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प्रेम चोपड़ा: बॉलीवुड का ऐसा विलेन जिसे देख लोग छिपा लेते थे अपनी बीवियां

वक़्त बदला, दौर बदले, लोगों के चेहरे बदले लेकिन कहानियाँ और क़िरदार नहीं बदले.. हाँ उनका अंदाज़-ए-बयाँ ज़रूर बदलता रहा।

जिस तरह अंधेरों के बिना उजालों का और दुःख के बिना सुख का एहसास होना नामुमकिन है.. ठीक उसी तरह किसी भी फ़िल्म में अगर खलनायक ना हो तो फिर नायक का भी कोई महत्व नहीं रह जायेगा और बात जब पुरानी फ़िल्मों की हो तो फिर यह विषय और भी रोचक हो जाता है। 60 और 70 के दशक में जहाँ एक तरफ हिंदी फ़िल्म जगत के 3 स्तंभ राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार  के साथ राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार, बिश्वजीत, शशि कपूर  शम्मी कपूर आदि नायक कंधे से कंधा मिलाकर साथ दे रहे थे और धर्मेन्द्र, राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन जैसे ढेरों नायक अपनी जगह बना रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ के॰ एन॰ सिंह, मदन पूरी, जीवन और प्राण जैसे दिग्गज़ खलनायकों की परंपरा को आगे बढ़ाता हुआ एक और नाम तेजी से उभर रहा था और वह नाम था प्रेम चोपड़ा। जी हाँ अपने ज़माने के मशहूर खल चरित्र निभाने वाले लेजेन्ड्री एक्टर प्रेम चोपड़ा, जिनकी फ़िल्मों में शुरुआत तो बतौर हीरो  हुई , लेकिन उनकी पहचान हमेशा एक दमदार खलनायक के रूप में ही जानी जाती है। अपने सशक्त अभिनय, शानदार संवाद अदायगी और विशेष मौलिक अंदाज़ से लोगों के दिलों पर राज करने वाले प्रेम चोपड़ा जी के फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की कहानी बहुत संघर्षों से भरी हुई  और बहुत ही प्रेरणादायक भी है।

पाँच भाइयों और बहनों  मेंं से एक प्रेम चोपड़ा जी का जन्म एक पंजाबी परिवार में 23 सितम्बर सन 1935 को लाहौर, पंजाब में हुआ था, जो कि अब पाकिस्तान का  हिस्सा  है। उनके पिताजी का नाम रणबीर लाल चोपड़ा था जो कि एक सरकारी नौकरी में थे।  माताजी का नाम रूपरानी चोपड़ा था और प्रेम अपनी माँ के बहुत ही लाडले थे। बँटवारे से कुछ एक माह पहले ही प्रेम चोपड़ा जी के पिताजी लाहौर छोड़ सपरिवार शिमला आकर बस गये थे ,क्योंकि उन्हें पता चल गया था कि हालात बिगड़ने वाले हैंं। बहरहाल शिमला में *सनातन धर्म वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय* से उन्होंने पढ़ाई की और पढ़ाई के दौरान विद्यालय के नाटकों में भी हिस्सा लेने लगे जहाँ उन्हें सबसे प्रोत्साहन भी मिला। लोगों से मिले इन्हीं प्रोत्साहन ने उनके दिल में एक अभिनेता बनने की चाह को जन्म  दिया ,जो बाद में एक जुनून सा बन गया। प्रेम जी ख़ुद बताते हैं कि बचपन में उनके घर के पास होने वाली रामलीला को देखकर उनको भी अभिनय करने को मन करता। एक बार जब उनसे नहीं रहा गया तो वो पहुँच गये रामलीला के आयोजक के पास और उनसे अनुरोध करने लगे कि उन्हें भी रामलीला में अभिनय करने का मौका दें ।रोल कोई भी  हो चलेगा। उनकी ज़िद और जुनून को देखते हुये उन लोगों ने छोटे प्रेम चोपड़ा जी को हनुमान जी का रोल दे दिया। प्रेम जी बहुत ख़ुश हुये उन्हें लाल रंग से रंगकर बाकायदा पूँछ लगाकर हनुमान जी के रूप में तैयार किया गया और उनका रोल समझाकर उन्हें मंच पर भेजा गया, लेकिन जैसे ही वो मंच पर गये और अपने सामने सबको देखा तो घबराकर अपनी पूँछ को संभालते हुये धीरे से वहाँ से निकल आये । ख़ैर ये तो बचपन की बातें हैंं धीरे धीरे उम्र के साथ उनका अभिनय के प्रति जुनून बढ़ता ही गया और साथ साथ उनके अभिनय में निखार भी आता गया। पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक करने के साथ ही उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी और ऊर्दू भाषाओं के नाटकों में भी ख़ूब हिस्सा लिया और वाहवाही भी बटोरी।

Prem Chopra

अभिनय के प्रति उस वक़्त के उनके जुनून का आप इसी बात से अंदाज़ा लगा सकते हैं कि 55-60 साल पहले नाटकों में अदा किये अपने संवाद उन्हें आज भी कंठस्थ हैंं। लेकिन जहाँ एक ओर प्रेम चोपड़ा जी ने अभिनय को ही अपना करियर  बनाने का मन बना लिया था वहीं दूसरी ओर उनके पिताजी का ,हर बाप की तरह यही सपना था कि उनका बेटा भी डाॅक्टर, या कोई बड़ा अधिकारी बनें। ख़ैर इतिहास गवाह है कि अगर जुनून पक्का हो और पूरी क़ाबिलियत हो तो जीत सुनिश्चित है ।भले ही थोड़ा वक़्त क्यूँ ना लग जाए। हुआ यूँ कि एक दिन उनका एक नाटक देखने उनके पिताजी भी पहुँच गये और जब उन्होंने अपने बेटे का अभिनय करते  देखा तो देखते ही रह गये और वो भी मुरीद हो गये प्रेम चोपड़ा जी के अभिनय के।

 घर आ कर  उन्होंने  प्रेम चोपड़ा जी से ख़ुद कहा कि मेरी ग़लती थी जो मैं तुम्हें एक्टर बनने से रोक रहा था तुम बंबई जाओ मैं नहीं रोकूँगा। साथ ही उन्होंने एक बहुत ही अच्छी  सलाह भी दी कि फ़िल्मों में काम ढूँढ़़ेने के साथ साथ खर्च निकालने के लिये कोई नौकरी भी कर लेना।

प्रेम चोपड़ा जी की ख़ुशी का कोई ठिकाना न था बस फिर क्या था पिता की इजाज़त, जोश, उमंग और आत्मविश्वास से भरे प्रेम पहुँच गये बंबई, अपने सपनों के शहर अपनी किस्मत आजमाने, जिस पर उन्हें पूरा भरोसा था। उनकी सोच यही थी कि रंगमंच पर इतनी वाहवाही पाने के बाद तो फ़िल्म वाले उन्हें हाथों हाथ ले लेंगे और बड़े आसानी से उन्हें फ़िल्मों में काम मिल जायेगा। किराये पे एक कमरा लेने के बाद उन्होंने काम की तलाश में निकलना शुरू किया.. दिन बीते, हफ्ते बीते, महीने बीत गये लेकिन काम मिलना तो दूर डायरेक्टर्स प्रोड्यूसर्स से मिलना भी उतना आसान नहीं था जितना वह सोचकर आये थे। धीरे-धीरे सच्चाई उनके सामने आने लगी और उन्हें समझ आ गया कि ये राह उतनी आसान नहीं है। बार बार घर से पैसे मँगाने में भी उन्हें शर्म आने लगी। ऐसे में उन्हें अपने पिताजी की नसीहत याद आयी और उन्होंने टाईम्स ऑफ इंडिया सर्कुलेशन डिपार्टमेंट में नौकरी कर ली। अब उन्हें पैसों की ज़्यादा समस्या नहीं थी बस समय निकालने और छुट्टी लेने में मशक्कत करनी पड़ती थी जिसमें वो बहुत जल्द माहिर हो गये और आवश्यकता पड़ने पर उन उपायों का इस्तेमाल करते रहते। वो अक्सर लंच टाइम में जहाँ पता चलता कि एक्टर की आवश्यकता है लोकल ट्रेन से अपनी फोटोज़ के साथ वहाँ पहुँच जाते और तय समय पर ऑफिस वापस आ जाते। एक बार की बात है प्रेम जी किसी प्रोडक्शन हाउस से मुलाक़ात कर के लोकल ट्रेन से वापस लौट रहे थे ,उनके हाथों में फोटोग्राफ्स देख कर एक आदमी ने उनसे पूछा कि क्या आप एक्टर बनना चाहते हैं? प्रेम चोपड़ा जी ने झट से कहा – जी कोशिश तो यही है। उस व्यक्ति ने कहा एक जगह चांस तो है लेकिन पंजाबी फ़िल्म है। प्रेम जी ने सोचा कि जो मिल रहा है कर लो। उन्होंने बोला कि मुझे भाषा से कोई समस्या नहीं है। उस व्यक्ति ने प्रोडक्शन हाउस का पता बताया और वहाँ आने को कहा। बस क्या था प्रेम चोपड़ा पहुँच गये उस व्यक्ति द्वारा बताये पते पे यानि रणजीत स्टूडियो। दादर प्रोड्यूसर जगजीत सेठी से मिलने उनके प्रोडक्शन हाउस। उन्हें चुन भी लिया गया बतौर हीरो और ये फ़िल्म थी *चौधरी करनैल सिंह* जिसमें उनकी हीरोइन थी उस वक़्त की कामयाब पंजाबी फ़िल्मों की अभिनेत्री *जबीन जलील*। प्रेम चोपड़ा जी ख़ुद कहते हैं कि उन्हें भरोसा नहीं था कि इस फ़िल्म का क्या होगा पता नहीं बन भी पायेगी या नहीं, रिलीज़ भी हो पायेगी  या नहीं इसलिये उन्होंने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी।

Prem Chopra Young

उनका यह निर्णय बिल्कुल सही था क्योंकि फ़िल्म बनने और रिलीज़ होने में वक़्त काफी लगता है और उसके बाद भी आगे काम मिलेगा या नहीं इसमें संशय की स्थिति बनी ही रहती है। ख़ैर फ़िल्म बनी और 1960 में रिलीज़ भी हुई और नेशनल अवाॅर्ड के लियेे नाॅमीनेट भी हुई।

प्रेम चोपड़ा जी ने अभी भी नौकरी और फ़िल्म के बीच सामंजस्य बिठाकर अपना संघर्ष ज़ारी रखा। उन्होंने कुछ और फिल्मों में जैसे की *मैैं शादी करने चला, मुड़ मुड़ के न  देख, सिकंदर-ए-आजम* वगैरह में बतौर हीरो काम किया लेकिन वो फिल्में उतनी सफल नहीं हुईं। फिर उन्हें मनोज कुमार जी की *शहीद* फिल्म में शहीद सुखदेव जी का रोल मिला। फिल्म की ज़बरदस्त कामयाबी के बाद प्रेम चोपड़ा जी को अच्छे काम मिलते रहे और उन्हें अब यक़ीन हो गया था कि अब वो फ़िल्मों में अपनी जगह और पहचान बना लेंगे। नौकरी से इस्तीफ़ा दे अब वह पूरी तरह से अभिनय में व्यस्त हो गये।

प्रेम चोपड़ा जी बनना तो हीरो ही चाहते थे लेकिन उसमें कॉम्पिटिशन बहुत ज़्यादा था इसलिये जो भी रोल्स उन्हें ऑफर हुये वो करते गये। दोस्तों ने उन्हें समझाया कि अगर यहां टिकना चाहते हो तो नायक बनने का ख़्वाब छोड़ दो और पूरी तरह से खलनायकी के रोल्स पे फोकस करो। उन्हें भी यह बात समझ में आयी और उन्होंने ये तय कर लिया कि अब उन्हें हीरो बनने के लिये अपना वक़्त बरबाद नहीं करना है। *वो कौन थी* और *उपकार* जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों में नकारात्मक भूमिकाओं को निभा कर उन्होंने अपनी पहचान बना ली और उन्हें वो सब मिलने लगा जिनकी उन्हें ख्वाहिश थी। राजेश खन्ना जी के साथ उनकी सबसे सफल जोड़ी बनी। प्रेम चोपड़ा जी उस दौर के सबसे सफल खलनायक बन चुके थे लेकिन उनका मुकाम अभी शायद कहीं और ऊपर था उनके ख़्वाबों से भी परे। और ये मुकाम तब मिला जब सन 1973 में फिल्म *बाॅबी* रिलीज़ हुई जिसमें एक छोटे से रोल में भी उनके द्वारा बोला गया संवाद *प्रेम नाम है मेरा प्रेम चोपड़ा* इतना हिट हुआ कि  सालों बाद आज भी हम सबकी जुबान पर रहता है। वो संवाद पूरी तरह से प्रेम चोपड़ा जी की पहचान बन गया जो कि आज भी कायम है। प्रेम चोपड़ा जी अक्सर अपने एक इंटरव्यूमें बताते हैं कि खलनायक की भूमिकाओं में सफल होने के बाद एक बार वो किसी से मिलने चंडीगढ़ गये जहाँ कुछ लोग उन्हें देख कर घबरा गये और अपने साथ की महिलाओं को छिपाने लगे। बाद में उन्होंने पास बुलाकर समझाया तब जाकर उन लोगों को लगा कि प्रेम चोपड़ा भी उन लोगों की तरह ही एक सामान्य इंसान हैं। ख़ैर प्रेम चोपड़ा जी ऐसी बातों को अपने लिये एक कॅम्प्लीमेंट की तरह लिया करते हैं। प्रेम चोपड़ा जी ख़ुद के द्वारा खलनायकी की भुमिकायें स्वीकार करने के निर्णय को बिल्कुल सही मानते हैं। उनका कहना है कि अगर वो कामयाब हीरो बन  भी जाते तो भी ज़्यादा से ज़्यादा 7-8 साल काम करते।

60 सालों में 300 से भी ज्यादा फ़िल्मों में नकारात्मक क़िरदार और सैकड़ों फिल्मों में चरित्र भूमिकायें निभा चुके प्रेम चोपड़ा जी ने हर तरह के रोल्स किये नायक, खलनायक, चरित्र अभिनेता और हास्य भूमिकायें भी। उनके द्वारा अभिनीत हास्य भूमिकाओं में भी उनकी ज़बरदस्त टाइमिंग देखते ही बनती है। कुल मिलाकर अगर प्रेम चोपड़ा जी को एक संपूर्ण अभिनेता कहा जाये तो ये ग़लत नहींं होगा।

Prem Chopra

प्रेम चोपड़ा जी के नाम ढेरों पुरस्कार हैं सबके बारे में बता पाना एक वीडियो में तो संभव नहीं।

इंदिरा गांधी अवाॅर्ड, मदर टेरेसा अवाॅर्ड के अलावा लाईफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड सहित ढेरों अवाॅर्ड्स  से  प्रेम चोपड़ा जी नवाज़े जा चुके हैं।

फिल्म और अवाॅर्ड्स के बाद आइये एक नज़र डालते हैं उनके पारिवारिक जीवन पर।

प्रेम चोपड़ा जी की पत्नी का नाम ऊमा चोपड़ा है जो कि राज कपूर जी की पत्नी कृष्णा कपूर और अभिनेता प्रेमनाथ, राजेन्द्र नाथ व नरेन्द्र नाथ की बहन हैं।

प्रेम चोपड़ा जी की 3 बेटियाँ हैंं पहली बेटी प्रेरणा जोशी जो कि मशहूर अभिनेता शरमन जोशी की पत्नी हैंं। दूसरी बेटी का नाम है पुनीता चोपड़ा जिनकी शादी हुई अभिनेता और गायक विकाश भल्ला से। और तीसरी बेटी हैंं रकिता नंदा जिनके पति का नाम है राहुल नंदा।

वर्तमान समय में प्रेम चोपड़ा जी अपने परिवार के साथ मुंबई में स्वस्थ और ख़ुशहाल ज़िन्दगी व्यतीत कर रहे हैं।  नारद टी वी उनके प्रशंसकों की तरफ से सदैव उनकी कुशलता की कामना करता है।

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