तरह कुलभूषण खरबंदा को एक साथ अपने करियर की दो सबसे बड़ी फिल्में मिल गई।

शान फिल्म की शूटिंग खत्म हुई और फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज हुई। फिल्म को देखने वाला हर इंसान अमिताभ बच्चन के होते हुए भी 8 लाख की लागत से बने उस डैन और उस डैन‌ में बैठे हुए शाकाल से नजरें नहीं हटा पा रहा था।

शान फिल्म का शाकाल अमर हो गया और साथ ही हिंदी सिनेमा में शुरू हो गया कुलभूषण खरबंदा का जादुई सफर जिसके कई आयाम तय होने बाकि थे।

साल 1981 में आई श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म कलयुग को महाभारत का आधुनिक संस्करण माना जाता है जिसमें शशि कपूर और रेखा जैसे अभिनेताओं ने भी काम किया था।

श्याम बेनेगल के अलावा अब कुलभूषण खरबंदा कई और निर्माताओं के चहेते बन गए थे जिनकी फिल्मों में इनका नाम होना जैसे फिल्म की जरूरत बन गया था, इन निर्माता निर्देशकों में रमेश सिप्पी, दीपा मेहता, जेपी दत्ता और महेश भट्ट जैसे बड़े नाम भी शामिल थे।

1982 में आई फिल्म अर्थ जिसका निर्देशन महेश भट्ट ने किया था कुलभूषण खरबंदा के सिनेमाई सफर को एक नया आयाम देने वाली फिल्म थी, जिसमें शबाना आजमी और स्मिता पाटिल जैसी दिग्गज अभिनेत्रीयों ने उनके साथ काम किया था।

कई फिल्मों में विलन का किरदार निभाने के बाद कुलभूषण खरबंदा ने आगे करेक्टर किरदारों में भी अपनी प्रतिभा का लौहा मनवाया और एक से बढ़कर एक कई किरदारों को जीवंत करने का काम किया।

बोर्डर, घायल, गुप्त, जो जीता वही सिकंदर, शक्ति और लगान जैसी फिल्मों में इनके निभाए किरदार आज भी सिनेमा प्रेमियों को याद है।

कुलभूषण खरबंदा की निजी जिंदगी की बात करें तो इनकी शादी महेश्वरी देवी से हुई, जिनकी पहली शादी कोटा के महाराजा से हुई थी।

महेश्वरी देवी से इन्हें एक बेटी हुई जिसका नाम श्रुति खरबंदा है जो एक ज्वैलरी डिजाइनर के तौर पर काम करती है।

बहुत से लोग कीर्ती खरबंदा को भी इनकी बेटी मानते हैं लेकिन ऐसा नहीं है।

फ़िल्मों में काम करने के बाद कुलभूषण खरबंदा ने टीवी में भी हाथ आजमाया लेकिन 2011 में कुलभूषण खरबंदा होर्स राइडिंग करते हुए गिर गए जिसके चलते इन्हें बहुत सी चोटे आई और डोक्टर ने इन्हें बैंड रेस्ट करने को कह दिया।

कुछ समय बाद प्ले राइटर और डायरेक्टर विनय शर्मा इनके पास आए और उन्होंने कुलभूषण खरबंदा को अपने नाटक आत्मकथा में काम करने को कहा लेकिन कुलभूषण जी ने अपनी हालत को देखते हुए उन्हें मना कर दिया।

मगर विनय शर्मा को अपने नाटक के लिए कुलभूषण खरबंदा ही चाहिए थे और इसीलिए उन्होंने खरबंदा जी के ठीक होने और हां कहने का इंतजार किया।

खरबंदा जी ने आत्मकथा नाटक में काम किया और यही नाटक कुलभूषण खरबंदा के सिनेमा जगत में फिर से वापसी करने का कारण बनकर सामने आया।

आत्मकथा जैसे नाटक में काम करने के बाद कुलभूषण खरबंदा ने एक बार फिर फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा जहां इन्होंने मणिकर्णिका और नो फादर इन कश्मीर के साथ साथ मिर्जापुर वेबसीरीज में अपनी अदाकारी का जौहर दिखाया।

मिर्जापुर वेबसीरज में कुलभूषण खरबंदा के द्वारा निभाए गए किरदार सत्यानंद त्रिपाठी उर्फ बाऊजी ने नई जनरेशन को भी उनका मुरीद बना दिया है।एक ही जगह एक ही कपड़े में बैठे हुए अपने किरदार को इन्दरधनुषी रंग देने वाली उनकी प्रतिभा उनकी अदायगी आज भी वैसी ही है जैसी आज से 40 साल पहले थी। कुलभूषण खरबंदा अब तक थिएटर, पैरेलल और मैन स्ट्रीम सभी पर अपना जादू बिखेर चुके हैं लेकिन पैरेलल सिनेमा में उनके इस जादु का रंग थोड़ा गाढ़ा नजर आता है जिसके पीछे का कारण वे किरदार है जो कुलभूषण खरबंदा ने वहां निभाए हैं।

हिंदी सिनेमा में यह अभिनेता अपने बढ़ते करियर के साथ साथ सिमटता चला गया, शान जैसी फिल्मों में मुख्य फोकस में रहने वाले कुलभूषण खरबंदा 90’s के बाद कुछ मिनटों में सिमट कर रहने लगे थे।

मिर्जापुर वेबसीरज ने कुलभूषण खरबंदा की इसी सिमटती अदाकारी फिर से फैलाव देने का मौका दिया था जिसका इन्होंने पुरा फायदा भी उठाया है।

लगभग 45 सालों का सिनेमाई करियर और लगभग 150 फिल्मों में अपने शानदार काम के बावजूद भी इस महान अभिनेता को एक भी अवार्ड नहीं दिया गया।

1986 में आई फिल्म गुलामी के लिए कुलभूषण खरबंदा को अपने करियर का एकमात्र फिल्मफेयर नोमिनेशन दिया गया था।

इसीलिए कहा जाता शायद कि कई काम ऐसे भी होते हैं जिनके लिए कोई अवार्ड मायने नहीं रखता, वो काम हर अवार्ड से बढ़कर होता है।

इसी उम्मीद के साथ कि कुलभूषण खरबंदा जी आगे भी हमें अपने बेहतरीन काम से मनोरंजित करते रहेंगे आज के इस एपिसोड में बस इतना ही मिलते हैं आपसे अगले एपिसोड में तब तक के लिए नमस्कार।

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