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राजेश खन्ना: स्टारडम से बदहाली तक का सफर

दोस्तों कहा जाता है कि शब्द इन्सान को समृद्ध बनाते हैं।
वीर, योद्धा, महान और शहीद ये कुछ ऐसे शब्द हैं जिनके बाद आने  वाला नाम अपने आप बड़ा और प्रभावशाली नजर आने लगता है।
ऐसा ही एक अंग्रेजी शब्द है सुपरस्टार जिसे अक्सर अभिनेताओं के रुतबे  को परिभाषित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
लेकिन जब यही शब्द राजेश खन्ना के लिए प्रयोग किया जाता है तो इस शब्द के मायने बदल जाते हैं।
ऐसा कहा जा सकता है कि राजेश खन्ना के नाम से इस शब्द का वजूद तय होता है।
लेकिन अपने सिनेमाई सफर के आखिरी दौर में यही शब्द राजेश खन्ना को कचोटने लगा था।
जिस शब्द और पद के बारे में सुनकर राजेश खन्ना इतराया करते थे वही शब्द और पद राजेश खन्ना से छीन लिया गया था।
तो आज के इस एपिसोड में हम राजेश खन्ना के उसी दौर की बात करने वाले है जिसे इन्सान के बदलते समय की तस्वीर का सबसे बड़ा गवाह  माना जा सकता है। नमस्कार ।
29 दिसंबर 1942 को पंजाब में पैदा हुए जतिन खन्ना यानि राजेश खन्ना ने अपने फिल्मी सफर की शुरुआत 1966 में आई फिल्म आखिरी खत से की थी।
और इसे इत्तफाक कहें या कुछ और लेकिन इसी फिल्म को भारत की तरफ से साल 1967 में आस्कर अवार्ड के लिए भेजा गया था।
इसके बाद रविन्द्र दवे द्वारा निर्देशित फिल्म राज में राजेश खन्ना को पहली बार एक बड़े रोल में देखा गया ।
लेकिन 1969 में आई फिल्म आराधना ने राजेश खन्ना को अचानक स्टारडम के शिखर पर लाकर खड़ा कर दिया।
आराधना फिल्म शर्मिला टैगोर के किरदार को ध्यान में रखते हुए और उन्हीं के इर्द गिर्द बनाई गई थी, जिसमें राजेश खन्ना का रोल बहुत छोटा था।
लेकिन फिल्म की शूटिंग के दौरान ही यह निर्णय लिया गया कि फिल्म में शर्मिला टैगोर के बेटे का किरदार भी राजेश खन्ना ही निभाएंगे।
फिल्म की शूटिंग पुरी हुई सिनेमा घरों में रिलीज हुई और इसके बाद कहानियों और किस्सों का वो सिलसिला शुरू हुआ जिन्हें सिर्फ सुनकर यकीं कर पाना बहुत मुश्किल है।
आराधना फिल्म का गाना मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू भारत के हर नौजवान की जुबान पर चढ़ गया था।
खून से लिखे हुए खत राजेश खन्ना के घर पहुंचने लगे, लड़कियां राजेश खन्ना की तस्वीर से शादी करने लगी , और यही नहीं राजेश खन्ना की फिल्म देखने के लिए लड़कियां पुरी तरह से सज संवर कर सिनेमा होल में जाया करती थी।
हिंदी सिनेमा की गलियों में एक जादुई माहौल पैदा हो गया था।
1969 से 1973 के बीच आराधना से लेकर कटी पतंग और दो रास्ते सहित कुल 15 फिल्में हिट हो गई थी।
यह भारतीय सिनेमा में एक चमत्कार की तरह ही था कि लोग एक सिनेमा घर से दुसरे सिनेमा घर जा रहे हैं ,और हर सिनेमा घर में फिल्मों के नाम बदल रहे थे लेकिन चेहरा एक ही था राजेश खन्ना ।
अपनी पलकों को झुकाने की अदा, बोलने का अंदाज और अदायगी ने भारत के हर फिल्म प्रशंसक को राजेश खन्ना का दीवाना बना दिया था।
इन्हीं सब घटनाओं को देखते हुए मशहूर फिल्म पत्रकार देवयानी चौबाल ने अपनी पत्रिका स्टार एण्ड स्टाईल में अपने कोलम फ्रैंकली स्पीक  में राजेश खन्ना को भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार का ताज पहना दिया।
और इस तरह सुपरस्टार शब्द का इजाद ही सबसे पहले राजेश खन्ना के लिए किया गया ।
लेकिन जिस समय राजेश खन्ना अपने करियर के इस दौर से गुजर रहे थे उसी समय लम्बे कद का एक नौजवान लड़का भारतीय सिनेमा में अपना वजूद ढुंढ रहा था।
सात हिंदुस्तानी फिल्म से अमिताभ बच्चन लोगों की नजर में तो आ गए थे लेकिन पहचान अब भी बहुत दूर थी।


Rajesh Khanna

राजेश खन्ना जिस समय अपनी मर्जी की फिल्म, अपनी मर्जी का डायरेक्टर और अपनी मर्जी का किरदार आजादी से चुन रहे थे उस समय अमिताभ बच्चन दो से तीन मिनट के रोल के लिए भी दर दर भटक रहे थे।
राजेश खन्ना और जया भादुड़ी की फिल्म बावर्ची के दौरान अमिताभ बच्चन और जया अच्छे दोस्त बन गए थे जिसके चलते अमिताभ बच्चन हर दिन सैट पर उनसे मिलने पहुंच जाया करते थे।
इससे परेशान होकर राजेश खन्ना जया से कहा करते थे कि तुम इस लड़के से मत मिला करो इसका कुछ नहीं होने वाला तुम अपने करियर पर ध्यान दो।
इसके जवाब में जया ने राजेश खन्ना को कहा था कि देखना एक दिन ये लड़का तुमसे भी बड़ा सुपरस्टार बनेगा।
इन‌ सब बातों से अनजान अमिताभ बच्चन अपने हर कम को निष्ठा और लगन से करते जा रहे थे।
जिसे देखते हुए उन्हें आनंद फिल्म में राजेश खन्ना के साथ काम करने का मौका मिला।
इस फिल्म के दौरान मिली पहचान को देखते हुए अमिताभ बच्चन ने कहा था कि उनकी पहचान सिर्फ इसलिए है क्योंकि उन्होंने राजेश खन्ना के साथ काम किया है।
धीरे धीरे समय बीतता रहा और अमिताभ बच्चन अपने समय पालन , काम के प्रति समर्पण से कई निर्माता और निर्देशकों के पसंदीदा बन गए । और राजेश खन्ना देर  से आने वाली आदत से हर किसी की आंखों में खटकने लगे ।
साल 1973 में राजेश खन्ना के मना करने के बाद अमिताभ बच्चन को जंजीर फिल्म में काम करने का मौका मिला जिसने उनके करियर को पूरी  तरह से बदल‌कर रख दिया ।
एंग्री यंग मैन के किरदार का हर संवाद लोगों की जुबान पर चढ़ गया था और सिनेमा के हर गली कूचे में अमिताभ बच्चन का नाम गूंजने लगा था।
इस फिल्म के बाद हर किसीने यह मान लिया था कि हिंदी सिनेमा को अपना अगला सुपरस्टार मिल गया है।
इसी दौरान एक बार फिर अमिताभ बच्चन और राजेश खन्ना को फिल्म नमक हराम में साथ काम करने का मौका मिला।
यह फिल्म देखने के बाद राजेश खन्ना ने भी कह दिया था कि अब मेरे तख्त का वारिस मुझे और फिल्म इंडस्ट्री को मिल गया है।
फिल्म प्रशंसकों और राजेश खन्ना की इस बात को अगले साल हुए फिल्म अवार्ड शोज ने भी सही साबित कर दिया ।
1974 में आयोजित हुए फिल्म अवार्ड में बेस्ट एक्टर का अवार्ड ऋषि कपूर को मिला था जिसके लिए ऋषि कपूर ने कहा था कि वह अवार्ड उन्होंने खरीदा था।
और उस अवार्ड पर अमिताभ बच्चन का ही हक था।
इसके अलावा बेस्ट सुपोर्टिंग एक्टर का अवार्ड अमिताभ बच्चन को मिला था।
यह बदलाव सिनेमा से बाहर आम लोगों के बीच भी देखा जाने लगा था।
यहां तक कि नाईयों की दुकानों में राजेश खन्ना कट के लिए 2 रुपए और अमिताभ बच्चन कट के लिए साढ़े तीन रुपए लिए जाने लगे थे।
जंजीर के बाद शोले और दीवार जैसी फिल्मों ने हिंदी सिनेमा में रोमांटिक फिल्मों का दौर खत्म कर दिया था।
उपर आका और नीचे काका के नारे लगाने वाले प्रोड्यूसरों की कतार अब धीरे धीरे राजेश खन्ना के दरवाजे से खत्म होने लगी थी।
1982 में वो मौका भी आया जब राजेश खन्ना ने अपनी आंखों से अपने स्टारडम को खुद से अलग होते हुए देखा ।
दरअसल 1982 में आई फिल्म शक्ति के मुहुर्त  पर राजेश खन्ना को बुलाया  गया था।
राजेश खन्ना के आते ही आसपास खड़े लोगों का हुजूम राजेश खन्ना के इर्द गिर्द जुट गया।
लेकिन थोड़ी देर बाद जब अमिताभ बच्चन सैट पर आए तो राजेश खन्ना के पास खड़ा हर व्यक्ति ज्यों का त्यों बिना आटोग्राफ लिए अमिताभ बच्चन के पास चला गया।
इसके घटना के बाद राजेश खन्ना अपने घर की बजाय अपने ऑफिस  गए और कहा जाता है कि वह रात उन्होंने रोते हुए गुजारी थी।
इसी दौरान राजेश खन्ना अपनी निजी जिंदगी में भी कुछ ऐसे ही अनुभवों से गुजर रहे थे।
डिम्पल कपाड़िया ने राजेश खन्ना को छोड़ दिया था, राजनीति में गए लेकिन वह सफर भी अच्छा साबित नही हुआ।

Rajesh Khanna

इसके बाद अमिताभ बच्चन ने भी 90’s के आखिरी सालों में अपने करियर को ढलान पर आते हुए देखा था।
Abcl कम्पनी के का बंद होना और फिल्में ना मिलने की वजह से अमिताभ बच्चन भी निराश हो गए थे।
लेकिन उन्होंने अपने अहंकार और स्टारडम को पीछे छोड़ कर फिर से काम मांगने का फैसला किया और यश चोपड़ा के पास गए जिन्होंने उन्हें मोहब्ब्ते फिल्म में काम करने का मौका दिया।
लेकिन राजेश खन्ना को अपनी पुरानी आदतों ने अब भी जकड़ रखा था जो उन्हें काम मांगने से मना कर रही थी।
और उनकी इसी आदत के चलते मिस्टर इंडिया जैसी फिल्म से भी उन्हें हाथ धोना पड़ा था।
इसके बाद राजेश की दिनचर्या का अधिकतर समय शराब के साथ गुजरने लगा ।
साल 2005 के दौरान राजेश खन्ना उस समय पुरी तरह से टुट गए थे जब उनके घर आशीर्वाद को इन्कम टैक्स डिपार्टमेंट ने सील कर दिया था।
इन सब बातों को देखते हुए राजेश खन्ना ने टीवी की दुनिया से वापसी करने का मन बनाया लेकिन उनकी एक शर्त थी कि उन्हें उतने रुपए मिलने चाहिए जितने अमिताभ बच्चन को केबीसी के लिए मिलते हैं।
बीग बॉस ने उनकी इस शर्त को भी मान लिया था लेकिन अंतिम मौके पर अक्षय कुमार के कहने पर राजेश खन्ना ने बिग बॉस में जाने से मना कर दिया ।
इसके बाद राजेश खन्ना को वफ़ा जैसी फिल्मों और पंखे के विज्ञापन करते हुए देखा गया ।
भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार को बदहाली और बेचारगी में देखना काफी कष्टदायक था लेकिन यह रास्ता भी राजेश खन्ना ने खुद ही अपने लिए चुना था।
प्रशंसा और प्रशंसकों से घिरे रहने की लालसा और ज्यादा से ज्यादा काम करने की आदत उन्हें इस मोड़ पर लाई थी जहां उनके पास कुछ नहीं था।
साल 2005 में फिल्मफेयर ने राजेश खन्ना को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड के लिए चुना जिसे देने के लिए खुद अमिताभ बच्चन मौजूद थे।
राजेश खन्ना का उस अवार्ड शो में दिए गए भाषण में वो बेचारगी और बेबसी साफ नजर आ रही थी।
18 जुलाई 2012 के दिन राजेश खन्ना अपनी तन्हा जिंदगी को छोड़कर इस दुनिया से विदा हो गए।
एक अभिनेता ,जो ताउम्र सुपरस्टार रहा लेकिन इस बीच उन्होंने अर्श से फर्श तक का दर्दनाक सफर भी तय किया, अपनों को पराया बनते हुए भी देखा।

Rajesh Khanna

इज्जते ,शोहरतें ,चाहते ,उल्फते
कोई चीज इस दुनिया में रहती नहीं
आज मैं हूं जहां कल कोई और था
ये भी एक दौर है वो भी एक दौर था।
दौर खत्म हो गया लेकिन राजेश खन्ना की यादें अब भी हर किसी के जहन में जिंदा है और जब तक यादें जिंदा रहती है कलाकार भी जीवित होता है।
तो दोस्तो आज के इस विडियो बस इतना ही ।

लेखक – पुरुषोत्तम पारीक

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